भोपाल। मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले के सोहागपुर में शुक्रवार को इको सेंसिटिव जोन और विस्थापन नीति के खिलाफ सैकड़ों आदिवासियों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। सोमनाथ किसान मजदूर आदिवासी संगठन और किसान आदिवासी संगठन के नेतृत्व में आदिवासी किसान, मजदूर, महिलाएं और बुजुर्ग बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे आदिवासियों ने रैली निकालकर एसडीएम कार्यालय पहुंचकर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा और विस्थापन नीति पर गंभीर सवाल खड़े किए।
सुबह से ही जुटने लगे लोग
शुक्रवार सुबह करीब 11 बजे से सिंह साहब कॉलोनी में आदिवासी किसान और मजदूर इकट्ठा होने लगे। यहां पहले एक सभा का आयोजन किया गया, जिसमें वक्ताओं ने सरकार की नीतियों और वर्षों पहले हुए विस्थापन पर सवाल उठाए। सभा के बाद सभी लोग नारेबाजी करते हुए रैली के रूप में एसडीएम कार्यालय पहुंचे।
रैली में शामिल लोगों के हाथों में तख्तियां थीं, जिन पर लिखा था “जमीन के बदले जमीन दो, विस्थापन नहीं, अधिकार चाहिए” सभा में वक्ताओं ने कहा कि सरकार ने इको सेंसिटिव जोन और विकास परियोजनाओं के नाम पर आदिवासियों की जमीनें अधिग्रहित कर लीं, लेकिन बदले में उन्हें न तो सही मुआवजा मिला और न ही वैकल्पिक जमीन। कई परिवार आज भी बेघर और बेरोजगार जिंदगी जीने को मजबूर हैं।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सालों पहले जिन परिवारों को विस्थापित किया गया, उनके साथ घोर अन्याय हुआ। कई लोग आज भी मुआवजे के इंतजार में दर-दर भटक रहे हैं।
किसानों का आरोप, बिना मुआवजे के ली गई जमीन
आदिवासी किसानों ने आरोप लगाया कि विस्थापन की प्रक्रिया में भारी भेदभाव हुआ है। उनका कहना है कि जिन परिवारों के पास अपनी जमीन नहीं थी, उन्हें तो प्रति यूनिट 10 लाख रुपये का मुआवजा दे दिया गया, लेकिन जिन किसानों के पास 10 से 60 एकड़ तक खेती की जमीन थी, उनकी जमीन बिना किसी उचित मुआवजे के अधिग्रहित कर ली गई। कई किसानों को सिर्फ आश्वासन दिए गए, लेकिन न तो उन्हें लिखित आदेश मिला और न ही पैसा। इससे सैकड़ों परिवार आज भी न्याय की आस में भटक रहे हैं। जमीन जाने के बाद उनके पास न तो खेती बची और न ही कोई स्थायी रोजगार, जिससे उनका जीवन पूरी तरह असुरक्षित हो गया है।
प्रदर्शन में शामिल आदिवासी किसान महिला द्रोपदी ने भावुक होकर कहा, “हमारी पुश्तैनी जमीन सरकार ने ले ली। ना उचित पैसा दिया, ना दूसरी जमीन। आज हम मजदूरी करने को मजबूर हैं। यह कैसा विकास है?” उन्होंने कहा कि पहले खेतों से परिवार का पेट भर जाता था, बच्चों की पढ़ाई हो जाती थी और घर में अनाज रहता था, लेकिन जमीन छिन जाने के बाद हालात बदल गए हैं। अब रोज मजदूरी मिले या न मिले, इसी चिंता में दिन कटता है। द्रोपदी जैसी कई महिलाएं कहती हैं कि विकास के नाम पर उनसे उनका सब कुछ छीन लिया गया, लेकिन बदले में कुछ भी नहीं दिया गया।
“जमीन के बदले जमीन” की मांग
आदिवासी प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग है कि जिन किसानों की जमीनें अधिग्रहित की गईं, उन्हें वर्तमान गाइडलाइन के अनुसार मुआवजा दिया जाए या फिर “जमीन के बदले जमीन” उपलब्ध कराई जाए। नेताओं ने कहा कि आदिवासी केवल पैसे से नहीं, बल्कि जमीन से जुड़ा होता है। जमीन उसकी पहचान, उसकी आजीविका और उसका जीवन है।
इको सेंसिटिव जोन का विरोध
प्रदर्शनकारियों ने इको सेंसिटिव जोन को लेकर गहरी नाराजगी जताई। उनका कहना है कि इस नीति के लागू होने के बाद उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पर कई तरह की पाबंदियां लग गई हैं। खेती करने, नया मकान बनाने, पुराने मकान की मरम्मत करने, पेड़ काटने, कुआं या नलकूप खुदवाने जैसे छोटे-छोटे कामों के लिए भी अब अनुमति लेनी पड़ती है। कई बार अनुमति मिलती ही नहीं, जिससे लोगों के जरूरी काम अटके रहते हैं। इन पाबंदियों का सीधा असर उनकी आजीविका पर पड़ा है, खेती ठीक से नहीं हो पा रही, पशुपालन में दिक्कत आ रही है और जंगल पर आधारित जीवन धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। महिलाएं जो जंगल से जलावन, चारा और कंद-मूल लाती थीं, अब उन्हें रोका जाता है या जुर्माने का डर दिखाया जाता है, जिससे घर चलाना और बच्चों का पेट भरना भी कठिन हो गया है।
आदिवासियों ने साफ कहा कि वे पर्यावरण संरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। उनका कहना है कि वे सदियों से जंगल, नदी और जमीन के साथ तालमेल बनाकर रहते आए हैं और कभी प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि उसकी रक्षा की है। उनका तर्क है कि अगर आज भी जंगल बचे हुए हैं, तो उसमें आदिवासियों की जीवनशैली और समझ का बड़ा योगदान है। उन्होंने कहा, “पर्यावरण बचाना जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर हमें हमारे घरों, खेतों और जंगलों से बेदखल करना गलत है। हम ही असली पर्यावरण रक्षक हैं।”
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सरकार को नीति बनाते समय जमीन पर रहने वाले लोगों की बात सुननी चाहिए, क्योंकि पर्यावरण संरक्षण और आदिवासियों के अधिकार दोनों साथ-साथ चल सकते हैं, अगर आदिवासियों को समस्या नहीं बल्कि समाधान का हिस्सा माना जाए।
राष्ट्रपति के नाम सौंपा ज्ञापन
रैली के बाद सभी प्रदर्शनकारी नारेबाजी करते हुए एसडीएम कार्यालय पहुंचे, जहां उन्होंने एसडीएम प्रियंका भलावी को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा और अपनी मांगों से प्रशासन को अवगत कराया। ज्ञापन में विस्थापन नीति में बदलाव, पुराने विस्थापित परिवारों को न्याय दिलाने, वर्तमान गाइडलाइन के अनुसार मुआवजा देने या “जमीन के बदले जमीन” देने, और इको सेंसिटिव जोन के नियमों में आदिवासियों के हित में संशोधन करने की मांग की गई।
क्या हैं मांगें?
पुराने विस्थापित परिवारों को वर्तमान गाइडलाइन के अनुसार मुआवजा दिया जाए।
जिन किसानों की जमीन ली गई है, उन्हें “जमीन के बदले जमीन” दी जाए।
इको सेंसिटिव जोन के नियमों में आदिवासियों के हित में बदलाव किया जाए।
विस्थापित परिवारों का पुनर्वास सही ढंग से किया जाए।
आंदोलन जारी रखने की चेतावनी
आदिवासी संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक दिन का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि अपने अधिकारों की लड़ाई है।