— ✍️ सिद्धार्थ गौतम
17 जनवरी 2016, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में एक दलित पीएचडी शोधार्थी रोहित वेमुला ने विश्वविद्यालय के एक हॉस्टल में आत्महत्या कर ली, कारण यह था की विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें पूरे तरीके से सस्पेन्ड कर दिया गया था, छात्रवृति रोक दी गई थी। तमाम धरना प्रदर्शन करने के बाद भी उनके निष्कासन को खारिज नहीं किया, इसमें से एक कारण यह था क्योंकि वह गरीब और दलितों के मुद्दों पर मुखर थे। कहा जा सकता है उनकी आत्महत्या एक संस्थागत मृत्यु था, जो एक हाशिये के समाज से निकले छात्र को इतना परेशान करता है की उसके पास मौत के सिवा कोई चारा नहीं बचा। रोहित वेमुला की मृत्यु को अगले सप्ताह 10 वर्ष हो जाएंगे, पर ऐसा देखा जा रहा है कि एक खास वर्ग की अनदेखी अब भी जारी है।
बीते 22 दिसम्बर को देश के प्रतिष्ठित संस्थान जामिया मिलिया इस्लामिया के एक प्रोफेसर को सस्पेन्ड कर दिया गया क्योंकि उन्होंने एक सिमेस्टर एक्जाम एक ऐसा सवाल परीक्षा में पूछ लिया, जो विश्वविद्यालय के हिसाब से सीधे तौर पर कहें तो अनैतिक था। ऐसा कहा जा सकता है की विश्वविद्यालयों में जहां विविध विचारों को जगह मिलती है, विचार-विमर्श होता हैं, वहाँ अकादमिक काम कर रहे शिक्षकों या छात्रों पर भरसक हथखण्डे अपनाए जा रहे हैं, ताकि वो कमजोर पड़ जाएं और ऐसा ज़ुल्म सिर्फ खासकर एक तबके पर ज्यादा देखने को मिल रहा है, जो देश के हाशिये के समाज से ताल्लुक रखते हैं। जामिया के सोशल वर्क डिपार्ट्मन्ट के प्रोफेसर डॉ वीरेंद्र बालाजी सहारे दलित समाज से ताल्लुक रखते हैं, उनका अधिकतर काम वंचित समाज के ऊपर है, JNU और TISS जैसे सामाजिक विज्ञान के देश के सबसे शानदार संस्थानों से उन्होंने पढ़ाई पूरी की है, यह कहा जा सकता है उनके ज्ञान का हिस्सा सिर्फ किताबी नहीं है, उन्होंने जीवन को भी पढ़ा है और जिया भी है।
ऐसा देखा गया है की जो विद्याविद गरीबी, जाति, लिंग, आदिवासी या किसी और सामाजिक मुद्दों पर मुखर हैं, वह सत्ता के निशाने पर हैं, वह सत्ता चाहे संस्थागत हो या राजनीतिक। 2023 के अकादमिक फ्रीडम इंडेक्स के रिपोर्ट के अनुसार भारत 179 देशों में से निचले 30 प्रतिशत में आता है। जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी से देश के तमाम संस्थानों में हुए जातिगत भेदभाव से जुड़े रिपोर्ट को मांगा गया, जिसमें यूजीसी के आंकड़ों के अनुसार शैक्षणिक वर्ष 2023-24 में देश के 3522 संस्थानों से 1503 जातिगत भेदभाव के आँकड़े सामने आए हैं, जिनमें से 1426 शिकायतों के ऊपर कारवाई की गई है। यह सिर्फ दर्ज आँकड़े हैं, कई घटनाएं ऐसी होंगी जो सामने तक नहीं आती। इससे यह भी दिखता है की जो दलित, पिछड़ा छात्र पढ़ने की तमन्ना से कहीं दाखिला भी कराता है, तो उसके सामने कई सामाजिक चुनौतियाँ भी रहती हैं, उदाहरण के तौर पर जब कोई दलित छात्र कहीं बाहर कमरा ढूँढने जाता है उससे सबसे पहले उसकी जाति पूछी जाति है, अगर कमरा मील भी जाता है तो उनके साथ जाति के चलते कभी-कभार कोई रहना नहीं चाहता।
पर ऐसा देखा गया है की खासकर दलित-पिछड़े समाज के छात्रों के साथ विश्वविद्यालयाओं में दाखिले के पहले से ही यह भेदभाव शुरू हो जाता है, उदाहरण के तौर पर देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान जेएनयू के साल 2021 में पीएचडी दाखिले के दौरान ये बात निकल के सामने आई की वाईवा के दौरान वंचित समाज के छात्रों को, लिखित परीक्षा पास करने के बावजूद भी कम अंक दिए जा रहे हैं, इस चीज को लेकर प्रदर्शन भी हुए पर प्रशासन ने इन तमाम आरोपों खारिज कर दिया गया, उसी तरह हैदराबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी इंटरव्यू को लेकर आरटीआई से यह पता लगा की एक खास तबके के बच्चों को कम अंक दिए गए हैं। ऐसा देखा गया है की कुछ आईआईटी और आईआईएम जैसे शानदार संस्थाएं आरक्षण प्रावधान होने के बावजूद उसको सही तरीके से लागू नहीं करते और कुछ खास बच्चों को ही दाखिला देते हैं, उदाहरण के तौर पर 2023 मे आईआईटी खड़गपुर में दाखिले के वक्त जनरल केटेगरी के छात्रों का तय सीटों से अधिक सीटों पर दाखिला लिया गया। आंकड़ों के हिसाब से देश के 5 सबसे उत्तम दर्जे के आईआईटी में लगभग 90 प्रतिशत शिक्षक उच्च जाति से ताल्लुक रखते हैं, पर सवाल यह है की क्या दलित-पिछड़े समाज से आने वाले शिक्षक कहाँ छूट जा रहे हैं? क्या वो पढ़ नहीं रहे? या वह यहाँ तक पहुँच ही नहीं पा रहे हैं, या उन्हें तमाम हथकण्डे अपना कर यहाँ तक पहुचने ही नहीं दिया जा रहा है।
2019 में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और दलित साहित्यकार श्योराज सिंह बेचैन का मामला खूब गरमाया था, जब उन्हें सबसे सीनियर होने के बावजूद, उनके पदोन्नति को रोक दिया गया था, इसका एक कारण इसमें जाति है और दूसरा कारण सत्ता के साथ हाथ ना मिलाना, काफी प्रदर्शन और हो हल्ला के बाद उन्हें आखिरकार विभागाध्यक्ष चुना गया। यह हाल के दिनों में देखा गया है की जो विद्याविद स्वतंत्र रूप से बोलना या लिखना भी चाहते हैं, उनके खिलाफ ‘अर्बन नक्सल” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके एक प्रेजडिस बनाया जा रहा है। पर ऐसा देखा गए है की यह शब्द सिर्फ एक खास वर्ग के शिक्षकों और विद्याविदों के ऊपर थोपा जा रहा है, जो अधिकतर दलित, आदिवासी, पिछड़े या अल्पसंख्यक तबके से ताल्लुक रखते हैं या फिर यह उनके ऊपर भी लागू कर दिया जाता है जो उनके हक अधिकारों की बात करते हैं।
2014 में दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे प्रोफेसर जीएन साईबाबा को हिरासत में लिया जाता है, वह अंग्रेजी के शिक्षक थे, लगभग 90 प्रतिशत शारीरिक से दिव्यंग, उन्हें व्हीलचेर का इस्तेमाल करना पड़ता था, उनका ताल्लुकात माओवाद से जोड़ा गया और उनपर यूएपीए लगाया गया। मार्च 2017 में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई, जेल में चिकित्सा का अभाव और इलाज से वंचित होने के कारण उन्हें कई बार आईसीयू में भी भर्ती करना पड़ा। मार्च 2024 में जीएन साईबाबा को बरी कर दिया गया और कोर्ट ने माना युएपीए के तहत उनपर कोई भी आरोप साबित नहीं हुए, लगभग जेल में 10 साल गुजारने के बाद वह रिहा हुए, पर दस साल काफी लंबा वक्त होता है, इतने वक्त में उनकी शारीरिक स्थिति और खराब हो चुकी थी, उनके देह के कुछ अंग काम करना बंद कर चुके थे, अक्टूबर 2024 में ही उनकी मृत्यु इलाज के दौरान हो गई। वह आदिवासी और दलित अधिकारों के बारे में लिखते थे, सवाल ये उठता है एक विकलांग विद्याविद को ये सब क्यों सहना पड़ा जो पूरे तरीके से निर्दोष था। वहीं दूसरी तरफ हम देखते हैं राम रहीम जिनके ऊपर रेप जैसा घिनौना इल्जाम साबित हो चुका है, वह अब तक पेरोल पर 14 बार बाहर आ चुके हैं, और बाहर आकर विडिओ बनाते हैं।
अकादमिक स्वतंत्रता के ऊपर भी हमला हो रहा है, शिक्षकों और शोधकर्ताओं के अंदर के डर पैदा किया रहा है की वह क्या पढ़ाएं या किन विषयों पर शोध हो, और यह खासकर एक तरह के विषयों के ऊपर देखने को ज्यादा मिल रहा है, जो विषय मजलूमियत से जुड़े होते हैं, सेमीनार या कॉनफेरेंस को रद्द कर दिया जा रहा है। बीते अक्टूबर में दिल्ली विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में एक अकादमिक सेमीनार को डीयू प्रशासन द्वारा रद्द कर दिया गया, यह लोकतान्त्रिक विमर्श के ऊपर एक ताला लगाने जैसा है, जहां यह सत्ता तय करेगी, कौन क्या बोलेगा, कौन क्या देखेगा और कौन क्या सुनेगा? और अगर आप इसके विपरीत गए, तब आपको रोकने के तमाम हथकण्डे अपनाएं जा रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे जामिया के डॉ वीरेंद्र बालाजी सहारे के साथ हुआ।
आज के वक्त में देश के बड़े से बड़े विश्वविद्यालयों के बाहर या आसपास दर्जनों पुलिस इकट्ठा रहते हैं। जहां छात्रों को स्वतंत्र महसूस करना होता है, छात्र हमेशा डरे रहते हैं की कॅम्पस में कहीं कुछ हो ना जाए, जिस पुलिस को देखकर छात्रों को सुरक्षित महसूस करना चाहिए, छात्र उन्हें देख कर डरते हैं। जब किसी छात्र का दाखिला किसी विश्वविद्यालय में होता है, तब घर के परिवारजन उन्हें तमाम चीजों को लेकर एहतियात करते हैं, इसका असर यह होता है की अगर छात्र अपने मुद्दों को लेकर भी बोलने से खौफ खाते हैं, यहाँ मन का स्वतंत्रता भी कमजोर हो रहा है।
रोहित वेमुला की मृत्यु के लगभग दस वर्ष बाद, वर्तमान स्थिति में यह भेदभाव आज भी जारी है, संस्थानों में हालियाँ घटनाओं या पहले की घटनाओं से ये साफ होता दिख रहा है की जो लोग हाशिये के समाज से आते है, उन्हें ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, जो शोषण की बात कर रहे हैं उनपर गाज गिर रही है। वंचित समाज से गिने चुने विद्याविद और शोधकर्ता निकल रहे हैं, जिसका मतलब यह है की वह समाज में वंचित होने के साथ-साथ, अकादमिक जगत में भी दरकिनार कर दिए जा रहे हैं, जो खुल के सामने भी आ रहे हैं उनके ऊपर संस्थागत हथियार छोड़ दिए जा रहे हैं। बकौल डॉ अंबेडकर- ‘शिक्षा उस शेरनी का दूध है, जो पिएगा वो दहाड़ेगा’, पर इस दौर में इसके ठीक उलट देखने को मिल रहा है।
लेखक जामिया मिलिया इस्लामिया में एमए (समाजशास्त्र) के छात्र हैं।