असम: कार्बी आंगलोंग में आदिवासियों के अधिकारों पर गहराता संकट, कानूनी विशेषज्ञों ने APDCL की भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल

04:38 PM Jan 10, 2026 | Rajan Chaudhary

गुवाहाटी: असम के कार्बी आंगलोंग जिले में प्रस्तावित पंप स्टोरेज पावर प्रोजेक्ट्स (PSPs) को लेकर विरोध के सुर अब और तेज हो गए हैं। इस मामले में अब वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों और भूमि अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी मोर्चा खोल दिया है। उनका आरोप है कि राज्य सरकार 'असम पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड' (APDCL) का इस्तेमाल करके छठी अनुसूची (Sixth Schedule) के तहत संरक्षित क्षेत्रों में निजी कॉर्पोरेट कंपनियों को पिछले दरवाजे से प्रवेश दिलाने की कोशिश कर रही है।

यह प्रतिक्रिया ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस (APHLC) के उस आरोप के कुछ दिनों बाद आई है, जिसमें कहा गया था कि वन भूमि डाइवर्जन (Forest Diversion) के प्रस्तावों में सरकार APDCL को सिर्फ एक चेहरे के तौर पर इस्तेमाल कर रही है, जबकि इन परियोजनाओं के असली लाभार्थी और डेवलपर निजी कंपनियां हैं।

बिना अधिकार तय किए डाइवर्जन पर सवाल

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जाने-माने अधिवक्ता शांतनु बोरठाकुर ने वन भूमि को डाइवर्ट करने के आधार पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। उनका कहना है कि उस जमीन पर रहने वाले मूल निवासियों के अधिकारों का निपटारा किए बिना डाइवर्जन की प्रक्रिया शुरू करना पूरी तरह गलत है।

NorthEast Now की रिपोर्ट के अनुसार, बोरठाकुर ने कहा, "सबसे अहम सवाल यह है कि जिस वन भूमि को पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट्स के लिए लिया जा रहा है, वहां पहले से रह रहे लोगों का क्या होगा? आदिवासियों के अधिकारों के मुद्दे को सुलझाए बिना ही नई परियोजनाओं के लिए जमीन की योजना बनाई जा रही है, जिससे उनके भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग गया है।"

उन्होंने जोर देकर कहा कि डाइवर्जन पर किसी भी चर्चा से पहले वन अधिकार कानून के तहत आदिवासियों के हकों को मान्यता मिलनी चाहिए।

छठी अनुसूची की मूल भावना पर प्रहार

वरिष्ठ वकील ने चेतावनी दी कि ये परियोजनाएं छठी अनुसूची के तहत मिलने वाले संवैधानिक संरक्षण पर सीधा हमला हैं। उन्होंने कहा, "छठी अनुसूची का उद्देश्य आदिवासी लोगों की संस्कृति, जमीन और सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करना है। लेकिन सरकार वहां बड़े पैमाने पर प्रोजेक्ट शुरू करके विस्थापन का कारण बन रही है। यह छठी अनुसूची की मूल अवधारणा को ही कमजोर और विकृत कर देगा।"

बोरठाकुर ने APDCL के नेतृत्व वाले इन प्रस्तावों को अवैध बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार कानून का दुरुपयोग कर रही है। उनके मुताबिक, "चूंकि छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों में सीधे कॉर्पोरेट कंपनियों को जमीन देना कानूनी रूप से मुश्किल है, इसलिए सरकार APDCL को एक 'ढाल' (Shield) या प्रॉक्सी के रूप में इस्तेमाल कर रही है ताकि पर्यावरण मंजूरी हासिल की जा सके। यह और कुछ नहीं, बल्कि अवैध तरीके से कॉर्पोरेट लैंड ग्रैबिंग की कोशिश है।"

कार्बी आंगलोंग को 'कॉर्पोरेट कॉलोनी' बनाने का आरोप

संयुक्त भूमि अधिकार संघर्ष समिति (Joint Land Rights Struggle Committee) के संयोजक सुब्रत तालुकदार ने भी इन चिंताओं का समर्थन करते हुए कहा कि कार्बी आंगलोंग को व्यवस्थित तरीके से कॉर्पोरेट शोषण के लिए खोला जा रहा है।

तालुकदार ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, "कार्बी आंगलोंग को अडानी, अंबानी, गोदरेज, पतंजलि और ग्रीनको जैसे बड़े कॉर्पोरेट घरानों के लिए एक कॉलोनी में बदला जा रहा है। 2021 में हिमंत बिस्वा सरमा के मुख्यमंत्री बनने के बाद से, जिले में लगभग 1.5 लाख बीघा जमीन निजी कंपनियों को सौंपने की योजना चल रही है।"

उनका मानना है कि पारंपरिक कृषि भूमि को बाहरी व्यावसायिक हितों के लिए हस्तांतरित करने से स्थानीय अर्थव्यवस्था, राजनीति और संस्कृति धीरे-धीरे नष्ट हो रही है।

जनसुनवाई और अध्ययन का अभाव

तालुकदार ने हाल ही में PSPs से जुड़े बेदखली के प्रयासों की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि इन बड़े प्रोजेक्ट्स के नाम पर कई गांवों से लोगों को हटाने की कोशिशें हुई हैं, लेकिन इसके लिए स्थानीय जनता के साथ कोई विचार-विमर्श नहीं किया गया। इसके अलावा, इन परियोजनाओं का पर्यावरण और जैव विविधता पर क्या असर पड़ेगा, इसका कोई अध्ययन (Impact Assessment) भी नहीं हुआ है।

हालांकि, स्थानीय प्रतिरोध ने अब तक कई परियोजनाओं की रफ्तार को रोक रखा है। तालुकदार ने कहा, "कार्बी आंगलोंग के लोग लोकतांत्रिक तरीके से एकजुट होकर इसके खिलाफ लड़ रहे हैं, लेकिन सरकार उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है। जनता के आंदोलन की वजह से ही सरकार अब तक कई मंसूबों को लागू करने में विफल रही है।" उन्होंने मांग की है कि इन पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट्स को स्थायी रूप से रद्द किया जाना चाहिए।

कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर APDCL को निजी कंपनियों के लिए एक मुखौटे के रूप में काम करने की अनुमति दी गई, तो यह वन अधिकार अधिनियम को कमजोर करेगा और देश भर के आदिवासी क्षेत्रों के लिए एक खतरनाक मिसाल कायम करेगा।