'इंदौर' देश के सबसे स्वच्छ शहर का कड़वा सच: करोड़ों खर्च, फिर भी नल ने उगला ज़हर!

10:36 AM Jan 11, 2026 | Ankit Pachauri

भोपाल। देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा पाने वाला इंदौर आज अपने ही दावों में उलझता नजर आ रहा है। नगर निगम ने शहरवासियों को 24 घंटे शुद्ध पानी देने का सपना दिखाया, लेकिन हकीकत यह है कि लोगों को शुद्ध जल तो दूर, कई इलाकों में पीने लायक पानी भी नसीब नहीं हो रहा। करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद शहर के नलों से गंदा और बदबूदार पानी आ रहा है, जिससे लोग बीमार पड़ रहे हैं और अस्पतालों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

पिछले चार वर्षों में इंदौर नगर निगम ने स्वच्छता और जल प्रबंधन पर करीब आठ हजार करोड़ रुपये खर्च किए हैं। चालू वित्तीय वर्ष में भी 2450 करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य तय किया गया है। इसके बावजूद जल आपूर्ति व्यवस्था की बदहाली ने नगर निगम के दावों की पोल खोल दी है।

हर साल 250 करोड़, फिर भी पानी गंदा

नगर निगम के आंकड़ों के मुताबिक, हर साल करीब 250 करोड़ रुपये सिर्फ जल आपूर्ति और प्रबंधन पर खर्च किए जाते हैं। इसमें जलूद से इंदौर तक नर्मदा का पानी लाने, पंपिंग स्टेशन चलाने, बिजली बिल, पाइप लाइन मेंटेनेंस, बोरिंग की देखरेख और टंकियों के रख-रखाव का खर्च शामिल है।

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अधिकारियों का दावा है कि जलूद से इंदौर तक पानी लाने में हर साल करोड़ों रुपये बिजली और रख-रखाव पर खर्च होते हैं। इसी वजह से इंदौर का पानी देश में सबसे महंगा माना जाता है। लेकिन सवाल यह है कि जब लोग इतना महंगा पानी पी रहे हैं, तो उन्हें शुद्ध और सुरक्षित पानी क्यों नहीं मिल रहा?

जलूद से शुद्ध, शहर में पहुंचते ही दूषित

जांच में सामने आया कि जलूद में पानी की क्वालिटी ठीक रहती है। ट्रीटमेंट प्लांट में पानी को फिल्टर और ट्रीट कर शहर की टंकियों तक पहुंचाया जाता है। शहर में बनी 105 टंकियों तक पानी की गुणवत्ता सामान्य रहती है, लेकिन जैसे ही यह पानी रहवासी इलाकों की पाइप लाइनों में जाता है, कई जगहों पर 500 मीटर के भीतर ही दूषित हो जाता है।

मुख्य वजह नर्मदा पाइप लाइनों में लीकेज और सीवरेज लाइनों का चोक होना है। कई इलाकों में ड्रेनेज लाइन और नर्मदा लाइन एक-दूसरे के बहुत पास हैं। जब सीवरेज लाइन चोक होती है या पाइप फटती है, तो गंदा पानी नर्मदा लाइन में मिल जाता है। इसी वजह से लोगों के घरों तक पहुंचने वाला पानी बदबूदार और गंदा हो जाता है।

दूषित पानी से मौतें, फिर भी लापरवाही

दूषित पानी का सबसे भयावह असर भागीरथपुरा इलाके में देखने को मिला, जहां अब तक 21 लोगों की मौत हो चुकी है। कई लोग उल्टी-दस्त, टाइफाइड, पीलिया और पेट की गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। सरकारी और निजी अस्पतालों में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया गया। पाइप लाइन की मरम्मत कुछ दिनों के लिए की जाती है, लेकिन थोड़े समय बाद फिर वही हालात बन जाते हैं।

पानी पर करोड़ों का हिसाब

  • नगर निगम के बजट और खर्च का ब्यौरा देखे तो हालात और भी चौंकाने वाले हैं।

  • हर साल 250 करोड़ रुपये से अधिक सिर्फ जल प्रबंधन पर खर्च

  • जलूद में बने पंपिंग स्टेशन और वहां से इंदौर तक पानी लाने के लिए करीब 225 करोड़ रुपये बिजली और संचालन पर।

  • शहर में नर्मदा पाइप लाइनों के मेंटेनेंस पर 25 करोड़ रुपये।

  • नई टंकियों और पाइप लाइनों के निर्माण पर 25 करोड़ रुपये।

  • जलूद में पानी के ट्रीटमेंट और नर्मदा लाइन के मेंटेनेंस पर करीब 7 करोड़ रुपये।

इतने बड़े खर्च के बाद भी अगर लोगों को साफ पानी नहीं मिल रहा, तो यह सिस्टम पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

तीन हजार किलोमीटर पाइप, फिर भी रिसाव

शहर में करीब तीन हजार किलोमीटर लंबाई में नर्मदा पाइप लाइन बिछी हुई है। वहीं लगभग 2200 किलोमीटर में सीवरेज लाइन फैली है। कई जगह दोनों लाइनें बेहद पास-पास हैं। पुरानी और जर्जर पाइप लाइनों में जगह-जगह लीकेज हो रहा है। सीवरेज लाइन के चैंबर चोक होने पर गंदा पानी आसपास फैल जाता है और नर्मदा लाइन में मिल जाता है।

नगर निगम ड्रेनेज लाइनों के मेंटेनेंस पर हर साल करीब 50 करोड़ रुपये खर्च करता है। इसके अलावा 50 करोड़ रुपये नई ड्रेनेज लाइन और चैंबरों के निर्माण पर खर्च किए जाते हैं। बावजूद इसके, सीवरेज सिस्टम की हालत सुधर नहीं पा रही।

लोग बोले- टैक्स भी दें, इलाज का खर्च भी उठाएं?

शहरवासियों में भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि वे नगर निगम को टैक्स भी देते हैं और गंदे पानी से बीमार होकर इलाज का खर्च भी खुद ही उठाते हैं।

'स्वच्छ शहर' के दावे पर सवाल

इंदौर को लगातार कई बार सबसे स्वच्छ शहर का खिताब मिला है। सड़कों की सफाई, कचरा प्रबंधन और प्रचार-प्रसार पर करोड़ों खर्च हुए हैं। लेकिन साफ पानी जैसी बुनियादी जरूरत पर नगर निगम फेल नजर आ रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ नई योजनाएं बनाने से काम नहीं चलेगा। पुरानी पाइप लाइनों को चरणबद्ध तरीके से बदलना, सीवरेज और पेयजल लाइनों के बीच सुरक्षित दूरी बनाना और नियमित जांच जरूरी है। जब तक सिस्टम की जड़ में सुधार नहीं होगा, तब तक करोड़ों खर्च करने के बावजूद नल से गंदा पानी ही आएगा।