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बोध गया मंदिर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में अंतिम सुनवाई 28 अप्रैल को; जानिये अब तक क्या हुआ

नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने बोध गया मंदिर प्रबंधन अधिनियम (बीटी एक्ट 1949) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली लंबित याचिका में महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जोयमल्या बगची की बेंच ने फरवरी 17 को मुख्य याचिका (डब्ल्यूपी (सिविल) 380/2012) पर सुनवाई के बाद मामले को अंतिम सुनवाई के लिए 28 अप्रैल तय कर दिया है। यह याचिका भंते आर्य नागार्जुन शूरै सासाई और अन्य द्वारा केंद्र सरकार एवं अन्य पक्षों के खिलाफ दायर की गई है।

मामले का मुख्य मुद्दा 1949 के बोध गया मंदिर प्रबंधन अधिनियम (संशोधनों सहित) की संवैधानिक वैधता से जुड़ा है। यह अधिनियम यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल महाबोधि महाविहार के प्रबंधन को नियंत्रित करता है जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति हुई। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि एक्ट में प्रबंधन समिति में बराबर गैर-बौद्ध सदस्यों (जिसमें गया जिले का जिला मजिस्ट्रेट भी शामिल है) की व्यवस्था बौद्धों के साथ भेदभाव करती है। वे मांग कर रहे हैं कि महाविहार का पूर्ण नियंत्रण बौद्ध समुदाय को सौंपा जाए।

महाबोधि मुक्ति आंदोलन 12 फरवरी 2025 से तेज हुई थी, जब बौद्ध भिक्षुओं और अनुयायियों ने बोधगया स्थित महाबोधि महाविहार मंदिर को गैर-बौद्धों के नियंत्रण से मुक्त करने की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया। उनकी मांग है कि मंदिर का प्रबंधन पूरी तरह से बौद्ध समुदाय को सौंपा जाए और 1949 के बोधगया टेंपल एक्ट को रद्द किया जाए।

बौद्ध पक्ष से वकील आनंद जोंधले ने द मूकनायक को सुप्रीम कोर्ट में 17 फरवरी को हुई सुनवाई के बाद दिए गए निर्देशों के बारे में बताया। कोर्ट ने कई आवेदकों (निजी संस्थाओं और संगठनों) को हस्तक्षेपकर्ता के रूप में सहायता करने की अनुमति दी है, क्योंकि उनकी अलग-अलग स्थिति (locus standi) है।

केंद्र सरकार और हस्तक्षेपकर्ताओं को यदि कोई काउंटर एफिडेविट देना हो तो उन्हें 4 सप्ताह के भीतर दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। आगे कोई छूट नहीं मिलेगी। बेंच ने केंद्र और बिहार सरकार को सुझाव दिया कि सभी याचिकाओं के मुद्दों को कवर करने वाला एक साझा और विस्तृत काउंटर एफिडेविट दाखिल किया जाए। याचिकाकर्ताओं को काउंटर एफिडेविट मिलने के 2 सप्ताह के भीतर रिजॉइंडर दाखिल करना होगा, जिसमें भी कोई अतिरिक्त स्थगन नहीं दिया जाएगा।

इसके बाद सभी पक्षों को 4 सप्ताह का समय दिया गया है कि वे लिखित दलीलें (written submissions) और संबंधित कानूनों तथा केस लॉ की संकलन (convenience compilations) जमा करें।

नए जुड़े मामलों में औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया गया, लेकिन याचिकाओं की प्रतियां बिहार के वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत सिंह और केंद्र के एओआर को दी जाएंगी। काउंटर एफिडेविट दाखिल होने पर इसकी सॉफ्ट कॉपी याचिकाकर्ताओं के वकीलों को केवल अंतिम सुनवाई में सहायता के लिए उपलब्ध कराई जाएगी।

यह आदेश पिछले चरणों की निरंतरता में महत्वपूर्ण है, इससे पहले अक्टूबर 2025 में संशोधन मंजूर हुआ था, दिसंबर 2025 में रिजॉइंडर के लिए समय मांगा गया था। 2012 से चल रहे इस मामले में दर्जनों हस्तक्षेप याचिकाएं शामिल हैं, जो महाबोधि महाविहार पर बौद्ध नियंत्रण के 134 वर्ष पुराने संघर्ष को दर्शाती हैं।

महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता, विशेषकर ऑल इंडिया बुद्धिस्ट फोरम के सदस्यों ने समयसीमा तय होने को सकारात्मक कदम बताया है। समुदाय का मानना है कि 28 अप्रैल की सुनवाई निर्णायक साबित होगी और धार्मिक स्थलों के प्रबंधन में ऐतिहासिक बदलाव ला सकती है।

महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन बोधगया (बिहार) स्थित विश्व प्रसिद्ध महाबोधि मंदिर के प्रबंधन को 1949 के मंदिर अधिनियम से मुक्त कराकर पूरी तरह बौद्ध समुदाय (भिक्षु संघ) को सौंपने का संघर्ष है। यह आंदोलन बौद्ध धर्म के सबसे पवित्र स्थल पर बौद्धों का प्रभावी नियंत्रण सुनिश्चित करने, मंदिर में हिंदू अनुष्ठानों को रोकने और 1949 बोधगया टेम्पल एक्ट में बदलाव की मांग करता है।

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