Rajasthan High Court: ट्रांसजेंडरों को 3% अतिरिक्त अंक, OBC लिस्टिंग पर राज्य को फटकार- Trans Bill 2026 पर कही ये बड़ी बात

01:13 PM Mar 31, 2026 | Geetha Sunil Pillai

जोधपुर- राजस्थान उच्च न्यायालय की जोधपुर खंडपीठ ने ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए क्षैतिज आरक्षण की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार की 12 जनवरी 2023 की अधिसूचना को पूरी तरह निरर्थक और दिखावा करार देते हुए उसे खारिज करने का संकेत दिया है। अदालत ने राज्य सरकार की इस नीति की आलोचना करते हुए कहा कि ट्रांसजेंडरों को सिर्फ अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की सूची में डाल देना भ्रम पैदा करने जैसा है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सुप्रीम कोर्ट के नालसा (NALSA) फैसले के अनुसार ट्रांसजेंडरों को अलग से क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) दिया जाना चाहिए, न कि उन्हें मौजूदा आरक्षित श्रेणियों में घोल दिया जाए।

जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता गंगा कुमारी की याचिका का निपटारा करते हुए राज्य सरकार को अंतरिम राहत देते हुए ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को चयन और नियुक्ति में 3 प्रतिशत अतिरिक्त वेटेज देने का आदेश जारी किया है। साथ ही सरकार को एक उच्चस्तरीय समिति गठित कर ट्रांसजेंडर समुदाय की वास्तविक स्थिति का अध्ययन करने और सार्थक आरक्षण नीति बनाने का निर्देश दिया है।

खंडपीठ ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के एनएएलएसए बनाम भारत संघ ( NALSA 2014) के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति तीसरे लिंग के रूप में मान्यता प्राप्त हैं और उन्हें सामाजिक-शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के रूप में आरक्षण का पूरा लाभ मिलना चाहिए। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार का यह नोटिफिकेशन केवल एक औपचारिकता है, जिससे ट्रांसजेंडर समुदाय को कोई ठोस लाभ नहीं मिला है। अदालत ने टिप्पणी की:

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"हम यह कहने को विवश हैं कि विवादित सर्कुलर सिर्फ एक दिखावा और धोखा है। ऐसा लगता है कि यह बिना सार के सिर्फ एक औपचारिकता भर का प्रयास है। यह कोई वास्तविक आरक्षण प्रदान नहीं करता; यह केवल उसी बात को दोहराता है जो सुप्रीम कोर्ट ने NALSA में कही थी। यह महज एक भ्रम है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत आवश्यक आरक्षण की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।"

राज्य सरकार ने ट्रांसजेंडरों को ओबीसी श्रेणी में शामिल किया

याचिका में गंगा कुमारी ने राज्य सरकार की अधिसूचना को चुनौती दी थी जिसमें ट्रांसजेंडरों को ओबीसी श्रेणी में शामिल कर दिया गया था, लेकिन क्षैतिज आरक्षण नहीं दिया गया। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इससे ट्रांसजेंडर समुदाय को कोई फायदा नहीं पहुंचा, बल्कि एससी/एसटी परिवार से आने वाले ट्रांसजेंडरों को दोहरी मार पड़ी।

अदालत ने याचिकाकर्ता की इस दलील को सही ठहराते हुए कहा कि अधिसूचना ने बिना कोई अतिरिक्त लाभ दिए, पूर्ववर्ती आरक्षण अधिकारों को समाप्त कर दिया। अदालत ने आगे कहा, “ट्रांसजेंडर व्यक्ति विभिन्न वर्गों से आते हैं- सामान्य, ईडब्ल्यूएस, ओबीसी, एससी, एसटी। आरक्षण की व्यवस्था में क्षैतिज आरक्षण आनुपातिक होना चाहिए। ट्रांसजेंडरों की आबादी महज 0.024 प्रतिशत है, लेकिन इससे उन्हें अलग क्षैतिज आरक्षण देने पर रिक्तियां बहुत देर बाद निकलतीं और उम्मीदवारों को इंतजार करना पड़ता।”

ट्रांसजेंडर समुदाय की गरिमा पर जोर

अदालत ने भारतीय सभ्यता और पौराणिक कथाओं का जिक्र करते हुए ट्रांसजेंडर समुदाय की गरिमा पर जोर दिया। फैसले में लिखा गया, “मोहिनी, इला, बृहनलला, अर्धनारीश्वर जैसी पौराणिक कथाएं ट्रांसजेंडर पहचान को अपनाती हैं। बहुचरा माता, अंगालम्मा और येल्लम्मा जैसी देवियां ट्रांसजेंडर समुदाय द्वारा पूजी जाती हैं।” लेकिन वास्तविकता में समाज उन्हें किनारे कर देता है।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एनएएलएसए फैसले के महत्वपूर्ण अंशों का हवाला देते हुए कहा, “समाज शायद ही कभी समझता है या समझने की परवाह करता है कि ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों को किस मानसिक आघात, वेदना और पीड़ा का सामना करना पड़ता है।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि एनएएलएसए फैसले ने केंद्र और राज्य सरकारों को ट्रांसजेंडरों को सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़े वर्ग मानकर शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में सभी प्रकार के आरक्षण देने का निर्देश दिया था।

राज्य सरकार के तर्क को खारिज किया

राज्य सरकार की ओर से यह तर्क रखा गया कि आरक्षण की संरचना बनाना कार्यपालिका और विधायिका का विषय है, जिसमें कोर्ट हस्तक्षेप नहीं कर सकता। साथ ही, यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक अन्य याचिका (किरण ए.आर. बनाम यूनियन ऑफ इंडिया) से जुड़ा होने के कारण इसे खारिज किया जाना चाहिए। राज्य सरकार की ओर से पेश किए गए जवाब में कहा गया था कि ट्रांसजेंडरों को ओबीसी में शामिल कर दिया गया है और वे सभी लाभ ले सकते हैं। लेकिन अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि 2023 की अधिसूचना जारी होने के बाद भी एक भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को इसका लाभ नहीं मिला।

अदालत ने टिप्पणी की, “राज्य सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के तहत ट्रांसजेंडरों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी, लेकिन व्यावहारिक रूप से कोई कदम नहीं उठाया।” अदालत ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकार संरक्षण) अधिनियम 2019 की धारा 8 का भी हवाला दिया जिसमें सरकार को ट्रांसजेंडरों के पूर्ण सामाजिक समावेश के लिए कल्याणकारी योजनाएं बनाने का आदेश है। अदालत ने कहा कि पेंडिंग केस में केंद्रीय मेडिकल प्रवेश की बात है, जबकि यह मामला राज्य सरकार के नोटिफिकेशन की वैधता से जुड़ा है, जो पूरी तरह से अलग है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जहां नीति बनाना कार्यपालिका का काम है, वहीं संविधान के उल्लंघन की स्थिति में न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है।

कर्नाटक मॉडल की सराहना

खंडपीठ ने राज्य सरकार को एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्देश दिया जिसमें सामाजिक कल्याण विभाग के प्रधान सचिव की अध्यक्षता में वरिष्ठ अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रतिनिधि शामिल हों। समिति को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की दोहरी हाशिएकरण की स्थिति का अध्ययन कर सुझाव देने हैं। समिति की रिपोर्ट के आधार पर सरकार को उचित नीति बनाने को कहा गया है। तब तक अंतरिम व्यवस्था के तहत ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को राज्य सरकार, उसके उपक्रमों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और सहायता प्राप्त संस्थानों में नौकरी चयन और शैक्षणिक प्रवेश में अधिकतम निर्धारित अंकों में 3 प्रतिशत अतिरिक्त वेटेज देने का आदेश दिया गया है।

अदालत ने कर्नाटक और तमिलनाडु के मॉडल का जिक्र करते हुए कहा कि इन राज्यों ने ट्रांसजेंडरों के लिए 1 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण दिया है। फैसले में कर्नाटक सिविल सेवा नियमों का उदाहरण दिया गया जिसमें हर श्रेणी में 1 प्रतिशत पद ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों के लिए आरक्षित किए गए हैं। अदालत ने राजस्थान विधानसभा से अपील की कि वे कर्नाटक कानून को मॉडल बनाकर अपना कानून बनाएं।

फैसले के एपिलॉग में जस्टिस अरुण मोंगा ने संसद द्वारा पारित ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकार संरक्षण) संशोधन विधेयक 2026 का जिक्र करते हुए चेतावनी दी। विधेयक में स्व-घोषित लिंग पहचान का अधिकार हटाने का प्रावधान है। अदालत ने कहा, “स्व-निर्धारण का अधिकार गरिमा, स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है। राज्य को इस संशोधन के बावजूद भी संवैधानिक गारंटी को कमजोर नहीं होने देना चाहिए।” अदालत ने स्पष्ट किया कि नीति बनाते समय राज्य को स्व-पहचान के सिद्धांत को पूरी तरह बनाए रखना चाहिए।