भोपाल। "अगर आयोग भी सुनवाई नहीं करेगा, तो न्याय मिलेगा कहां?" यह सवाल उन हजारों पीड़ितों का है, जिन्होंने मध्य प्रदेश राज्य अनुसूचित जाति आयोग, राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग और राज्य महिला आयोग में शिकायतें दर्ज करवाईं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो सकी। वजह—इन आयोगों में मार्च 2023 से कोई अध्यक्ष या सदस्य नहीं है। सरकार नियुक्तियां करने में असफल रही है और अब शिकायतों की संख्या एक लाख के करीब पहुंच चुकी है।
दो साल से खाली पड़ी आयोगों की कुर्सियां
मार्च 2023 में अनुसूचित जाति आयोग के सदस्य प्रदीप अहिरवार का कार्यकाल समाप्त हो गया। वहीं, राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष शोभा ओझा की नियुक्ति मार्च 2020 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने की थी, लेकिन भाजपा ने कमलनाथ सरकार गिरते ही यह नियुक्तियां निरस्त कर दीं। तब से लेकर अब तक कोई नई नियुक्ति नहीं हुई।
राज्य महिला आयोग से मिली जानकारी के मुताबिक हर महीने आयोग को करीब 300 शिकायतें मिलती हैं, यानी साल भर में लगभग 3,000 शिकायतें। कुछ मामलों का निपटारा विभागीय रिपोर्ट के आधार पर हो जाता है, लेकिन बाकी शिकायतें तब तक लंबित रहती हैं जब तक अध्यक्ष या सदस्य नियुक्त नहीं होते। यही हाल SC/ST आयोगों का भी है। अब तीनों आयोगों में लंबित मामलों की संख्या करीब 1 लाख हो चुकी है।
पीड़ितों की आवाज कौन सुनेगा?
द मूकनायक से बातचीत में आदिवासी विकास परिषद (छात्र विभाग) के प्रदेश अध्यक्ष नीरज बारिवा ने आयोगों की निष्क्रियता पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा, "आदिवासी समाज पर लगातार अत्याचार और अन्याय की घटनाएं हो रही हैं, लेकिन जब हम अनुसूचित जनजाति आयोग में शिकायत दर्ज कराते हैं, तो मामला प्रशासन या पुलिस के पास भेज दिया जाता है। सवाल यह है कि यदि प्रशासन से ही न्याय मिल जाता, तो फिर हमें आयोग की शरण लेने की जरूरत ही क्यों पड़ती?"
उन्होंने आगे कहा कि आयोगों में अध्यक्ष और सदस्यों की गैर-मौजूदगी से न्याय प्रक्रिया ठप पड़ी है, जिससे पीड़ितों को समय पर राहत नहीं मिल पा रही। "यह न केवल हमारे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि न्याय में अनावश्यक देरी भी अन्याय के समान है। हमें त्वरित और निष्पक्ष न्याय मिलना चाहिए,"
SC/ST आयोगों में भी ऐसे हजारों मामले लंबित पड़े हैं। कई दलित और आदिवासी पीड़ित न्याय की आस लगाए बैठे हैं, लेकिन आयोगों में निर्णय लेने वाला कोई नहीं है।
आयोगों को प्राप्त हैं सिविल न्यायालय जैसी शक्तियां
आयोगों को संविधान के तहत सिविल न्यायालय की शक्तियां प्राप्त हैं। जब किसी शिकायतकर्ता को प्रशासन या पुलिस से न्याय नहीं मिलता, तो वह आयोग का दरवाजा खटखटाता है। आयोग संबंधित विभाग से जांच प्रतिवेदन मांगता है और जब पीड़ित संतुष्ट नहीं होता, तो सुनवाई के लिए अधिकारियों की पेशी लगाई जाती है। लेकिन जब खुद आयोगों में अध्यक्ष और सदस्य नहीं हैं, तो यह प्रक्रिया ही रुक जाती है।
नियुक्तियों को लेकर सरकार की चुप्पी
राज्य अनुसूचित जाति आयोग के पूर्व सदस्य प्रदीप अहिरवार ने द मूकनायक से बातचीत में कहा, "यह संवैधानिक नियुक्तियां होती हैं। शिवराज सरकार ने इन्हें निरस्त किया, जिसे हाईकोर्ट ने स्टे कर दिया था। अब दो साल से नियुक्तियां नहीं हुईं। सरकार को जवाब देना चाहिए कि क्यों SC/ST और महिलाओं के मामलों को इतने लंबे समय तक लटकाया गया?"
पूर्व महिला आयोग सदस्य संगीता शर्मा ने बताया कि 2020 में जब आयोग गठित हुआ, तब भी 10 हजार मामले पेंडिंग थे। अब यह संख्या कई गुना बढ़ चुकी है। "सरकार महिलाओं के अधिकारों की बात तो करती है, लेकिन न्याय दिलाने के लिए गंभीर नहीं है,"
क्या अन्य राज्यों में भी ऐसा ही है?
अगर अन्य राज्यों से तुलना करें, तो कई राज्यों में आयोगों में नियमित नियुक्तियां होती हैं, जिससे शिकायतों का निपटारा समय पर हो पाता है। लेकिन मध्य प्रदेश में आयोगों को लेकर सरकार की उदासीनता ने न्याय प्रक्रिया को ठप कर दिया है। छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में आयोगों की नियुक्तियां समय पर हो जाती हैं, जिससे वहां न्याय व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहती है।
कब तक मिलेगी न्याय की आस?
आयोगों के बिना हजारों पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पा रहा। मामले पुलिस और प्रशासन के भरोसे भेजे जा रहे हैं, लेकिन उनकी निष्पक्षता पर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं।
सरकार की तरफ से अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इन नियुक्तियों में देरी क्यों हो रही है। विपक्षी दल लगातार सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि वह SC/ST और महिलाओ से जुड़े मामलों को गंभीरता से नहीं ले रही है। अब सवाल यह है कि सरकार कब तक इन आयोगों को निष्क्रिय रखेगी?