नई दिल्ली- अशोक जयंती भारत में एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में उभरती है, जो मौर्य वंश के सबसे परिवर्तनकारी शासकों में से एक—सम्राट अशोक के जन्म की स्मृति में मनाई जाती है। मुख्य रूप से भारत के कुछ हिस्सों, विशेषकर बिहार में मनाया जाने वाला यह दिन, अशोक के उस योगदान को सम्मान देता है, जिसमें उन्होंने एक विजेता से शांति, अहिंसा और बौद्ध धर्म के समर्थक के रूप में परिवर्तन किया। हर साल चैत्र माह की अष्टमी अशोक जयंती के रूप में मनाई जाती है और इस बार 5 अप्रैल को अशोक जन्मोत्सव मनाया जाएगा।
इस वर्ष अशोक जयंती का महत्व और भी बढ़ गया है, क्योंकि बिहार के बोधगया में लगभग दो माह से हजारों बौद्ध अनुयायी 'महाबोधी महाविहार मुक्ति आंदोलन' के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। यह स्थान वही पावन भूमि है जहां सम्राट अशोक ने भगवान बुद्ध के ज्ञानोदय स्थल पर एक मंदिर का निर्माण करवाया था। प्रदर्शनकारी इस यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के प्रबंधन में अधिक स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं, जो अशोक की बौद्ध धर्म को बढ़ावा देने और धार्मिक स्वतंत्रता की विरासत को आगे बढ़ाता है। सम्राट की जयंती का यह समय आध्यात्मिक विरासत और संस्थागत नियंत्रण के बीच चल रहे टकराव को उजागर करता है, जिसने अशोक जयंती को एक सामयिक आंदोलन का मंच बना दिया है।
भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों में सम्राट अशोक की छाप गहरी और स्थायी है। मौर्य वंश के इस महान शासक, जिन्होंने लगभग 268 ईसा पूर्व से 232 ईसा पूर्व तक शासन किया, ने न केवल प्राचीन भारत को एकजुट किया, बल्कि अपने शासनकाल में अपनाए गए मूल्यों को भी एक ऐसी विरासत के रूप में छोड़ा, जो आज भी देश के प्रतीकों में प्रतिबिंबित होती है। अशोक के शिलालेखों और उनके द्वारा स्थापित स्तंभों से लिए गए दो प्रमुख राष्ट्रीय प्रतीक—अशोक चक्र और अशोक का सिंह शीर्ष—भारत की पहचान का अभिन्न अंग हैं। यह विस्तृत रिपोर्ट प्रामाणिक और सत्यापित जानकारी के आधार पर बताती है कि ये प्रतीक क्या हैं, ये क्या दर्शाते हैं और भारत अशोक के प्रति क्यों आभारी है।
सम्राट अशोक से प्रेरित राष्ट्रीय प्रतीक
भारत ने अपनी स्वतंत्रता के बाद अपनी राष्ट्रीय पहचान को परिभाषित करने के लिए अशोक के प्रतीकों को चुना। ये प्रतीक न केवल ऐतिहासिक महत्व रखते हैं, बल्कि उन मूल्यों को भी प्रतिबिंबित करते हैं, जिन्हें अशोक ने अपने शासनकाल में स्थापित किया था। आइए इन प्रतीकों को विस्तार से समझें:
अशोक चक्र (राष्ट्रीय ध्वज का चक्र)
क्या है?: अशोक चक्र एक 24 तीलियों वाला नीला चक्र है, जो भारत के राष्ट्रीय ध्वज के केंद्र में सफेद पट्टी पर अंकित है। यह मूल रूप से सारनाथ में अशोक के शिलास्तंभ पर चक्र के रूप में मौजूद था, जिसे 250 ईसा पूर्व के आसपास स्थापित किया गया था। 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता के बाद इसे ध्वज में शामिल किया गया, जिसे संविधान सभा ने मंजूरी दी।
प्रामाणिक स्रोत: यह चक्र अशोक के शिलालेखों और बौद्ध प्रतीकवाद से लिया गया है। सारनाथ का शिलास्तंभ, जिसे अशोक ने बुद्ध के प्रथम उपदेश की स्मृति में बनवाया था, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित है और इसकी प्रामाणिकता निर्विवाद है।
क्या दर्शाता है?: अशोक चक्र धम्मचक्र (धर्म का चक्र) का प्रतीक है, जो बौद्ध धर्म में सत्य, नैतिकता और प्रगति का संकेत देता है। 24 तीलियाँ दिन के 24 घंटों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो निरंतर गति और जीवन के चक्र को दर्शाती हैं। स्वतंत्र भारत में, यह शाश्वत प्रगति और शांति का प्रतीक बन गया।
ऐतिहासिक संदर्भ: अशोक के 13वें शिलालेख में कलिंग युद्ध के बाद उनकी अहिंसा और धम्म की प्रतिबद्धता का उल्लेख है, जिसने उन्हें बौद्ध धर्म की ओर प्रेरित किया। यह चक्र उसी धम्म का प्रतीक है, जिसे उन्होंने अपने साम्राज्य में लागू किया।
अशोक का सिंह शीर्ष (राष्ट्रीय प्रतीक)
क्या है?: अशोक का सिंह शीर्ष भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है, जिसमें चार एशियाई शेरों की मूर्तियाँ हैं, जो एक गोल आधार पर खड़े हैं। यह मूल रूप से सारनाथ के अशोक स्तंभ के शीर्ष पर स्थापित था। आज, केवल तीन शेर दिखाई देते हैं, क्योंकि चौथा पीछे की ओर है और दृश्य से छिपा हुआ है।
प्रामाणिक स्रोत: यह प्रतीक सीधे सारनाथ के अशोक स्तंभ से लिया गया है, जिसे 26 जनवरी, 1950 को भारत के संविधान सभा द्वारा राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया। मूल मूर्ति अभी भी सारनाथ संग्रहालय में संरक्षित है।
क्या दर्शाता है?: चार शेर शक्ति, साहस, आत्मविश्वास और गर्व का प्रतीक हैं। आधार पर अंकित अशोक चक्र और अन्य जानवरों (घोड़ा, बैल) के साथ यह एकता, शांति और प्रगति का संदेश देता है। इसके नीचे लिखा गया मंत्र “सत्यमेव जयते” (सत्य की ही जीत होती है), जो मुंडक उपनिषद से लिया गया है, अशोक के धम्म के सिद्धांतों से मेल खाता है।
ऐतिहासिक संदर्भ: अशोक ने अपने साम्राज्य में कई स्तंभ स्थापित किए, जिन पर उनके धम्म के संदेश अंकित थे। सारनाथ का स्तंभ इनमें सबसे प्रसिद्ध है, जो बौद्ध धर्म के प्रसार और अशोक की शासन नीतियों का साक्षी है।

भारत अशोक का आभारी क्यों है?
अशोक के प्रति भारत का आभार उनके द्वारा स्थापित मूल्यों और उनकी दूरदर्शी शासन नीतियों में निहित है, जो आज भी देश के लोकाचार को प्रभावित करते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख कारण हैं:
शांति और अहिंसा का संदेश:
अशोक का सबसे बड़ा योगदान कलिंग युद्ध (261 ईसा पूर्व) के बाद हिंसा का त्याग और अहिंसा को अपनाना था। उनके 13वें शिलालेख में लिखा है कि युद्ध में हुई तबाही—1 लाख से अधिक मृत्यु और 1.5 लाख का निर्वासन—ने उन्हें बौद्ध धर्म की ओर प्रेरित किया। यह परिवर्तन भारत के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के दर्शन का आधार बना, जिसे महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने भी अपनाया।
राष्ट्रीय प्रतीकों में यह शांति अशोक चक्र के रूप में प्रतिबिंबित होती है, जो हिंसा के बजाय प्रगति और नैतिकता पर जोर देता है।
सामाजिक कल्याण और समानता:
अशोक के शिलालेखों (जैसे 2रा और 7वां शिलालेख) में उनके द्वारा शुरू किए गए कल्याणकारी कार्यों का उल्लेख है—जैसे अस्पताल, सड़कों पर पेड़, कुएँ और शिक्षा का प्रसार। वे अपने प्रजाजनों को सन्तान के रूप में देखते थे, जो उनके शासन में मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाता है।
सिंह शीर्ष का आधार और “सत्यमेव जयते” सत्य और न्याय पर आधारित शासन की उनकी नीति को प्रतिबिंबित करते हैं।
धार्मिक सहिष्णुता:
अशोक के 12वें शिलालेख में सभी धर्मों के प्रति सम्मान और सहिष्णुता का स्पष्ट उल्लेख है। उन्होंने विभिन्न संप्रदायों के बीच संवाद को प्रोत्साहित किया, जो भारत की बहुलवादी संस्कृति का आधार बना।
राष्ट्रीय प्रतीक इस सहिष्णुता को एकता के प्रतीक के रूप में दर्शाते हैं, जो विविधता में एकता के भारतीय आदर्श को मजबूत करते हैं।
राष्ट्रीय एकता का प्रतीक:
अशोक ने अपने विशाल साम्राज्य को एक सूत्र में बाँधा, जो आज के भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता की नींव बना। उनके प्रतीक इस एकता को आधुनिक भारत में जीवित रखते हैं।
सिंह शीर्ष की चार दिशाओं में देखते शेर देश की सर्वदिशात्मक शक्ति और सतर्कता का प्रतीक हैं।
भारत अशोक का आभारी है क्योंकि उन्होंने एक ऐसी विरासत छोड़ी, जो शक्ति को हिंसा से नहीं, बल्कि शांति, न्याय और कल्याण से मापती है। अशोक चक्र और सिंह शीर्ष केवल प्रतीक नहीं हैं; वे उस दर्शन के वाहक हैं, जिसने भारत को एक नैतिक और एकजुट राष्ट्र के रूप में आकार दिया। अशोक चक्र हमें निरंतर प्रगति और शांति की ओर ले जाता है, जबकि सिंह शीर्ष सत्य और साहस के साथ देश की संप्रभुता की रक्षा करता है।
ये प्रतीक हमें याद दिलाते हैं कि 2300 साल पहले एक सम्राट ने जो सपना देखा था, वह आज भी भारत के लोकतंत्र और एकता का आधार है। अशोक की यह देन भारत को न केवल गर्व का कारण है, बल्कि विश्व के सामने एक प्रेरणा भी प्रस्तुत करती है।