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आरक्षित वर्ग के अधिकारों के हनन का मामला: MPPSC को हाईकोर्ट की अनुमति के बिना रिजल्ट जारी करने पर रोक

भोपाल। मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) द्वारा आयोजित राज्य सेवा परीक्षा 2025 के प्रारंभिक परीक्षा के रिजल्ट जारी करने पर जबलपुर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने यह निर्देश दिया है कि बिना उसकी अनुमति के परीक्षा परिणाम घोषित नहीं किए जा सकते। हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच ने इस मामले में राज्य शासन के सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) और PSC को नोटिस जारी करते हुए 15 दिनों के भीतर जवाब तलब किया है। याचिका की अगली सुनवाई 07 मई 2025 को होगी।

आरक्षित वर्ग के अधिकारों का हनन

यह मामला भोपाल निवासी ममता देहरिया द्वारा दायर याचिका से संबंधित है, जिन्होंने राज्य सेवा परीक्षा 2025 में भाग लिया था। आवेदन जमा करने के तुरंत बाद, उन्होंने हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की, जिसमें मध्य प्रदेश राज्य सेवा भर्ती नियम 2015 के कुछ प्रावधानों को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 335 के खिलाफ बताते हुए चुनौती दी।

याचिका में राज्य सेवा भर्ती नियम 2015 के नियम 4 (1) (a) (ii), नियम 4 (2) (a) (ii) और नियम 4 (3) (a) (ii) के साथ-साथ सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के 07 नवंबर 2000 के सर्कुलर और PSC द्वारा जारी विज्ञापन (31 दिसंबर 2024) की संवैधानिकता को भी सवालों के घेरे में रखा गया है।

याचिकाकर्ता के वकीलों ने कोर्ट में तर्क दिया कि ये प्रावधान आरक्षित वर्ग के प्रतिभावान अभ्यर्थियों को मेरिट के आधार पर अनारक्षित वर्ग में चयन से रोकते हैं, जो पूरी तरह से असंवैधानिक है। यदि कोई अभ्यर्थी आरक्षित वर्ग से आते हुए भी मेरिट के आधार पर अनारक्षित वर्ग में स्थान प्राप्त करता है, तो उसे वहां चयन से वंचित करना संविधान के सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।

याचिका में तर्क दिया गया कि राज्य सरकार एक तरफ आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को छूट देती है, जैसे—, आयु सीमा में छूट, शैक्षणिक योग्यता में छूट, परीक्षा शुल्क में छूट.

लेकिन दूसरी तरफ, यदि वही अभ्यर्थी अपनी मेहनत और योग्यता के बल पर उच्च मेरिट में स्थान प्राप्त करता है, तो उसे अनारक्षित वर्ग में चयनित होने से रोक दिया जाता है। यह नीति संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (जाति आधारित भेदभाव का निषेध), अनुच्छेद 16 (सरकारी नौकरियों में समान अवसर) और अनुच्छेद 335 (अनुसूचित जाति/जनजाति को सरकारी सेवाओं में अवसर) का उल्लंघन करती है।

याचिकाकर्ता के वकीलों का यह भी कहना था कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि राज्य कोई ऐसा कानून नहीं बना सकता, जो आरक्षित वर्ग को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित करे। इस आधार पर, मध्य प्रदेश सरकार द्वारा लागू किए गए ये सभी प्रावधान असंवैधानिक हैं और निरस्त किए जाने योग्य हैं।

हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया?

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति विवेक जैन की खंडपीठ द्वारा की गई। कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को गंभीरता से लेते हुए MPPSC को निर्देश दिया कि—

  • बिना हाईकोर्ट की अनुमति के रिजल्ट जारी नहीं किया जाएगा।

  • राज्य शासन और लोक सेवा आयोग से 15 दिनों में जवाब मांगा गया है।

  • याचिका को विचारार्थ स्वीकार करते हुए, अनावेदकों (राज्य शासन और PSC) को नोटिस जारी किया गया।

कोर्ट ने कहा कि राज्य सेवा परीक्षा 2025 के प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम हाईकोर्ट की अनुमति के बिना घोषित नहीं किया जाएगा और न ही इसके आधार पर कोई अन्य भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।

PSC के सरकारी वकील की दलील खारिज

सुनवाई के दौरान, PSC के सरकारी वकील ने कोर्ट में कहा कि परीक्षा हो चुकी है, लेकिन रिजल्ट अभी जारी नहीं किया गया है। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना अनुमति के रिजल्ट जारी नहीं किया जाएगा। हालांकि, बाद में जब यह बताया गया कि प्रारंभिक परीक्षा का रिजल्ट पहले ही 05 मार्च 2025 को घोषित हो चुका है, तो कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि इस रिजल्ट के आधार पर कोई भी अगली प्रक्रिया बिना हाईकोर्ट की अनुमति के नहीं की जाएगी।

वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर ने द मूकनायक से बातचीत में कहा कि राज्य सरकार द्वारा लागू किए गए भर्ती नियम पूरी तरह असंवैधानिक हैं और यह आरक्षित वर्ग के योग्य उम्मीदवारों के अधिकारों का हनन करते हैं। उन्होंने कहा कि यदि कोई अभ्यर्थी आरक्षित वर्ग से आते हुए भी अपनी योग्यता के आधार पर उच्च मेरिट में स्थान प्राप्त करता है, तो उसे अनारक्षित वर्ग में चयन से रोका जाना संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 335 का स्पष्ट उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपने कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि राज्य कोई ऐसा नियम नहीं बना सकता जो किसी वर्ग को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित करे।

उन्होंने कहा कि सरकार एक ओर आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को विभिन्न प्रकार की छूट देती है, लेकिन दूसरी ओर मेरिट में आने के बावजूद उन्हें अनारक्षित वर्ग में स्थान देने से इनकार कर देती है। यह नीति सामाजिक न्याय की अवधारणा के खिलाफ है। कोर्ट ने इस मामले में गंभीर रुख अपनाया है और MPPSC को बिना अनुमति के परीक्षा परिणाम जारी करने से रोक दिया है। आगामी सुनवाई में उम्मीद है कि हाईकोर्ट इन नियमों को असंवैधानिक घोषित करेगा।

हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 07 मई 2025 को तय की है, जिसमें राज्य शासन और लोक सेवा आयोग को अपने जवाब दाखिल करने होंगे।

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