क्या अनुसूचित जाति के ग्रामीण अपने ही पीने के पानी में मल मिलाएंगे?—वेंगईवायल जल टंकी में मानव मल मिलाने के मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से जवाब मांगा

11:21 AM Mar 28, 2025 | Geetha Sunil Pillai

चेन्नई - मद्रास हाई कोर्ट ने गुरुवार को तमिलनाडु सरकार से वेंगईवायल पेयजल प्रदूषण मामले में सीबी-सीआईडी की जांच को लेकर विस्तृत जवाब मांगा है। यह आदेश अधिवक्ता वी. मार्क्स रवींद्रन द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें पुडुकोट्टई जिले के एक अनुसूचित जाति बहुल गांव में पानी की टंकी में जानबूझकर मानव मल मिलाए जाने के मामले में सीबीआई जांच की मांग की गई थी। मामले की अगली सुनवाई 12 जून तय की गई है।

मुख्य न्यायाधीश श्रीराम और न्यायमूर्ति मोहम्मद शफीक की पीठ ने दोनों पक्षों के तर्क सुने, जिसमें सीबी-सीआईडी द्वारा तीन आरोपियों - मुरली राजा, सुदर्शन और मुथुकृष्णन (सभी अनुसूचित जाति से) के खिलाफ दायर चार्जशीट का जिक्र था। राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता रवींद्रन ने अदालत को बताया कि जांच पूरी हो चुकी है और आरोपियों ने डिस्चार्ज के लिए याचिकाएं दायर कर दी हैं।

हालांकि, याचिकाकर्ता के वकील जी.एस. मणि ने इस दावे का जोरदार विरोध करते हुए कहा कि सीबी-सीआईडी जांच एक "ढकोसला" थी और वास्तविक दोषियों (जो प्रभावशाली जातियों से हैं) को बचाने के लिए अनुसूचित जाति के निर्दोष युवाओं को फंसाया जा रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि यह "तर्कसंगत नहीं है कि अनुसूचित जाति के लोग अपने ही पीने के पानी में मल मिलाएंगे"।

मणि ने जोर देकर कहा कि "अनुसूचित जाति के सदस्यों द्वारा अपने ही पीने के पानी को दूषित करने का दावा पूरी तरह से अतार्किक है"। उन्होंने पुलिस पर ग्रामीणों को धमकाकर झूठे कबूलनामे कराने का आरोप लगाया। ग्रामीणों के हलफनामों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि पुलिस अधिकारियों ने अपराध कबूलने के बदले सरकारी नौकरियां और नकद रिश्वत देने का प्रलोभन दिया था।

याचिकाकर्ता ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि मार्च 2023 में हाईकोर्ट द्वारा नियुक्त सेवानिवृत्त न्यायाधीश एम. सत्यनारायणन की अध्यक्षता वाली एकल सदस्य आयोग ने अभी तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की है, जिससे जानबूझकर देरी किए जाने के संदेह पैदा होते हैं।

दो साल से चल रहा न्याय का संघर्ष

25 दिसंबर 2022 को वेंगईवायल गांव में कई अनुसूचित जाति परिवारों के सदस्य पानी पीने के बाद गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे। जांच में पानी की टंकी में मानव मल तैरता हुआ पाया गया, जिससे व्यापक आक्रोश फैल गया। इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 277 (पानी को दूषित करना) और 328 (जहर देकर नुकसान पहुंचाना) तथा एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

स्थानीय पुलिस द्वारा शुरू की गई जांच के बाद जब आरोप लगे कि स्थानीय स्तर पर इसे दबाने की कोशिश की जा रही है, उसके बाद मामले को जनवरी 2023 में सीबी-सीआईडी को सौंप दिया गया था। हालांकि, कार्यकर्ताओं और पीड़ित परिवारों ने लगातार सीबी-सीआईडी पर निष्पक्ष जांच न करने का आरोप लगाया है। उनका आरोप है कि संदिग्ध प्रभावशाली जाति के लोगों की जांच करने के बजाय, पुलिस ने अनुसूचित जाति के युवाओं को निशाना बनाकर उनसे जबरन कबूलनामे लेने की कोशिश की।

याचिकाकर्ता के गंभीर आरोप

मार्क्स रवींद्रन ने अपने जवाबी हलफनामे में कई गंभीर आरोप लगाए:

  • पुलिस दबाव: ग्रामीणों को बार-बार थाने बुलाकर धमकाया गया और यहां तक कि मंदिर ले जाकर झूठे कबूलनामे करवाने की कोशिश की गई

  • मिथ्या उद्देश्य: सीबी-सीआईडी के चार्जशीट में पानी दूषित करने का कारण गांव की पानी टंकी के ऑपरेटर की नौकरी को लेकर विवाद बताया गया, जबकि याचिकाकर्ता ने साबित किया कि संबंधित ऑपरेटर वेंगईवायल में काम ही नहीं करता था

  • प्रवेश प्रतिबंध: पुलिस ने कार्यकर्ताओं और पत्रकारों सहित बाहरी लोगों को गांव में प्रवेश से रोक दिया, जिससे सूचना के अभाव की आशंका पैदा हो गई

हालांकि अदालत ने कहा कि जांच में कमियों को साबित करने के लिए तत्काल कोई सबूत नहीं हैं, लेकिन उसने 12 जून 2025 को होने वाली अगली सुनवाई से पहले राज्य सरकार से याचिकाकर्ता के आरोपों का जवाब मांगा। न्यायाधीशों ने यह भी नोट किया कि चार्जशीट दायर होने के बाद भी निष्पक्षता पर संदेह होने पर मामला किसी अन्य एजेंसी को सौंपा जा सकता है, जैसा कि कल्लाकुरिची अवैध शराब हादसे के मामले में हुआ था जहां हाई कोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया था।

वेंगईवायल घटना तमिलनाडु की जाति आधारित राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ बन गई है। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सामाजिक अशांति से बचने के लिए राज्य तंत्र प्रभावशाली जातियों के दोषियों को बचा रहा है। एकल सदस्य आयोग की रिपोर्ट में देरी और सीबी-सीआईडी की विवादास्पद चार्जशीट ने अनुसूचित जाति समुदाय के बीच अविश्वास को गहरा कर दिया है, जो इसे जाति आधारित अपराधों में दलितों को न्याय मिलने की परीक्षा के रूप में देख रहे हैं।

अगली सुनवाई जून में निर्धारित है और सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या मद्रास हाई कोर्ट एक स्वतंत्र सीबीआई जांच का आदेश देगा या सीबी-सीआईडी के निष्कर्षों को ही मान्यता देगा। इस बीच, पीड़ित परिवार दो साल से अधिक समय से न्याय की प्रतीक्षा करते हुए अपना संघर्ष जारी रखे हुए हैं।