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जोधपुर में वाल्मीकि समाज के सफाईकर्मियों की पीड़ा: कलक्टर साहब एक से चार का काम करवाने पर तुले, अमानवीय शैली की मानवाधिकार आयोग में शिकायत करेंगे!

जोधपुर- राजस्थान के जोधपुर नगर निगम में सफाईकर्मियों का आंदोलन अब न केवल सड़कों पर धरनों तक सीमित रह गया है, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी एक तीखा पत्रबद्ध संघर्ष बन चुका है। अखिल भारतीय सफाई मजदूर कांग्रेस के जिलाध्यक्ष सरदार प्रकाश सिंह 'विद्रोही' ने जिला कलक्टर को एक कड़ा पत्र लिखकर सफाई व्यवस्था की खामियों पर सीधे निशाना साधा है। पत्र में निगम आयुक्त सिद्धार्थ पलानीचामी पर वाल्मीकि समाज को कुचलने, गैर-वाल्मीकि कर्मचारियों को संरक्षण देने और मनमानी आदेश जारी करने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। विद्रोही ने चेतावनी दी है कि यदि मांगें पूरी न हुईं, तो संगठन मानवाधिकार आयोग में अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कर मुकदमा चला सकता है। विद्रोही ने इसे भाजपा सरकार की 'मनु मानसिकता' करार दिया, जो संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।

यह पत्र पिछले महीनों से चले आ रहे आंदोलन का एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जो 17 नवंबर 2025 से शुरू होकर यहाँ तक पहुंच चुका है। ठंडी के बीच अर्धनग्न सत्याग्रह से लेकर झाड़ू डाउन हड़ताल की धमकियों तक, सफाईकर्मियों का संघर्ष वाल्मीकि समाज की गरिमा और समान कार्यभार के सवाल पर केंद्रित है।

विद्रोही के पत्र में सफाईकर्मियों की ज्वलंत समस्याओं को तीन मुख्य बिंदुओं में रेखांकित किया गया है। यह पत्र न केवल निगम आयुक्त की नीतियों पर सवाल उठाता है, बल्कि जिला कलक्टर की भूमिका पर भी उंगली उठाता है, जो खुद सफाई व्यवस्था की बैठकों में सक्रिय रहते हैं। पत्र की मुख्य बातें इस प्रकार हैं:

1. रात्रिकालीन सफाई व्यवस्था का अव्यवहारिक आदेश: निगम आयुक्त के पत्र संख्या 3585, दिनांक 4 जनवरी 2026 के अनुसार, रात्रि 8:00 बजे से 2:00 बजे तक सफाई व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश जारी किए गए हैं। इसमें वार्ड प्रभारियों को सफाईकर्मी उपलब्ध कराने का आदेश दिया गया है। विद्रोही ने सवाल उठाया है कि वार्ड प्रभारियों के पास कोई आरक्षित सफाईकर्मी की सुविधा ही नहीं है, तो ऐसे आदेश का क्या औचित्य? यदि कर्मचारी उपलब्ध भी हो जाते हैं, तो निगम स्तर पर उनकी सुरक्षा और रक्षा की क्या व्यवस्था है? रात्रि के अंधेरे में असुरक्षित काम करने वाले सफाईकर्मियों की जान-माल की चिंता कौन करेगा? यह आदेश न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि कर्मचारियों की सुरक्षा को दांव पर लगा रहा है।

कलेक्टर को मांग पत्र सौंपते हुए सफाई कर्मियों का प्रतिनिधि दल

2. वाल्मीकि कर्मचारियों पर अनुचित दबाव और गैर-वाल्मीकि की नियुक्ति का विरोध: पत्र में कलक्टर से सीधा सवाल किया गया है कि वे खुद निगम कार्यालय में सफाई व्यवस्था की बैठकों में दिशा-निर्देश देते हैं, लेकिन यह सब केवल वाल्मीकि सफाईकर्मियों के लिए ही क्यों? क्या उन्होंने कभी आयुक्त से उन सफाईकर्मियों की सूची मांगी, जो पिछले 7 वर्षों से सफाई कार्य नहीं कर रहे? इनमें अधिकांश गैर-वाल्मीकि हैं, जिनकी वजह से पूरी सफाई व्यवस्था चरमरा रही है। विद्रोही ने तर्क दिया कि यदि सफाई का दायित्व केवल वाल्मीकि कर्मचारियों का है, तो सफाई पदों पर गैर-वाल्मीकि को क्यों नियुक्त किया जा रहा है? ये कर्मचारी नियुक्ति तो ले लेते हैं, लेकिन सफाई का मूल कार्य करने से बचते हैं।

कलक्टर पर आरोप लगाया गया है कि वे बैठकों में वाल्मीकि कर्मचारियों पर दबाव डालते हैं - ज्यादा से ज्यादा कार्य करने, यहां तक कि एक कर्मचारी से चार का काम करवाने का प्रयास करते हैं। यह अमानवीय है। नगर पालिका अधिनियम (म्युनिसिपल पैटर्न एक्ट) में 1000 जनसंख्या पर 5 सफाईकर्मियों का प्रावधान है, लेकिन वास्तविकता में एक वार्ड की जनसंख्या 10-15 हजार है और कर्मचारी मात्र 15-20। विद्रोही ने सुझाव दिया कि यदि सुव्यवस्थित सफाई चाहिए, तो हर वार्ड में पर्याप्त कर्मचारी नियुक्त करें, ताकि बोझ कम हो और व्यवस्था सुनिश्चित हो।

3. निगरानी टीम का पक्षपातपूर्ण उपयोग: कलक्टर ने सफाई व्यवस्था सुधारने के लिए पर्यवेक्षक टीम गठित की है, लेकिन यह टीम केवल कार्यरत (मुख्यतः वाल्मीकि) कर्मचारियों पर ही निगरानी रख रही है। विद्रोही ने पूछा कि क्या कभी नकारा, कामचोर और सफाई न करने वाले गैर-वाल्मीकि कर्मचारियों पर ऐसी निगरानी लगाई गई? जवाब है ना, क्योंकि प्रशासन उन्हें खुद संरक्षण दे रहा है। यही वजह है कि वे निडर होकर हिमाकत कर रहे हैं, और आयुक्त मुखदर्शक बने हुए हैं।

पत्र के अंत में विद्रोही ने कड़ी चेतावनी दी है: "इसके लिए मजबूर होकर संगठन मानवाधिकार आयोग में ऐसे अधिकारियों के विरुद्ध शिकायत दर्ज कर मुकदमा दर्ज कराएगी, जिसकी समस्त जबाबदेही आप स्वयं की रहेगी।"

भाजपा सरकार पर 'मनु मानसिकता' का आरोप

'द मूकनायक' से बातचीत में विद्रोही ने आंदोलन की जड़ को और गहराई से खंगाला। उन्होंने कहा, "जोधपुर में सफाईकर्मियों के साथ बहुत बुरा हो रहा है। निगम आयुक्त वाल्मीकि समाज को कुचलने का काम कर रहे हैं। भाजपा वर्तमान सरकार वाल्मीकि समाज के साथ मनु मानसिकता रखते हैं। गैर-वाल्मीकि सफाईकर्मियों को लाभ देते हैं, उनसे सफाई कार्य नहीं कराते, उन्हें अन्य विभागों में स्थापित कर दिया है। यह संविधान के विरुद्ध है, मगर निगम आयुक्त कानून अपने चला रहा है। वो जैसे चाहे आदेश कर, सिर्फ मनमानी कर रहा है। विपक्ष कांग्रेस भी बेबस है। पिछले 17/11/2025 से संघर्ष जारी है, मगर समाधान अभी भी जीरो है।"

विद्रोही ने जोर देकर कहा कि जोधपुर में 3300 सफाईकर्मी हैं, जिनमें 700 गैर-वाल्मीकि हैं। इनके सफाई न करने से पूरा बोझ वाल्मीकि समाज पर आ गया है। पहले 60 वार्डों का दायरा अब 100 हो गया, जिससे दबाव दोगुना है। 15 नवंबर 2025 को 2000 कर्मचारियों के वार्ड बदलाव ने आग में घी डाला। उन्होंने याद दिलाया कि विधायक अतुल भंसाली और देवेंद्र जोशी की मौजूदगी में हुए समझौते की पालना नहीं हो रही, जहां मूल पद बहाली और महिलाओं-दिव्यांगों को निकट वार्ड तैनाती का वादा था।

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