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मणिपुर हिंसा: सुप्रीम कोर्ट का आदेश, पूर्व सीएम बीरेन सिंह के पूरे 48 मिनट के ऑडियो क्लिप की होगी फोरेंसिक जांच

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आज मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह से जुड़े विवादित ऑडियो मामले में एक अहम निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि पूर्व मुख्यमंत्री की कथित संलिप्तता वाले पूरे 48 मिनट के ऑडियो रिकॉर्डिंग और उनके स्वीकार किए गए आवाज के नमूनों (Voice Samples) को जांच के लिए तुरंत नेशनल फोरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी (NFSU), गांधीनगर भेजा जाए। यह ऑडियो क्लिप कथित तौर पर 2023 की जातीय हिंसा से संबंधित बताया जा रहा है।

कोर्ट ने मांगी सीलबंद रिपोर्ट

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह आदेश उस याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें इन ऑडियो रिकॉर्डिंग्स की अदालत की निगरानी में जांच की मांग की गई थी। पीठ ने NFSU को निर्देश दिया है कि वह जांच प्रक्रिया में तेजी लाए और अपनी रिपोर्ट 'सीलबंद लिफाफे' में सीधे कोर्ट को सौंपे।

कोर्ट ने अपने निर्देश में स्पष्ट कहा, "विवादित 48 मिनट की पूरी बातचीत और पूर्व मणिपुर सीएम के स्वीकार्य वॉयस रिकॉर्डिंग उपलब्ध हैं... याचिकाकर्ता के वकील द्वारा प्रतिवादियों को दी गई सभी वॉयस रिकॉर्डिंग को भी इसमें शामिल किया जाए और NFSU गांधीनगर भेजा जाए।"

नवंबर 2025 की रिपोर्ट और विवाद

इस मामले में नया मोड़ तब आया जब नवंबर 2025 में, नेशनल फोरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी, गांधीनगर ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया था कि उन्हें जो ऑडियो क्लिप भेजे गए थे, उनमें छेड़छाड़ (Tampering) के संकेत मिले थे। लैब ने कहा था कि वे क्लिप वैज्ञानिक रूप से आवाज के मिलान के लिए फिट नहीं थे, इसलिए वक्ताओं की आवाज की समानता या असमानता पर कोई राय नहीं दी जा सकती।

इस रिपोर्ट पर याचिकाकर्ता ने कड़ी आपत्ति जताई थी। उनका आरोप था कि मणिपुर पुलिस ने पूरी रिकॉर्डिंग भेजने के बजाय जानबूझकर फोरेंसिक लैब को केवल छोटे और एडिट किए हुए क्लिप ही भेजे थे, जिससे सही नतीजा नहीं निकल सका।

कोर्ट में तीखी बहस

आज की सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता 'कुकी ऑर्गनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स ट्रस्ट' की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण पेश हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि यह मामला लगभग दस बार सूचीबद्ध हो चुका है और हर बार सरकारी वकील मौजूद रहे हैं। भूषण ने तर्क दिया कि उनकी याचिका में ही पूरी 48 मिनट की बातचीत का लिखित ब्यौरा (Transcript) शामिल था और ऑडियो भी उपलब्ध था, इसलिए अधिकारियों को पूरी रिकॉर्डिंग की जानकारी पहले से थी।

दूसरी ओर, राज्य सरकार की तरफ से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि राज्य को पूरी रिकॉर्डिंग पिछली सुनवाई के बाद ही मिली है और याचिकाकर्ता ने इसे पहले उपलब्ध नहीं कराया था।

इस पर पलटवार करते हुए प्रशांत भूषण ने कहा कि जब प्रतिवादी लगातार कोर्ट में आ रहे थे, तो वे इसे मांग सकते थे। जब पीठ ने पूछा कि रिकॉर्डिंग पहले क्यों नहीं दी गई, तो भूषण ने कहा कि इसके लिए कोई औपचारिक नोटिस नहीं था।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि अब पूरी 48 मिनट की रिकॉर्डिंग को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा जाए ताकि सच्चाई और प्रामाणिकता की पुष्टि हो सके।

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