दलित हिस्ट्री मंथ: डॉ. अंबेडकर की जन्मस्थली—संघर्ष, प्रेरणा और अनुयायियों का महासंगम

05:38 PM Apr 02, 2025 | Ankit Pachauri

भोपाल। मध्य प्रदेश भारत के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर की जन्मस्थली महू, हर वर्ष दलित इतिहास महीने (Dalit History Month) के दौरान एक महत्वपूर्ण केंद्र बन जाती है। यह स्थान न केवल डॉ. अंबेडकर के जन्म का साक्षी रहा है, बल्कि दलित आंदोलन के लिए भी प्रेरणास्रोत रहा है।अप्रैल के पूरे महीने महू में देश-विदेश से बाबा साहब के अनुयायी और उनके विचारों में आस्था रखने वाले लोग आते-जाते रहते हैं।

जानिए क्या है इतिहास?

भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू (अब डॉ. आंबेडकर नगर) में हुआ था। वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की 14वीं संतान थे। उनके पिता ब्रिटिश भारतीय सेना में सूबेदार थे और शिक्षा को अत्यधिक महत्व देते थे।

डॉ. अंबेडकर जन्म से ही महार जाति के थे, जिसे उस समय अछूत माना जाता था। सामाजिक भेदभाव के कारण उन्हें स्कूल में भी भेदभाव झेलना पड़ा—वे अन्य बच्चों के साथ बैठ नहीं सकते थे और पानी तक छूने की अनुमति नहीं थी। उनके जीवन की ये शुरुआती कठिनाइयाँ ही आगे चलकर सामाजिक न्याय और समानता के लिए उनके संघर्ष का आधार बनीं।

अप्रेल महीने में महू का महत्व

अप्रैल माह को दलित इतिहास महीने के रूप में मनाया जाता है, जिसमें महू विशेष रूप से चर्चा में रहता है। इस दौरान देशभर से अंबेडकरवादी, सामाजिक कार्यकर्ता, छात्र और अनुसूचित जाति समुदाय के लोग महू में एकत्र होते हैं।

14 अप्रैल को विशेष आयोजन: अंबेडकर जयंती के अवसर पर हजारों लोग महू में उनकी प्रतिमा के समक्ष श्रद्धांजलि अर्पित करने आते हैं। यहाँ हर वर्ष सरकारी और सामाजिक संगठनों द्वारा कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

सेमिनार और संवाद: दलित अधिकारों, सामाजिक न्याय, और संविधान पर सेमिनार और परिचर्चाएँ आयोजित की जाती हैं, जहाँ देशभर के प्रमुख विद्वान और कार्यकर्ता भाग लेते हैं।

संविधान और सामाजिक न्याय पर जागरूकता: युवा वर्ग को संविधान की मूल भावनाओं से जोड़ने के लिए विभिन्न संस्थाएँ कार्यशालाओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं।

डॉ. बाबा साहब जन्म स्थल मेमोरियल, महू इंदौर के प्रबंध सदस्य एवं मीडिया प्रभारी राजीव कुमार अंबोडे ने द मूकनायक से बातचीत में बताया कि हर साल अप्रैल महीने में बाबा साहब की जन्म स्थली पर लाखों अनुयायी पहुँचते हैं। इस बार भी 12 से 14 अप्रैल तक आने वाले सभी अनुयायियों के ठहरने और भोजन की समुचित व्यवस्था की जाएगी, ताकि वे बिना किसी परेशानी के इस ऐतिहासिक स्थल पर श्रद्धा व्यक्त कर सकें।

राजू कुमार अंबोडे ने आगे बताया कि 14 अप्रैल को समाज में उल्लेखनीय कार्य करने वाले व्यक्तियों को सम्मानित किया जाएगा। इस कार्यक्रम का उद्देश्य बाबा साहब के विचारों को आगे बढ़ाना और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने वाले लोगों को प्रोत्साहित करना है।

महू के सामाजिक और राजनीतिक पहलू

महू केवल अंबेडकर की जन्मस्थली नहीं, बल्कि दलित राजनीति का भी एक प्रतीक स्थल बन चुका है। हर साल यहाँ विभिन्न दलित संगठन और राजनीतिक पार्टियाँ अपने विचार प्रस्तुत करती हैं और सामाजिक न्याय की दिशा में नई नीतियों पर चर्चा करती हैं।

हालाँकि महू अंबेडकरवादी आंदोलन का केंद्र रहा है, लेकिन यहाँ बुनियादी सुविधाओं की कई समस्याएँ बनी हुई हैं। यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पर्याप्त व्यवस्थाओं का अभाव है। दलित इतिहास और अंबेडकर के विचारों को संरक्षित करने के लिए एक बड़ा संग्रहालय बनाने की माँग लंबे समय से की जा रही है। अंबेडकर के नाम पर कई योजनाएँ घोषित होती हैं, लेकिन उनके प्रभावी क्रियान्वयन की ज़रूरत बनी रहती है।

महू सिर्फ एक स्थान नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की एक ऐतिहासिक धरोहर है। दलित इतिहास माह के दौरान इस स्थान का महत्व और बढ़ जाता है, जब यहाँ लाखों लोग आकर अंबेडकर की विचारधारा को आत्मसात करने की कोशिश करते हैं। सरकार और समाज, दोनों को मिलकर इसे और विकसित करने की दिशा में काम करना होगा, ताकि यह स्थल आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणास्रोत बना रहे।