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पिता प्रवासी हो तो क्या मां की जाति के आधार पर मिल सकता है आरक्षण? मद्रास हाईकोर्ट ने दिया जवाब

चेन्नई- मद्रास उच्च न्यायालय ने पुडुचेरी केंद्रशासित प्रदेश में आरक्षण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी बच्चे के पिता किसी दूसरे राज्य से पुडुचेरी आकर बसे प्रवासी हैं, लेकिन मां पुडुचेरी की मूल निवासी है और उसके पास अनुसूचित जाति, अति पिछड़ा वर्ग या अन्य पिछड़ा वर्ग का प्रमाण पत्र है, तो ऐसे बच्चे को भी मां की जाति और मूल निवास के आधार पर जाति प्रमाण पत्र दिया जा सकता है। जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती की एकल पीठ ने 30 से अधिक याचिकाओं की सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।

अदालत के समक्ष मूल सवाल यह था कि क्या कोई उम्मीदवार, जिसके पिता उसी जाति के होते हुए भी दूसरे राज्य से प्रवासी हैं, केवल मां की मूल निवासी स्थिति के आधार पर पुडुचेरी में आरक्षण का लाभ पाने के लिए अनुसूचित जाति, अति पिछड़ा वर्ग या अन्य पिछड़ा वर्ग का दर्जा प्राप्त कर सकता है।

इन याचिकाओं में शामिल अधिकतर बच्चे पुडुचेरी में ही पैदा हुए, वहीं पले-बढ़े और वहीं शिक्षा प्राप्त की, लेकिन प्रशासन ने उन्हें केवल पिता के प्रवासी होने के आधार पर मूल निवासी (ओरिजिन) प्रमाण पत्र देने से इनकार कर दिया था और उन्हें "प्रवासी" श्रेणी में डाल दिया था, जिससे वे केंद्रीय स्तर की भर्तियों में तो आरक्षण का लाभ उठा सकते थे, लेकिन पुडुचेरी प्रशासन की नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में सीटों के लिए पात्र नहीं माने जाते थे।

पुडुचेरी प्रशासन की ओर से तर्क दिया गया कि संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत जारी संविधान (पुडुचेरी) अनुसूचित जाति आदेश, 1964 के अनुसार जाति की पहचान पिता के आधार पर ही होनी चाहिए, क्योंकि भारतीय समाज परंपरागत रूप से पितृसत्तात्मक रहा है। प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि प्रवासी राज्य में जाति आधारित आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता और यह मुद्दा फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में भी विचाराधीन है।

वहीं याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जी. मासिलामणि सहित कई वकीलों ने दलील दी कि पिता के आधार पर ही जाति तय करने की सोच लैंगिक भेदभाव पर आधारित है, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का उल्लंघन करती है। उन्होंने 2005 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में हुए संशोधन का हवाला दिया, जिसमें महिलाओं को संपत्ति में समान सहदायिक अधिकार दिए गए हैं, यह दर्शाने के लिए कि "महिला ससुराल जाकर बस जाती है" जैसी पुरानी सामाजिक धारणाएं अब कानूनी आधार नहीं रखतीं।

अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में सुप्रीम कोर्ट के रामेशभाई दाभाई नाइक बनाम गुजरात राज्य मामले के फैसले का विशेष उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि किसी बच्चे की जाति तय करने का असली पैमाना यह नहीं कि वह पिता या मां किसकी संतान है, बल्कि यह है कि बच्चा किस समुदाय में पला-बढ़ा है और उसने किस समुदाय के भेदभाव, अपमान व सामाजिक कठिनाइयों को झेला है। कोर्ट ने कहा कि यदि माता-पिता दोनों एक ही जाति के हैं, मां पुडुचेरी की मूल निवासी है, और बच्चा वहीं जन्मा और पला-बढ़ा है, तो वह मां के समुदाय की तरह ही सामाजिक कठिनाइयां झेलता है, इसलिए पिता के प्रवासी होने का हवाला देकर उसे लाभ से वंचित करना अनुचित है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुडुचेरी प्रशासन का यह रुख कि "समाज पितृसत्तात्मक है" ऐतिहासिक रूप से भले सही रहा हो, लेकिन आज के संवैधानिक ढांचे में इसे आगे बढ़ाया नहीं जा सकता। कोर्ट ने जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए कहा कि किसी महिला की पहचान विवाह के बाद पूरी तरह पति की पहचान में विलीन नहीं हो जाती, और यह भेदभावपूर्ण सोच संविधान की भावना के विपरीत है।

अदालत ने पहले के तीन खंडपीठ फैसलों का भी विश्लेषण किया, जिनमें पिता के आधार पर ही जाति प्रमाण पत्र देने की बात कही गई थी, और पाया कि वे फैसले उस समय दिए गए थे जब सुप्रीम कोर्ट का एक पुराना स्थगन आदेश लागू था। लेकिन 2023 में जब पी. जया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी, उसके बाद से मद्रास हाईकोर्ट की कई खंडपीठों ने लगातार यह माना है कि मां के मूल निवास के आधार पर भी जाति प्रमाण पत्र जारी किया जाना चाहिए।

अंत में अदालत ने सभी याचिकाओं को स्वीकार करते हुए आदेश दिया कि संबंधित तहसीलदार व अन्य अधिकारियों द्वारा जारी अस्वीकृति आदेश रद्द किए जाएं, और याचिकाकर्ताओं को उनकी मां की मूल निवासी स्थिति के आधार पर संबंधित जाति यानी अनुसूचित जाति, अति पिछड़ा वर्ग या अन्य पिछड़ा वर्ग का प्रमाण पत्र जारी किया जाए। इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश किसी झूठे जाति दावे या मां के मूल निवास के फर्जी होने की स्थिति में लागू नहीं होगा।

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