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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने DU की लॉ स्टूडेंट पर लगा रासुका किया रद्द, पुलिस की कहानी को बताया मनगढ़ंत

उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बुधवार 2 सितंबर, को दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) की कानून की छात्रा आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत की गई कार्रवाई को रद्द कर दिया है। नोएडा में इस साल अप्रैल में हुए मजदूरों के विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में 25 वर्षीय छात्रा लगभग पांच महीने से पुलिस हिरासत में थी।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने आकृति चौधरी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार करते हुए उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने गिरफ्तारी नोटिस में पाई गई खामियों पर सख्त टिप्पणी की और पुलिस की पूरी थ्योरी को "मनगढ़ंत कहानी" करार दिया। यह रिहाई तब तक प्रभावी रहेगी जब तक कि उनकी किसी अन्य मामले में आवश्यकता न हो।

छात्रा की ओर से पैरवी करने वाले वकील चार्ली प्रकाश ने वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस के साथ मीडिया को बताया कि अदालत ने एनएसए के तहत हिरासत को पूरी तरह से असंवैधानिक माना है। उन्होंने पुष्टि की कि कोर्ट को गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर राज्य सरकार के बयानों में भारी विसंगतियां मिली हैं। इस अन्यायपूर्ण कार्रवाई के लिए अदालत ने नोएडा के जिलाधिकारी (डीएम) को छात्रा को ₹5 लाख का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है। इस मामले का विस्तृत आदेश आना अभी बाकी है।

यह पूरा घटनाक्रम 10 से 18 अप्रैल के बीच हुए मजदूरों के उस आंदोलन से जुड़ा है, जिसमें औद्योगिक और संविदा कर्मचारी अपने वेतन में बढ़ोतरी और पड़ोसी राज्य हरियाणा के समान मजदूरी की मांग कर रहे थे। इसी दौरान कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें आकृति भी शामिल थीं। 13 अप्रैल को इस प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया था और सड़कों को जाम कर दिया गया था।

घटना के ठीक एक महीने बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने छात्रा पर रासुका (NSA) लगा दिया। पुलिस का आरोप था कि उन्होंने ही प्रदर्शनकारियों को पथराव और आगजनी करने के लिए उकसाया था। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पुलिस अधिकारियों ने यह तक दावा किया था कि उनके पास इस छात्रा के खिलाफ मजबूत इलेक्ट्रॉनिक और वीडियोग्राफी सबूत मौजूद हैं।

इसके जवाब में आकृति चौधरी ने अपनी याचिका में साफ कहा कि 13 अप्रैल को हिंसा भड़कने से पहले ही उन्हें हिरासत में ले लिया गया था। उनका तर्क था कि उन्हें एहतियातन हिरासत में रखने का कोई तथ्यात्मक या कानूनी आधार नहीं था और पूरी प्रक्रिया में नियमों की घोर अनदेखी की गई थी।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि आकृति को 12 अप्रैल को सुबह 10:56 बजे गिरफ्तार किया गया था और उन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 130 के तहत चेतावनी नोटिस जारी किया गया था। इस पर जस्टिस श्रीधरन ने कड़ा सवाल किया कि आखिर चेतावनी से पहले कारण बताओ नोटिस क्यों नहीं जारी किया गया।

सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि धारा 126 के तहत कोई नोटिस नहीं दिया गया था। इसके बाद जब अदालत ने पुलिस की जनरल डायरी तलब की, तो खुलासा हुआ कि नोटिस तैयार होने से पहले ही छात्रा को गिरफ्तार कर लिया गया था। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या गिरफ्तारी से पहले उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया था और उनके उकसावे के वे कथित सबूत कहां हैं।

राज्य ने दलील दी कि 11 अप्रैल को भी प्रदर्शनकारी मौके पर जमा हुए थे। हालांकि, अदालत ने पुलिस रिकॉर्ड का ही हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि उस दिन कोई हिंसा नहीं हुई थी। इसके अलावा, पुलिस अदालत में ऐसा कोई भी वीडियो फुटेज पेश करने में पूरी तरह विफल रही जिसमें आकृति चौधरी को भीड़ को उकसाते, पथराव कराते या वाहनों में आग लगाते हुए देखा जा सके।

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