नई दिल्ली/रांची: हौसले अगर बुलंद हों, तो अभावों के बीच भी रास्ते निकल ही आते हैं। 26 दिसंबर का दिन झारखंड के एक छोटे से आदिवासी गांव की बेटी और भारतीय अंडर-17 फुटबॉल टीम की शान अनुष्का कुमारी (जिन्हें अनुष्का मुंडा के नाम से भी जाना जाता है) के लिए ऐतिहासिक बन गया। अपनी बेहतरीन खेल प्रतिभा के लिए 'द गोल मशीन' (The Goal Machine) का उपनाम पा चुकीं अनुष्का को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने विज्ञान भवन में 'प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार' से सम्मानित किया।
यह सम्मान केवल एक ट्रॉफी नहीं थी, बल्कि मुंडा जनजाति से आने वाली अनुष्का और उनके परिवार के लिए यह अपनी पहचान पर गर्व करने का क्षण था, क्योंकि उन्हें यह सम्मान देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति के हाथों मिला। अपनी टीम में यह प्रतिष्ठित पुरस्कार पाने वाली वह एकमात्र खिलाड़ी हैं।
लड़कों के साथ खेलते हुए शुरू हुआ सफर
रांची के बाहरी इलाके में स्थित 'रुक्का मुंडा टोली' गांव में जन्मी 15 वर्षीय अनुष्का के लिए फुटबॉल खेलना कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक चुनाव था। अपने गांव में लड़कियों की तुलना में लड़कों की संख्या अधिक होने के कारण, उन्होंने बचपन से ही लड़कों के साथ फुटबॉल खेलना शुरू कर दिया था।
इंडियन एक्सप्रेस के हवाले से अनुष्का बताती हैं, "आदिवासी होने के नाते फुटबॉल और हॉकी हमारे खून में है। मेरे गांव में लड़कों के साथ मैदान पर समय बिताते हुए मुझे यह खेल अपना सा लगने लगा।"
संघर्ष और गरीबी के बीच मिली सफलता
अनुष्का का यह सफर आसान नहीं रहा है। वह दिहाड़ी मजदूरों के परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उनके पिता, दिनेश मुंडा, जो कभी खुद एक फुटबॉल खिलाड़ी थे, आज बैसाखी के सहारे चलते हैं। दो साल पहले एक निर्माण स्थल पर काम करते समय भारी उपकरण उनके पैर पर गिर गया था, जिससे वह बिना सहारे के चल-फिर नहीं सकते।
पिता की लाचारी के बाद घर की जिम्मेदारी मां रितु देवी और बड़े भाई पर आ गई, जो पानी की फैक्ट्री में काम करते हैं। विज्ञान भवन में बेटी को सम्मानित होते देख मां रितु देवी भावुक हो गईं। उन्होंने कहा, "यह हमारे लिए जीवन का सबसे बड़ा पल था। मेरी बेटी को राष्ट्रपति जी का कार्यकाल खत्म होने से पहले उनसे सम्मान मिलना सौभाग्य की बात है।"
हालांकि, चोट के कारण पिता दिल्ली नहीं जा सके, लेकिन उन्होंने एक रिश्तेदार के फोन पर यह समारोह लाइव देखा।
बुआ बनीं पहली गुरु
अनुष्का की पहली कोच उनकी बुआ सोनी कुमारी थीं, जो गांव की एकमात्र अन्य राष्ट्रीय खिलाड़ी और वर्तमान में सहायक फुटबॉल कोच हैं। अनुष्का के करियर को असली उड़ान 2021 में मिली, जब उनका चयन हजारीबाग के एक आवासीय प्रशिक्षण केंद्र में हुआ। वहां उन्हें मुफ्त आवास, भोजन और ट्रेनिंग की सुविधा मिली। शुरुआत में एक अटैकिंग मिडफील्डर के रूप में खेलने वाली अनुष्का बाद में एक स्ट्राइकर बन गईं, जहां उनके छोटे कद के बावजूद उनका प्रदर्शन दमदार रहा।
रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन
हजारीबाग केंद्र से निकलकर अनुष्का ने सब-जूनियर नेशनल फुटबॉल चैंपियनशिप में अपनी जगह बनाई और जल्द ही नेपाल में आयोजित सैफ (SAFF) महिला चैंपियनशिप के लिए भारत की अंडर-17 टीम में शामिल हो गईं। भले ही भारत फाइनल में बांग्लादेश से हार गया, लेकिन अनुष्का ने भूटान के खिलाफ अपनी पहली अंतरराष्ट्रीय हैट्रिक लगाकर सबका ध्यान खींचा। पिछले साल अगस्त में भूटान में हुई अंडर-17 सैफ चैंपियनशिप में वह टॉप स्कोरर भी रहीं।
इसके ठीक दो महीने बाद, बिश्केक के डोलन ओमुरजाकोव स्टेडियम में उज्बेकिस्तान को 2-1 से हराकर उनकी टीम ने एएफसी (AFC) अंडर-17 महिला एशियाई कप में अपनी जगह पक्की की। यह टूर्नामेंट इस साल 30 अप्रैल से 17 मई के बीच चीन में आयोजित होना है।
एक टीस और भविष्य की चुनौतियां
सफलता की इन ऊंचाइयों के बावजूद, अनुष्का जमीन से जुड़ी हैं। उन्हें आज भी याद है जब वह नंगे पांव आदिवासी टूर्नामेंट में खेलती थीं और इनाम में बकरी जीतती थीं।
फिलहाल उनके सामने दोहरी चुनौती है। जहां एक तरफ उनकी टीम चीन में होने वाले टूर्नामेंट के लिए बेंगलुरु में अभ्यास कर रही है, वहीं दूसरी तरफ अगले महीने उनकी स्कूल की परीक्षाएं हैं। घर की आर्थिक स्थिति को समझते हुए अनुष्का पढ़ाई को भी उतनी ही अहमियत देती हैं। वह कहती हैं, "मैं अपनी परीक्षाएं नहीं छोड़ूंगी, क्योंकि हम जानते हैं कि भारत, और खास तौर पर झारखंड में खिलाड़ियों की स्थिति कैसी है।"
लेकिन इन सबके बीच अनुष्का के मन में एक टीस भी है। वह कहती हैं, "मुझे दिखावा नहीं चाहिए, लेकिन यह अजीब लगता है कि मेरे गांव या झारखंड के आसपास से किसी ने, यहां तक कि किसी नेता ने भी मुझे बधाई देने या माला पहनाने की जहमत नहीं उठाई।"
पहले उनके घर में टीवी नहीं था, जिससे माता-पिता उनका खेल नहीं देख पाते थे। बाद में टीवी खरीदा गया ताकि वे अपनी बेटी को देश के लिए खेलते देख सकें। उनके पिता गर्व से कहते हैं, "मैं अपनी बेटी पर गर्व क्यों न करूं? वह भारत के लिए खेलती है।"