भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार की राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। इस मामले की सुनवाई उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति के समक्ष पूरी हो चुकी है। शिकायतकर्ता एवं मध्य प्रदेश कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार और मंत्री प्रतिमा बागरी, दोनों पक्ष अपना-अपना पक्ष समिति के सामने रख चुके हैं। सूत्रों के अनुसार समिति सोमवार तक अपना निर्णय दे सकती है।
इस बीच प्रदीप अहिरवार ने आरोप लगाया है कि जांच समिति पर सरकार का दबाव बनाया जा रहा है। सरकार के छह मंत्रियों सहित प्रतिमा बागरी ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात की थी। उनका कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो कांग्रेस हाईकोर्ट और जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट तक जाएगी तथा लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन भी करेगी।
हालांकि, इन आरोपों पर राज्य सरकार की ओर से इस संबंध में सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। समिति की जांच अभी जारी है और अंतिम निर्णय आना बाकी है।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद मंत्री प्रतिमा बागरी के अनुसूचित जाति (SC) प्रमाण पत्र की वैधता को लेकर है। शिकायतकर्ता प्रदीप अहिरवार का दावा है कि प्रतिमा बागरी का परिवार उन क्षेत्रों से संबंधित है, जहां ऐतिहासिक और कानूनी रूप से बागरी समुदाय को अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त नहीं था। उनका कहना है कि उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज, जनगणना रिकॉर्ड और सरकारी अधिसूचनाएं इस दावे का समर्थन करती हैं।
दूसरी ओर, इस मामले की सच्चाई का अंतिम निर्धारण उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति के निर्णय से ही होगा।
समिति पर सरकार का दबाव?
पप्रदीप अहिरवार ने आरोप लगाया कि मंत्री प्रतिमा बागरी छह अन्य मंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री से मिलीं और जांच को प्रभावित करने का प्रयास किया गया।
उन्होंने कहा, "मेरी शिकायत पूरी तरह तथ्यों और दस्तावेजों पर आधारित है। यदि सरकार के दबाव में फैसला हुआ तो अंतिम सांस तक इस लड़ाई को जारी रखूंगा। अनुसूचित जाति वर्ग के अधिकारों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं होने दिया जाएगा।"
अहिरवार ने कहा कि यदि समिति निष्पक्ष निर्णय नहीं देती तो मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया जाएगा।
राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी ने अपने जाति प्रमाण पत्र को लेकर लगाए जा रहे आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है। उन्होंने कहा कि उनका अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र वैध है और उन्होंने राज्य स्तरीय उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति के समक्ष अपने पक्ष में सभी आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत कर दिए हैं। उनका दावा है कि उनके परिवार से जुड़े 110 वर्ष से अधिक पुराने दस्तावेज भी समिति को उपलब्ध कराए गए हैं, जिनसे उनके दावे की पुष्टि होती है। जानकारी के मुताबिक उन्होंने वंशावली से सम्बंधित दस्तावेज समिति को दिए हैं।
प्रतिमा बागरी ने कहा कि उनके खिलाफ लगाए जा रहे आरोप राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि जांच निष्पक्ष होगी और समिति उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर सही निर्णय लेगी। उन्होंने कहा कि वह जांच प्रक्रिया का पूरा सम्मान करती हैं और अंतिम निर्णय आने तक किसी भी तरह की अटकलों से बचना चाहिए।
जानिए, क्यों संदेह के घेरे में है जाति प्रमाण पत्र?
शिकायत में कई दस्तावेजों और ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला दिया गया है। द मूकनायक ने इन दावों की पड़ताल की है। हालांकि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ये सभी शिकायतकर्ता के आरोप हैं, जिनकी पुष्टि या खंडन जांच समिति के अंतिम निर्णय से होगा।
1. 1950 की संवैधानिक स्थिति
शिकायत के अनुसार अनुसूचित जाति का निर्धारण संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के आधार पर किया जाता है। आरोप है कि उस समय प्रतिमा बागरी का परिवार जिस क्षेत्र में रहता था, वहां बागरी समुदाय अनुसूचित जाति सूची में शामिल नहीं था।
2. 1961 और 1971 की जनगणना
शिकायतकर्ता का दावा है कि 1961 और 1971 की जनगणना में प्रतिमा बागरी के परिवार ने स्वयं को अनुसूचित जाति के रूप में दर्ज नहीं कराया था। उनका कहना है कि यह रिकॉर्ड भी जांच का महत्वपूर्ण आधार होना चाहिए।
3. ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI) की रिपोर्ट
1998-99 में ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा किए गए मानवशास्त्रीय अध्ययन का भी हवाला दिया गया है। शिकायत के अनुसार इस अध्ययन में विंध्य और बुंदेलखंड क्षेत्र के बागरी समुदाय को राजपूत/ठाकुर की उपजाति बताया गया था।
रिपोर्ट में कथित रूप से उल्लेख है कि यह समुदाय बड़े कृषक एवं मालगुजार था और इनके साथ सामाजिक छुआछूत जैसी स्थिति नहीं थी।

4. 1976 के बाद बना विवाद
शिकायतकर्ता का कहना है कि 1976 में अनुसूचित जातियों की पूरे प्रदेश की एक संयुक्त सूची बनाई गई, जिसमें "बागरी/बागड़ी" का नाम क्रमांक-2 में शामिल हुआ।
आरोप है कि इसके बाद विंध्य क्षेत्र के बागरी समाज जो अनुसूचित जाति वर्ग से सम्बंध नहीं रखते थे, ने भी अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र बनवाने शुरू कर दिए, जबकि 1950 से 1976 तक उन्हें यह दर्जा प्राप्त नहीं था।
5. भारत सरकार की सूची का हवाला
शिकायत में कहा गया है कि भारत सरकार ने विंध्य और बुंदेलखंड क्षेत्र के बागरी समाज को कभी अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित नहीं किया।
6. क्षेत्रीय अंतर का दावा
शिकायतकर्ता का दावा है कि अनुसूचित जाति का लाभ पाने वाले मूल बागरी समुदाय का निवास मालवा, निमाड़ और मध्यभारत क्षेत्र में रहा है, जबकि प्रतिमा बागरी का परिवार स्वतंत्रता से पहले से सतना (तत्कालीन विंध्य प्रदेश) का निवासी रहा है।

7. 2007 के राजपत्र का उल्लेख
शिकायत में वर्ष 2007 के एक राजपत्र का भी हवाला दिया गया है। आरोप है कि इसमें भ्रम दूर करने के लिए स्पष्ट किया गया था कि सतना, पन्ना, सागर जैसे जिलों को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में बागरी समुदाय को अनुसूचित जाति का लाभ मिलेगा।
मंत्री का पक्ष पड़ सकता है कमजोर!
प्रतिमा बागरी की ओर से राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति को सौंपे गए दस्तावेजों में उनके परिवार की वंशावली और सतना जिले में आजादी से पहले से निवास संबंधी जानकारी शामिल है। इन दस्तावेजों से उनके परिवार का क्षेत्रीय संबंध तो स्पष्ट होता है, लेकिन उपलब्ध जानकारी के आधार पर ऐसे प्रमाण सामने नहीं आते जिनसे अनुसूचित जाति से संबंधित उनकी जातीय पहचान सिद्ध होती हो। यानी, दस्तावेज उनके पैतृक निवास का संकेत देते हैं, पर अनुसूचित जाति होने का प्रत्यक्ष आधार प्रस्तुत नहीं करते।
द मूकनायक की पड़ताल में यह भी सामने आया कि अनुसूचित जाति का दर्जा संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के प्रावधानों के अनुसार निर्धारित होता है। यदि किसी व्यक्ति के पास उस आधार पर अपनी अनुसूचित जाति की स्थिति सिद्ध करने वाले वैध दस्तावेज या स्वीकार्य साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं, तो अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र का लाभ मिलने का आधार कमजोर पड़ सकता है। हालांकि, इस मामले में अंतिम निर्णय राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति को उपलब्ध दस्तावेजों, साक्ष्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर लेना है।
फैसला क्यों महत्वपूर्ण?
उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति दोनों पक्षों की दलीलें सुन चुकी है। अब समिति का निर्णय कई कारणों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यदि समिति शिकायत को सही मानती है तो मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र और उससे जुड़े लाभों पर सवाल खड़े हो सकते हैं। वहीं यदि समिति शिकायत को खारिज करती है तो शिकायतकर्ता के पास न्यायालय जाने का विकल्प रहेगा।