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उच्च शिक्षा में आधी आबादी का दबदबा: पुरुषों को पीछे छोड़ भारत में शिक्षा क्रांति का नेतृत्व कर रही हैं महिलाएं

नई दिल्ली: भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र में एक बेहद शानदार और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा बुधवार को जारी 'अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण' (AISHE) 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार, उच्च शिक्षा में दाखिला लेने के मामले में अब महिलाएं पुरुषों से काफी आगे निकल गई हैं। 18 से 23 वर्ष की आयु वर्ग के लिए ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) यानी सकल नामांकन अनुपात में महिलाओं का आंकड़ा छलांग लगाकर 31.2 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जबकि पुरुषों का अनुपात 28.9 प्रतिशत तक ही सीमित है।

बीते तीन वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो यह प्रवृत्ति और भी मजबूत हुई है। साल 2021-22 में महिलाओं का जीईआर 28.5 प्रतिशत था, जो 2022-23 में बढ़कर 30.2 प्रतिशत और अब 2023-24 में 31.2 प्रतिशत हो गया है। इसके विपरीत, पुरुषों का जीईआर 2021-22 के 28.3 प्रतिशत से बढ़कर 2022-23 में 28.9 प्रतिशत तक तो पहुंचा, लेकिन 2023-24 में इसी आंकड़े पर स्थिर हो गया। नतीजतन, दोनों के बीच का अंतर 2021-22 के 0.2 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 के नवीनतम सर्वेक्षण में 2.3 प्रतिशत तक फैल गया है।

एआईएसएचई रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि यह लगातार सातवां साल है जब महिलाओं का जीईआर पुरुषों की तुलना में अधिक दर्ज किया गया है। इसके अलावा, अखिल भारतीय जेंडर पैरिटी इंडेक्स (लैंगिक समानता सूचकांक) भी निरंतर वृद्धि दर्शा रहा है। यह सूचकांक 2021-22 के 1.01 से चढ़कर 2022-23 में 1.04 और 2023-24 में 1.08 हो गया है। यह आंकड़ा इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि यह कोई क्षणिक उछाल नहीं, बल्कि देश में एक स्थायी विकास का संकेत है।

आज उच्च शिक्षा के क्षेत्र में महिलाएं महज हिस्सा नहीं ले रही हैं, बल्कि वे लगभग बराबर की भागीदार बन चुकी हैं। देश में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे कुल 4.50 करोड़ छात्रों में से 49.7 प्रतिशत केवल महिलाएं हैं। संख्या के लिहाज से देखें तो 2021-22 में 2.07 करोड़ महिलाएं उच्च शिक्षा का हिस्सा थीं। यह आंकड़ा 2022-23 में बढ़कर 2.18 करोड़ और 2023-24 में 2.24 करोड़ हो गया। महज दो वर्षों के भीतर लगभग 17 लाख महिलाओं की यह शानदार वृद्धि इस बात की गवाह है कि कुल नामांकन में हुई बढ़ोतरी का लगभग पूरा श्रेय महिलाओं को ही जाता है।

स्नातकोत्तर (पोस्टग्रेजुएट) स्तर पर तो महिलाओं का दबदबा और भी अधिक है, जहां कुल दाखिले में उनकी हिस्सेदारी 56.2 प्रतिशत है। यह दर्शाता है कि लड़कियां स्नातक की डिग्री के बाद भी अपनी पढ़ाई मजबूती से जारी रख रही हैं। सामाजिक श्रेणियों में भी यह भागीदारी बेहद शानदार है। अनुसूचित जाति (SC) के छात्रों में 50.3 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति (ST) में 52.3 प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों में 49.9 प्रतिशत हिस्सा महिलाओं का है।

सर्वेक्षण में सभी वर्गों की महिलाओं के लिए बेहतरीन आंकड़े पेश किए गए हैं। एससी वर्ग की छात्राओं की संख्या 2021-22 के लगभग 31.7 लाख से बढ़कर 2022-23 में 33.9 लाख और 2023-24 में 35.1 लाख हो गई है। वहीं एसटी महिलाओं के लिए यह आंकड़ा 13.46 लाख से शुरू होकर 14.67 लाख और फिर 15.08 लाख तक पहुंच गया। इसी तरह ओबीसी महिलाओं का नामांकन 78.19 लाख से बढ़कर 85.32 लाख और अंततः 90.05 लाख हो गया। अगर वृद्धि दर की बात करें तो इन दो वर्षों में एससी, एसटी और ओबीसी महिलाओं के नामांकन में क्रमशः लगभग 10.7 प्रतिशत, 12.0 प्रतिशत और 15.2 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।

राज्यों के स्तर पर भी यही उत्साहजनक कहानी देखने को मिल रही है। वर्ष 2023-24 के दौरान बिहार, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और केरल जैसे राज्यों में महिलाओं का नामांकन पुरुषों से कहीं अधिक रहा। बिहार में यह आंकड़ा 14.0 लाख बनाम 13.6 लाख, पश्चिम बंगाल में 12.5 लाख बनाम 12.0 लाख, तेलंगाना में 9.1 लाख बनाम 8.7 लाख और केरल में 7.4 लाख बनाम 5.4 लाख रहा। इसके अतिरिक्त हरियाणा, पंजाब, झारखंड, छत्तीसगढ़, असम और उत्तराखंड में भी ऐसा ही सकारात्मक रुख देखा गया। पूर्वोत्तर क्षेत्र में भी कुल 6.2 लाख पुरुषों के मुकाबले 7.0 लाख महिलाओं ने उच्च शिक्षा में दाखिला लिया।

हालांकि, तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में स्थिति अभी उतनी सुनहरी नहीं है। भले ही महिलाओं ने लगभग हर क्षेत्र में अपनी प्रगति दर्ज की है, लेकिन स्नातक स्तर पर इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी जैसे मुख्य तकनीकी पाठ्यक्रमों में वे अभी भी पीछे हैं। इस क्षेत्र में छात्राओं का अनुपात 2022-23 के 30.1 प्रतिशत से मामूली रूप से बढ़कर 2023-24 में 31.1 प्रतिशत ही हो पाया है। स्पष्ट है कि उच्च शिक्षा तक पहुंच तेजी से महिलाओं के पक्ष में झुक रही है, लेकिन तकनीकी क्षेत्रों में लैंगिक असमानता आज भी ध्यान देने योग्य एक प्रमुख चिंता का विषय बनी हुई है।

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