नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पत्रकार और यूट्यूबर अभिसार शर्मा को बड़ी राहत देते हुए उनकी गिरफ्तारी पर चार हफ्तों के लिए रोक लगा दी। हालांकि, अदालत ने असम पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर को रद्द करने की उनकी मांग स्वीकार नहीं की। यह एफआईआर शर्मा के उस वीडियो को लेकर दर्ज की गई है, जिसमें उन्होंने राज्य सरकार पर "सांप्रदायिक राजनीति" का आरोप लगाया था और 3,000 बीघा जनजातीय भूमि को एक निजी कंपनी को दिए जाने पर सवाल उठाया था।
जस्टिस एम.एम. सुंदरश और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की बेंच ने शर्मा को सलाह दी कि वह एफआईआर रद्द करने के लिए गुवाहाटी हाईकोर्ट का रुख करें।
धारा 152 पर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने यह जरूर माना कि शर्मा द्वारा दायर याचिका, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है, उस पर सुनवाई की जाएगी। यह धारा पुराने राजद्रोह कानून से मिलती-जुलती है। हालांकि, अदालत ने बार-बार आग्रह करने के बावजूद शर्मा की एफआईआर रद्द करने वाली याचिका पर सुनवाई से साफ इनकार कर दिया।
कपिल सिब्बल ने उठाया समानता का मुद्दा
पत्रकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ पहले ही पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन और करण थापर की याचिकाओं पर सुनवाई करने के लिए राजी हो चुकी है। ऐसे में अदालत को समानता बनाए रखते हुए शर्मा की याचिका भी सुननी चाहिए। लेकिन बेंच ने इस दलील को खारिज कर दिया और सिर्फ अंतरिम सुरक्षा देते हुए उन्हें हाईकोर्ट जाने की अनुमति दी।
वीडियो पर दी सफाई
अभिसार शर्मा ने अदालत को बताया कि उनका वीडियो असम हाईकोर्ट, गुवाहाटी की हालिया कार्यवाही से जुड़ा हुआ है, जिसमें भूमि आवंटन का मामला उठा था। उन्होंने यह भी कहा कि उन पर लगाए गए आरोप निराधार हैं और उनके बयानों का आधार तथ्यों पर है। साथ ही, उनके दावे असम के मुख्यमंत्री के सार्वजनिक मंचों पर दिए गए भाषणों के वीडियो क्लिप्स से समर्थित हैं, जो खुले स्रोतों में उपलब्ध हैं।