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अमानवीय व्यवहार: दिल्ली के सरकारी स्कूलों में सफाई कर्मचारियों को 5 महीने से वेतन नहीं, कैसे चलाएंगे घर?

नई दिल्ली- दिल्ली सरकार द्वारा स्वच्छता अभियान और स्कूलों में स्वच्छता को बढ़ावा देने के दावों के बीच, एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। लगभग 250 सरकारी स्कूलों में तैनात करीब 1,500 सफाई कर्मचारियों को पिछले पांच महीनों से वेतन नहीं मिला है। यह मुद्दा वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने शिक्षा निदेशालय के समक्ष औपचारिक रूप से उठाया है जिसमें तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई है।

अशोक अग्रवाल ने शिक्षा सचिव को लिखे एक पत्र में बताया कि ये सफाई कर्मचारी, जो आउटसोर्सिंग एजेंसी ओरियन सिक्योरिटी सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से नियुक्त किए गए हैं, अप्रैल 2025 से अपने वेतन से वंचित हैं। ये कर्मचारी, जो समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आते हैं, सरकारी स्कूलों की दैनिक सफाई और रखरखाव का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।

अग्रवाल ने अपने पत्र में लिखा, “पिछले पांच महीनों से इन सफाई कर्मचारियों को उनका वेतन नहीं दिया गया है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि ये कर्मचारी, जो पहले से ही कम आय वर्ग से हैं और गुजारा करने के लिए संघर्ष करते हैं, इस तरह के अमानवीय व्यवहार का सामना कर रहे हैं।” उन्होंने चेतावनी दी कि वेतन का भुगतान न करना न केवल इन कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों का कारण बन रहा है, बल्कि यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 23 (श्रमिकों के शोषण के खिलाफ अधिकार) का उल्लंघन भी है। इसके अलावा यह कई श्रम कानूनों का भी उल्लंघन करता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने शिक्षा निदेशालय को पत्र भेजकर वेतन संकट का समाधान करने को कहा है।

अग्रवाल ने शिक्षा विभाग से अपील की है कि सभी सफाई कर्मचारियों के लंबित वेतन का तत्काल भुगतान सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने यह भी अनुरोध किया कि भविष्य में ऐसी देरी से बचने के लिए एक उचित तंत्र स्थापित किया जाए। अग्रवाल ने जोर देकर कहा, “एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे वेतन भुगतान में देरी दोबारा न हो।"

ये सफाई कर्मचारी दिल्ली के सरकारी स्कूलों में स्वच्छता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी मेहनत के बावजूद, वेतन की कमी ने उनके परिवारों को बुनियादी जरूरतों जैसे भोजन, आवास और शिक्षा के लिए संघर्ष करने को मजबूर कर दिया है। इस स्थिति ने न केवल कर्मचारियों के मनोबल को प्रभावित किया है, बल्कि सरकार की स्वच्छता पहलों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए हैं।

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