तेलंगाना हाईकोर्ट का फैसला: पहली डिलीवरी में हुए जुड़वा बच्चे, तो दूसरी प्रेगनेंसी में नहीं रोक सकते मैटरनिटी लीव

11:42 AM Jul 16, 2026 | Rajan Chaudhary

हैदराबाद। किसी भी महिला सरकारी कर्मचारी को उसकी दूसरी प्रेगनेंसी के दौरान मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) देने से केवल इसलिए इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने अपनी पहली प्रेगनेंसी में जुड़वा बच्चों को जन्म दिया था। तेलंगाना हाईकोर्ट ने नियमों की मानवीय व्याख्या करते हुए यह बेहद अहम फैसला सुनाया है।

यह महत्वपूर्ण फैसला बुधवार को जस्टिस के. सरथ की अदालत ने सुनाया। कोर्ट मंचिर्याल जिले के एक सरकारी कन्या महाविद्यालय में कार्यरत 35 वर्षीय जूनियर अंग्रेजी लेक्चरर जादी स्वरूपा रानी की याचिका पर सुनवाई कर रहा था।

याचिकाकर्ता ने साल 2023 में अपनी पहली प्रेगनेंसी के दौरान जुड़वा बच्चों को जन्म दिया था। इसके बाद अप्रैल 2026 में जब उन्होंने अपनी दूसरी प्रेगनेंसी से तीसरे बच्चे को जन्म दिया, तो कॉलेज प्रशासन ने उनका मैटरनिटी लीव का आवेदन खारिज कर दिया।

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प्रशासन का तर्क था कि पहली डिलीवरी में जुड़वा बच्चों के जन्म के कारण महिला के पास पहले से ही दो जीवित बच्चे हैं। अधिकारियों ने राज्य के 'दो बच्चों के नियम' (टू-चाइल्ड नॉर्म) का हवाला देते हुए दावा किया कि महिला अब मातृत्व अवकाश पाने के अयोग्य है।

इस मनमाने फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता के वकील गट्टू विनय कुमार ने कोर्ट में मजबूती से अपना पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि जुड़वा बच्चों का जन्म एक पूरी तरह से जैविक प्रक्रिया है, जिस पर किसी भी इंसान का कोई नियंत्रण नहीं होता। उनका कहना था कि इस आधार पर दूसरी प्रेगनेंसी के लिए मातृत्व लाभ से वंचित करना महिला के मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।

दूसरी ओर, स्कूल का संचालन करने वाली सोसायटी ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उनके वकील भानोथु हुसैन ने 2010 और 2014 के सेवा नियमों का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि इन नियमों के अनुसार, मैटरनिटी लीव केवल उन विवाहित महिला कर्मचारियों तक सीमित है जिनके दो से कम जीवित बच्चे हैं। उन्होंने अपनी दलील में यह भी कहा कि अगर नियमों से परे जाकर ऐसे लाभ दिए गए, तो इससे सरकार पर बेवजह वित्तीय बोझ पड़ेगा।

राज्य के इस बेहद कठोर रुख को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह पूरा विवाद नियम के होने या न होने का नहीं है। बल्कि, यह मामला नियमों की एक मानवीय और समझदारी पूर्ण व्याख्या का है, खासकर तब जब पहली प्रेगनेंसी में ही महिला को जुड़वा बच्चे हो गए हों।

जस्टिस के. सरथ ने टिप्पणी की कि नियमों की बिल्कुल शाब्दिक व्याख्या करने से मातृत्व अवकाश का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। कोर्ट ने याद दिलाया कि इस नियम का मुख्य मकसद महिलाओं के स्वास्थ्य की रक्षा करना और उन्हें अपनी नौकरी में बने रहने में सक्षम बनाना है।

अपने फैसले को आधार देने के लिए न्यायाधीश ने मद्रास हाईकोर्ट के एक पुराने फैसले का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि तमिलनाडु सरकार ने ऐसे विशेष मामलों में अतिरिक्त डिलीवरी के लिए मातृत्व अवकाश देने के लिए अपने नियमों में खास तौर पर संशोधन किया था। वहीं, आंध्र प्रदेश ने मैटरनिटी लीव का लाभ उठाने के लिए जीवित बच्चों की संख्या वाले प्रतिबंध को अब पूरी तरह से हटा दिया है।

याचिकाकर्ता के अधिकारों को बरकरार रखते हुए न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि महिला अपनी दूसरी प्रेगनेंसी के लिए पूरी तरह से मातृत्व अवकाश की हकदार है। कोर्ट ने आदेश दिया कि 14 अप्रैल 2026 से 11 अक्टूबर 2026 तक की 180 दिनों की अवधि के लिए महिला की छुट्टी मंजूर की जाए। इसके साथ ही अधिकारियों को यह सख्त निर्देश दिया गया कि वे इस पूरी छुट्टी की अवधि के लिए महिला को उसका पूरा वेतन और भत्ते भी अदा करें।