भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार की राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के अनुसूचित जाति (एससी) प्रमाण पत्र को लेकर चल रहे विवाद में राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति ने उनके जाति प्रमाण पत्र को वैध मानते हुए उन्हें क्लीन चिट दे दी है। समिति के इस निर्णय के बाद राजनीतिक विवाद भी तेज हो गया है। शिकायतकर्ता एवं मध्य प्रदेश कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने आरोप लगाया है कि जांच निष्पक्ष नहीं हुई और सरकार के दबाव में समिति ने उनके द्वारा प्रस्तुत महत्वपूर्ण दस्तावेजों और ऐतिहासिक तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने कहा कि इस निर्णय के खिलाफ अब हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाएगा।
प्रेस वार्ता में प्रदीप अहिरवार ने आरोप लगाया कि जांच प्रक्रिया के दौरान मंत्री प्रतिमा बागरी छह अन्य मंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मिली थीं, जिसके बाद जांच प्रभावित हुई। उनका दावा है कि शिकायत पूरी तरह दस्तावेजी साक्ष्यों और संवैधानिक प्रावधानों पर आधारित थी, लेकिन समिति ने उन तथ्यों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति वर्ग के अधिकारों की रक्षा के लिए वह अंतिम सांस तक कानूनी लड़ाई लड़ेंगे और यदि हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली तो सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे।
क्या है पूरा विवाद?
यह मामला राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र की वैधता से जुड़ा है। शिकायतकर्ता प्रदीप अहिरवार का कहना है कि प्रतिमा बागरी का परिवार ऐतिहासिक रूप से उस क्षेत्र से संबंधित है, जहां बागरी समुदाय को अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त नहीं था। उनके अनुसार उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज, सरकारी रिकॉर्ड, जनगणना के आंकड़े और अन्य अभिलेख इस दावे का समर्थन करते हैं। दूसरी ओर, राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति ने उपलब्ध साक्ष्यों और रिकॉर्ड के आधार पर प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को वैध माना है। अब इस निर्णय को न्यायालय में चुनौती देने की तैयारी की जा रही है।
1950 के अनुसूचित जाति आदेश का दिया गया हवाला
प्रदीप अहिरवार ने कहा कि संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 अनुसूचित जातियों के निर्धारण का मूल आधार है। उनका आरोप है कि जिस समय प्रतिमा बागरी का परिवार संबंधित क्षेत्र में निवास करता था, उस समय वहां बागरी समुदाय अनुसूचित जाति की सूची में शामिल नहीं था। उन्होंने कहा कि समिति ने अपने निर्णय में इस पहलू को स्पष्ट रूप से संबोधित नहीं किया, जबकि यह पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु था।
1961 और 1971 की जनगणना रिकॉर्ड का भी किया उल्लेख
शिकायतकर्ता का दावा है कि वर्ष 1961 और 1971 की जनगणना में प्रतिमा बागरी के परिवार ने स्वयं को अनुसूचित जाति के रूप में दर्ज नहीं कराया था। उनका कहना है कि जनगणना के ये रिकॉर्ड जांच का महत्वपूर्ण आधार बन सकते थे, लेकिन समिति ने अपने निर्णय में इन अभिलेखों का उल्लेख नहीं किया। उनके अनुसार इससे जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।
TRI की रिपोर्ट को भी नजरअंदाज करने का आरोप
अहिरवार ने ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI) की वर्ष 1998-99 की मानवशास्त्रीय अध्ययन रिपोर्ट का भी हवाला दिया। उनका कहना है कि इस अध्ययन में विंध्य और बुंदेलखंड क्षेत्र के बागरी समुदाय को राजपूत/ठाकुर की उपजाति बताया गया था। शिकायतकर्ता का आरोप है कि यह अध्ययन स्वयं छानबीन प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज था, लेकिन समिति ने इसे निर्णय का आधार नहीं बनाया। उनका यह भी दावा है कि रिपोर्ट में इस समुदाय को बड़े कृषक और मालगुजार वर्ग का बताया गया है तथा सामाजिक छुआछूत जैसी स्थिति का उल्लेख नहीं है।
1976 के बाद अनुसूचित जाति सूची में बदलाव को बताया विवाद की जड़
प्रदीप अहिरवार का कहना है कि वर्ष 1976 में पूरे मध्य प्रदेश के लिए अनुसूचित जातियों की संयुक्त सूची लागू की गई, जिसमें "बागरी/बागड़ी" का नाम शामिल किया गया। उनका आरोप है कि इसके बाद ऐसे क्षेत्रों के लोगों ने भी अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र बनवाने शुरू कर दिए, जहां 1950 से 1976 के बीच बागरी समुदाय को अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त नहीं था। उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को भी समिति ने पर्याप्त महत्व नहीं दिया।
क्षेत्रीय अंतर और 2007 के राजपत्र का भी उठाया मुद्दा
शिकायतकर्ता ने दावा किया कि अनुसूचित जाति का लाभ पाने वाले मूल बागरी समुदाय का निवास मुख्यतः मालवा, निमाड़ और मध्यभारत क्षेत्र में रहा है, जबकि प्रतिमा बागरी का परिवार लंबे समय से सतना (तत्कालीन विंध्य प्रदेश) का निवासी है। उन्होंने कहा कि मंत्री द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों में भी परिवार का लगभग 112 वर्षों से सतना में निवास दर्शाया गया है। इसके अलावा उन्होंने वर्ष 2007 के एक राजपत्र का हवाला देते हुए कहा कि उसमें क्षेत्रवार स्थिति स्पष्ट की गई थी, लेकिन समिति ने इस बिंदु पर भी अपने निर्णय में कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की।
अब हाईकोर्ट में होगी कानूनी लड़ाई
प्रदीप अहिरवार ने स्पष्ट किया कि राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति के फैसले के खिलाफ जल्द ही हाईकोर्ट में याचिका दायर की जाएगी। उनका कहना है कि यदि वहां से भी न्याय नहीं मिला तो मामला सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि अनुसूचित जाति वर्ग के अधिकारों और संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ा मुद्दा है।
गौरतलब है कि राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति ने प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को वैध माना है। वहीं शिकायतकर्ता इस निर्णय से असहमत हैं और इसे न्यायालय में चुनौती देने की घोषणा कर चुके हैं। मामले की आगे की कानूनी स्थिति न्यायालय में होने वाली सुनवाई और उसके निर्णय पर निर्भर करेगी।