नई दिल्ली- दलित हिस्ट्री मंथ (Dalit History Month) की शुरुआत के साथ, चेन्नई के नीलम कल्चरल सेंटर (Neelam Cultural Centre) ने 2 अप्रैल से "पी.के. रोज़ी फिल्म फेस्टिवल" लॉन्च किया है। यह 3 दिवसीय फेस्टिवल, जिसका आयोजन फिल्म निर्माता पा. रंजीत की देखरेख में किया जा रहा है, मलयालम सिनेमा की पहली अभिनेत्री पी.के. रोज़ी को समर्पित है। तीन दिनों के दौरान कई राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय सार्थक फिल्मों को स्क्रीन किया जाएगा लेकिन इसमें रोज़ी की पहली और एकमात्र फिल्म 'विगतकुमारन' नही होगी, जिसे प्रदर्शन के समय 1928 में जातिवादी लोगों ने नष्ट कर दिया और इसकी कोई कॉपी नहीं बची।
रोज़ी के बारे में कई लोग जानकारी रखते हैं लेकिन जे.सी. डैनियल के बारे में संभवतया कम ही लोग जानते हैं। वे मलयालम सिनेमा के पितामह कहलाते हैं। डैनियल ही 1928 में रिलीज़ हुई पहली मलयालम फीचर फिल्म विगतकुमारन (The Lost Child) के अभिनेता और निर्देशक थे। यह फिल्म उनकी एकमात्र सिनेमाई उपलब्धि थी, जिसने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई, लेकिन जातिगत हिंसा का शिकार भी बना दिया। उनकी कहानी बाद में सेल्युलॉइड (2013) नामक बायोपिक में दिखाई गई। विगतकुमारन जातिवादी हिंसा और सामाजिक बहिष्कार की भेंट चढ़ गई।
विगतकुमारन: रोज़ी और डैनियल का एकमात्र सिनेमाई प्रयास
जोसेफ चेल्लैया डैनियल नाडार भारतीय सिनेमा के एक अग्रणी फिल्मकार थे, जिन्हें मलयालम सिनेमा का पिता माना जाता है। वह केरल के पहले फिल्म निर्माता थे और उन्होंने केरल की पहली फीचर फिल्म "विगतकुमारन" (The Lost Child, 1928) का निर्माण, निर्देशन, लेखन, छायांकन, संपादन और अभिनय किया। इसके साथ ही, उन्होंने केरल की पहली फिल्म स्टूडियो "द ट्रावनकोर नेशनल पिक्चर्स" की स्थापना की।
अगस्तीश्वरम में जन्मे डैनियल ने त्रिवेंद्रम के महाराजा कॉलेज से पढ़ाई की। सिर्फ 15 साल की उम्र में ही उन्होंने "इंडियन आर्ट ऑफ फेंसिंग एंड स्वॉर्ड प्ले" नामक किताब लिख डाली थी।
डैनियल को सिनेमा की ताकत का अंदाजा था। वे कलारीपयट्टू जैसी पारंपरिक कलाओं को फिल्मों के जरिए लोकप्रिय बनाना चाहते थे। पर तब केरल के लोगों को सिनेमा के बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी।
मद्रास (चेन्नई) में फिल्म बनाना सीखने गए, पर स्टूडियो में घुसने तक नहीं दिया गया। हार न मानते हुए वे बॉम्बे (मुंबई) पहुंचे। वहां खुद को केरल का शिक्षक बताकर स्टूडियो में घुसने में कामयाब रहे। फिल्म बनाने का सामान और ज्ञान लेकर केरल लौट आए। 1926 में डैनियल ने केरल की पहली फिल्म कंपनी "द ट्रावनकोर नेशनल पिक्चर्स" बनाई। अपनी 108 एकड़ ज़मीन बेचकर 4 लाख रुपये जुटाए।
विगतकुमारन (1928) एक मूक फिल्म थी जिसमें डैनियल ने खुद हीरो का रोल किया। पी.के. रोज़ी (एक दलित महिला) ने नायिका की भूमिका निभाई। डैनियल ने लिखा, निर्देशित किया, कैमरा संभाला और एडिटिंग भी की।
पी.के. रोज़ी (1903-1988) एक दलित (पुलाया समुदाय) महिला थीं, जिन्होंने फिल्में में एक नायर स्त्री का किरदार निभाया। फिल्म रिलीज़ होते ही उच्च जाति के लोगों ने थिएटर में तोड़फोड़ की, पर्दे जला दिए और रोज़ी के घर पर हमला किया।
फिल्म रिलीज के बाद हुआ विरोध
7 नवंबर 1928 को त्रिवेंद्रम के कैपिटल थिएटर में शो के दौरान:
उच्च जाति के लोगों ने एक दलित महिला द्वारा नायर स्त्री का रोल करने पर भारी विरोध किया
स्क्रीन पर पत्थर फेंके गए
रोज़ी को थिएटर में घुसने नहीं दिया गया
फिल्म ने पैसे नहीं कमाए और डैनियल कर्ज में डूब गए
आलाप्पुझा के स्टार थिएटर में फिल्म को अच्छा रिस्पॉन्स मिला। चूँकि यह मूक फिल्म थी, एक व्यक्ति कहानी समझाता था। एक बार स्क्रीन फीकी पड़ गई तो लोगों ने नाराजगी जताई, पर जब समझाया गया कि यह पहली मलयालम फिल्म है तो सबने तालियाँ बजाईं। अन्य स्थानों पर जमकर बवाल हुआ और लोगों ने स्क्रीन तोड़ फोड़ दिए।
जातिवादी हमलों से बचने के लिए एक ट्रक ड्राईवर की सहायता से रोज़ी केरल छोड़कर तमिलनाडु चली गयीं, जहाँ वे राजम्मल के नाम से जीवन बिताती रहीं। बताया जाता है इसी ट्रक ड्राईवर से बाद में उनका विवाह भी हुआ।
फिल्म का बहिष्कार और विरोध होने के बाद डैनियल का बुरा हाल हुआ। उन्हें फिल्म के उपकरण बेचने पड़े और कर्ज में डूबने के बाद स्टूडियो बंद करना पड़ा। तमिलनाडु के पालयमकोट्टई में दंत चिकित्सक के रूप में पूरा जीवन गुमनामी में बिताया। केरल सरकार ने पेंशन देने से मना कर दिया क्योंकि वे तमिलनाडु में रहे। 27 अप्रैल 1975 को गुमनामी में मृत्यु हो गई।
प्रख्यात फिल्म पत्रकार चेलंगट्ट गोपालकृष्णन ने 1960 से डैनियल को मलयालम सिनेमा का जनक साबित करने की मुहिम चलाई। अपनी किताबों और लेखों के माध्यम से साबित किया कि 'विगतकुमारन' ही पहली मलयालम फिल्म थी और जे.सी. डैनियल इसके निर्देशक, निर्माता, सिनेमैटोग्राफर और मुख्य अभिनेता थे।
केरल सरकार ने शुरू में उनके इस अभियान को खारिज कर दिया। सरकार का तर्क था कि डैनियल 'मलयाली नहीं थे' क्योंकि उनका जन्म तमिलनाडु के अगस्तीश्वरम में हुआ।सरकारी रुख था कि यदि डैनियल को पेंशन या आर्थिक सहायता चाहिए, तो उन्हें तमिलनाडु सरकार से संपर्क करना चाहिए।
गोपालकृष्णन के लगातार प्रयासों के बाद आखिरकार डैनियल को केरल का निवासी मान्यता मिली, उन्हें आधिकारिक तौर पर 'मलयालम सिनेमा के जनक' का सम्मान दिया गया। यह ऐतिहासिक न्याय 20वीं सदी के अंत में हासिल हुआ।
सेल्युलॉइड (2013 फिल्म)
डैनियल के जीवन पर आधारित फिल्म 'सेल्युलॉइड' विख्यात निर्देशक कमल ने बनाई जो 2013 में रिलीज हुई। इसमें पृथ्वीराज सुकुमार ने डैनियल और नवोदित अभिनेत्री चांदनी ने रोज़ी की मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। इसमें उनकी पहली फिल्म विगतकुमारन के निर्माण की चुनौतियाँ दिखाई गई। फिल्म में पी.के. रोज़ी की कहानी भी शामिल है, जो मलयालम सिनेमा की पहली अभिनेत्री थीं। फिल्म की कहानी चेलंगट्ट गोपालकृष्णन की किताब 'लाइफ ऑफ जे.सी. डैनियल' से प्रेरित है।
फिल्म की शूटिंग नवंबर 2012 में शुरू हुई। फिल्म के पोस्टर को 16 साल के एक छात्र अश्विन ने डिज़ाइन किया था, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। फिल्म फरवरी 2013 में रिलीज़ हुई और दर्शकों व आलोचकों दोनों ने इसे पसंद किया।
फिल्म 'सेल्युलॉइड' को लेकर एक बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब इसमें प्रसिद्ध लेखक व सिविल सर्वेंट मलयातूर रामकृष्णन और पूर्व मुख्यमंत्री के. करुणाकरन के बारे में आपत्तिजनक बातें सामने आई। हालांकि करुणाकरन का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया, लेकिन मलयातूर के किरदार को जातिवादी दिखाया गया जो नहीं चाहता था कि एक नादार (जे.सी. डैनियल) को मलयालम सिनेमा का जनक माना जाए।
निर्देशक कमल ने एक इंटरव्यू में विवाद और बढ़ाते हुए दावा किया कि करुणाकरन और मलयातूर रामकृष्णन ने जानबूझकर डैनियल को उनका हक नहीं दिलाया। उन्होंने बताया कि फिल्म में सिद्दीक का किरदार मलयातूर को ही दर्शाता है, लेकिन विवाद से बचने के लिए उन्होंने जानबूझकर करुणाकरन और मलयातूर के नाम नहीं लिए।
फिल्म ने 7 केरल स्टेट फिल्म अवार्ड जीते, जिसमें सर्वश्रेष्ठ फिल्म और पृथ्वीराज सुकुमार के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार शामिल है। ऑल लाइट्स फिल्म सर्विसेज (ALFS) के सहयोग से फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली, बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म सुपरहिट साबित हुई।
यह फिल्म न सिर्फ मनोरंजन करती है, बल्कि मलयालम सिनेमा के इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को भी सामने लाती है। जे.सी. डैनियल और पी.के. रोज़ी के संघर्ष की यह कहानी दर्शकों को भावुक कर देती है।