+

'दहेज प्रताड़ना के कारण आत्महत्या दुर्लभ नहीं': कलकत्ता हाईकोर्ट ने पति की उम्रकैद की सजा 10 साल में बदली

नई दिल्ली: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने दहेज हत्या के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी पति की उम्रकैद की सजा को कम कर दिया है। अदालत ने अपनी कड़ी टिप्पणी में कहा कि दहेज प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या करने के मामले हमारे समाज में असामान्य या बहुत दुर्लभ नहीं हैं। इस महत्वपूर्ण फैसले में कोर्ट ने संपत्ति की मांग को दहेज से जोड़ते हुए सजा को बरकरार रखा है।

यह मामला साल 2014 का है, जब एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी ने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी थी। इस दर्दनाक घटना की सुनवाई करते हुए जस्टिस अरिजीत बनर्जी और जस्टिस अपूर्बा सिन्हा रॉय की खंडपीठ ने पति सजल पारुई की आजीवन कारावास की सजा को घटाकर 10 साल के कठोर कारावास में तब्दील कर दिया है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया है कि सजल पर लगाए गए जुर्माने की राशि में कोई बदलाव नहीं होगा।

उच्च न्यायालय ने सजा कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के 'हरि ओम' मामले में दिए गए फैसले को अपना आधार बनाया। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया था कि दहेज मृत्यु के हर मामले में उम्रकैद देना अनिवार्य नहीं है। अधिकतम सजा का प्रावधान केवल दुर्लभ से दुर्लभ मामलों तक ही सीमित रखा जाना चाहिए। इसी आधार पर पति की सजा घटी, जबकि सबूतों के अभाव में सजल के माता-पिता को अदालत ने पूरी तरह बरी कर दिया है, जिन्हें पहले सात साल जेल की सजा सुनाई गई थी।

इस मामले में एक और बड़ा कानूनी पहलू सामने आया है। अदालत ने यह साफ किया कि पत्नी पर अपने मायके से पैतृक संपत्ति का हिस्सा मांग कर लाने का दबाव बनाना भी सीधे तौर पर दहेज की मांग माना जाएगा। अदालत ने अभियोजन पक्ष की इस दलील को सही माना कि पति द्वारा लगातार पैसों की मांग की जा रही थी। इसी निरंतर मानसिक दबाव और प्रताड़ना के चलते महिला ने न केवल खुद को फांसी लगाई, बल्कि अपनी मासूम बच्ची का भी जीवन समाप्त कर दिया।

इस घटना की शुरुआत अप्रैल 2010 से होती है, जब सजल पारुई और चयनिका की शादी हुई थी। उस समय वधू पक्ष ने अपनी क्षमता के अनुसार सोना, नकद और जरूरी घरेलू सामान दिया था। शादी के कुछ समय बाद दंपति को एक बेटी हुई। आरोप है कि इसके बाद सजल और उसके परिवार ने और अधिक पैसों की मांग शुरू कर दी और चयनिका पर पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा मांगने का दबाव बनाया। बहन को परेशानी से बचाने के लिए उसके भाई ने पुश्तैनी जमीन का एक हिस्सा बेचकर उसे पैसे भी सौंपे थे।

इसके बावजूद प्रताड़ना का सिलसिला नहीं रुका और जून 2014 में एक खौफनाक दिन चयनिका के भाई को उसके ससुराल वालों का फोन आया। जब वह आनन-फानन में अपनी बहन के घर पहुंचा, तो वहां का नजारा दिल दहला देने वाला था। उसकी बहन और भानजी दोनों के शव छत से लटक रहे थे। इस भयावह घटना के बाद पति और उसके माता-पिता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 304बी के तहत दहेज हत्या का मामला दर्ज किया गया था। अब इसी मामले में हाईकोर्ट ने न्याय का रुख स्पष्ट करते हुए यह अहम फैसला सुनाया है।

Trending :
facebook twitter