मध्य प्रदेश में OBC आरक्षण पर सरकार से दो सप्ताह में जवाब तलब, देरी पर 15 हजार का जुर्माना

04:49 PM Apr 04, 2025 | Ankit Pachauri

भोपाल। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर ने ओबीसी वर्ग को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दिए जाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर राज्य सरकार को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का अंतिम मौका दिया है। यदि सरकार समय पर जवाब नहीं देती है, तो उसे 15 हजार रुपये के जुर्माने के साथ जवाब देना होगा।

यह याचिका एडवोकेट यूनियन फॉर डेमोक्रेसी एंड सोशल जस्टिस नामक संस्था द्वारा हाईकोर्ट में दायर की गई थी। याचिका क्रमांक 8967/2024 पर अब तक 11 बार सुनवाई हो चुकी है, लेकिन राज्य सरकार ने अभी तक अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं किया है। न ही सरकार ने इस याचिका को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने के लिए कोई ट्रांसफर याचिका दायर की है।

याचिका में क्या कहा गया?

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर एवं विनायक प्रसाद शाह ने कोर्ट को बताया कि 2011 की जनगणना के अनुसार मध्य प्रदेश में ओबीसी की आबादी 50.9% है, जबकि अनुसूचित जाति (SC) की 15.6%, अनुसूचित जनजाति (ST) की 21.14%, और मुस्लिम समुदाय की 3.7% जनसंख्या है। इसके बावजूद राज्य सरकार ने ओबीसी वर्ग को केवल 14% (जिसमें 13% विवादित है) आरक्षण प्रदान किया है, जबकि एससी को 16% और एसटी को 20% आरक्षण दिया गया है।

Trending :

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश और मध्य प्रदेश सरकार की निष्क्रियता

याचिकाकर्ता पक्ष ने कोर्ट में दलील दी कि इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया था कि वे ओबीसी समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का नियमित रूप से परीक्षण करने के लिए एक स्थायी आयोग गठित करें। हालांकि, मध्य प्रदेश में रामजी महाजन आयोग के बाद से आज तक किसी भी सरकार ने ओबीसी वर्ग की स्थिति सुधारने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।

मध्य प्रदेश ओबीसी आयोग का अब तक अपना स्वतंत्र कार्यालय भी नहीं है, और उसका संचालन एक किराए के भवन से हो रहा है। सरकार ने आयोग का विधिवत गठन भी नहीं किया है।

अन्य राज्यों से तुलना

देश में तमिलनाडु एकमात्र ऐसा राज्य है जो ओबीसी वर्ग को उनकी जनसंख्या के अनुपात में 50% आरक्षण देता है। वहां कुल आरक्षण 69% है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी मान्यता दी है। इसके बावजूद मध्य प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की गलत व्याख्या करके ओबीसी वर्ग को उनका अधिकार देने में टालमटोल कर रही है।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि सरकार की इस नीति के कारण ओबीसी वर्ग के लाखों युवा कृत्रिम भेदभाव का सामना कर रहे हैं और बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। प्रदेश में सभी अन्य वर्गों को उनकी जनसंख्या से अधिक आरक्षण प्रदान किया गया है, लेकिन ओबीसी वर्ग को जानबूझकर उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।

कोर्ट ने दिए निर्देश

मुख्य न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति विवेक जैन की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया है। यदि इस अवधि के भीतर सरकार ने जवाब नहीं दिया, तो उसे 15 हजार रुपये के जुर्माने के साथ जवाब प्रस्तुत करना होगा।

'द मूकनायक' से बातचीत में वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने कहा कि सरकार जानबूझकर ओबीसी वर्ग के साथ अन्याय कर रही है। उन्होंने कहा, "प्रदेश में अन्य वर्गों को उनकी जनसंख्या से अधिक आरक्षण दिया गया है, लेकिन ओबीसी समुदाय को उनका उचित हक नहीं मिल रहा। सरकार को जवाब देने से बचने की आदत हो गई है, लेकिन अब अदालत ने सख्ती दिखाई है, जिससे सरकार को जवाब देना ही पड़ेगा।"

उन्होंने आगे कहा, "तमिलनाडु की तर्ज पर यदि मध्य प्रदेश में भी ओबीसी वर्ग को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दिया जाता, तो लाखों युवा रोजगार के अवसरों से वंचित नहीं होते। सरकार को चाहिए कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुरूप एक स्थायी ओबीसी आयोग का गठन करे और आरक्षण नीति में सुधार लाए।"

इस मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी, जिसमें यह देखा जाएगा कि सरकार अपने जवाब में क्या तर्क प्रस्तुत करती है और ओबीसी वर्ग को उनका हक दिलाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।