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मेरठ में चर्म शोधन यूनिट्स सील होने से 150 दलित परिवारों की आजीविका पर संकट, NHRC ने कलेक्टर से मांगा ब्यौरा

मेरठ- जिले के डूंगर चर्मशोधन प्रकरण में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने संज्ञान लेते हुए जिला मजिस्ट्रेट मेरठ को नोटिस जारी किया है। आयोग ने मामले में की गई कार्रवाई रिपोर्ट दो सप्ताह के भीतर प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। गौरतलब है कि 21 मई को मेरठ में दलितों पर बढ़ते अत्याचारों के खिलाफ शोषित क्रांति दल के एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रीय अध्यक्ष रविकांत के नेतृत्व में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को एक शिकायत पत्र सौंपा था।

शिकायत में गांव डूंगर स्थित चर्मशोधन इकाइयों को बिना पूर्व सूचना के सील किए जाने का मामला उठाया गया था। शोषित क्रांति दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रविकांत ने बताया कि गांव डूंगर में दलित समाज के लोग पीढ़ियों से चर्मशोधन का कार्य करते आ रहे हैं। उनके अनुसार जिला ग्राम्य विकास अभिकरण, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इन चर्मशोधन इकाइयों का निर्माण कराया गया था और उनका अनुबंध 17 जून 2034 तक वैध है।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि 13 अप्रैल को जिला प्रशासन ने बिना किसी पूर्व सूचना के इन चर्मशोधन इकाइयों पर सील लगा दी। आरोप है कि चर्मशोधकों को अपना कच्चा माल हटाने या उपयोग करने का भी पर्याप्त समय नहीं दिया गया, जिसके कारण लाखों रुपये का माल खराब होकर नष्ट हो गया। शोषित क्रांति दल का दावा है कि इस कार्रवाई से करीब 150 दलित परिवारों की आजीविका प्रभावित हुई है और वे आर्थिक संकट तथा भुखमरी जैसी स्थिति का सामना कर रहे हैं।

शिकायत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से अनुरोध किया गया था कि मेरठ प्रशासन को निर्देशित किया जाए कि चर्मशोधन इकाइयों से सील हटाकर प्रभावित परिवारों को पुनः अपना व्यवसाय संचालित करने और आजीविका अर्जित करने की अनुमति दी जाए। मामले को गंभीरता से लेते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने जिला मजिस्ट्रेट मेरठ से दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट तलब की है।

गांववालों ने की थी शिकायत, एनजीटी से बंद करने के आदेश

गांव में लंबे समय से संचालित इस चर्म शोधन कारखाने को लेकर वर्षों से प्रदूषण की शिकायतें सामने आती रही हैं। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, कारखाने से निकलने वाले प्रदूषित पानी और दुर्गंध के कारण आसपास के क्षेत्रों में जनजीवन प्रभावित हो रहा है। आसपास के गांवों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को लेकर भी ग्रामीण चिंता जताते रहे हैं।

इस मामले में पूर्व में एनजीटी द्वारा वर्ष 2013 में कारखाने को बंद करने के आदेश दिए गए थे। इसके बावजूद कार्रवाई न होने पर हाल ही में पुनः सुनवाई के दौरान एनजीटी ने जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर असंतोष जताते हुए उच्च स्तरीय जांच के निर्देश दिए थे। प्रशासनिक टीम ने निरीक्षण के बाद कारखाने में कार्यरत ग्रामीणों के साथ बैठक कर स्थिति से अवगत कराया। प्रशासन ने अप्रेल माह में कारखाने को खाली करने के लिए समय दिया और उसके बाद सीलिंग की कार्रवाई की।

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