EPFO वाले खुद ले रहे 37 हज़ार रुपये पेंशन लेकिन EPS पेंशनभोगी मात्र 1,000 रुपये पर गुज़ारे को मजबूर! संसद में असमानता का खुलासा

09:09 AM Apr 07, 2026 | Geetha Sunil Pillai

नई दिल्ली- कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के अपने कर्मचारी और पेंशनभोगी तो हर महीने औसतन 37,045 रुपये की पेंशन पा रहे हैं, लेकिन EPS-1995 योजना के तहत देश के लाखों श्रमिकों और उनके परिवारों को महज 1,000 रुपये या उससे भी कम पर गुजारा करना पड़ रहा है। महंगाई, बढ़ती दवा की कीमतें, किराया और बुनियादी खर्चों के बीच यह राशि नाकाफी है। संसद में राज्यसभा सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास द्वारा पूछे गए दो सवालों के लिखित जवाब में श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने यह चौंकाने वाला आंकड़ा दिया है, जो सरकार की “सामाजिक सुरक्षा” की कहानी को पूरी तरह उलट देता है।

मंत्री शोभा करंदलजे ने 2 अप्रैल को दिए गए जवाब में साफ कहा कि EPFO के कर्मचारी और पेंशनभोगी CCS (Pension) Rules, 2021, CCS (Implementation of NPS) Rules, 2021 और CCS (Extraordinary Pension) Rules, 2023 के दायरे में आते हैं। EPS-1995 के अंतर्गत वे नहीं आते। वर्ष 2024-25 में EPFO के सेवानिवृत्त कर्मचारियों को औसत मासिक पेंशन 37,045 रुपये और वार्षिक पेंशन 4,44,533 रुपये मिली। कुल मिलाकर पेंशन, फैमिली पेंशन और ग्रेच्युटी पर 813.94 करोड़ रुपये खर्च किए गए।

इसी सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने 18 दिसंबर 2025 को भी EPFO की सैलरी, पेंशन और EPS की स्थिति पर सवाल पूछे थे। मंत्री ने उसमें भी विस्तृत आंकड़े दिए। EPS-95 के तहत सितंबर 2025 में विभिन्न श्रेणियों की औसत और मीडियन मासिक पेंशन इस प्रकार है:

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सदस्य पेंशन: औसत 2,239 रुपये, मीडियन 1,496 रुपये

पति/पत्नी पेंशन: औसत 1,508 रुपये, मीडियन 1,000 रुपये

नामांकित व्यक्ति पेंशन: औसत 1,576 रुपये, मीडियन 1,361 रुपये

माता-पिता पेंशन: औसत 1,040 रुपये

बच्चे पेंशन: औसत 558 रुपये, मीडियन 560 रुपये

यतीम पेंशन: औसत 1,485 रुपये, मीडियन 1,521 रुपये

कुल मिलाकर 18,61,183 पेंशनभोगी को 1,000 रुपये से कम मासिक पेंशन मिल रही है, जबकि 12,64,715 को ठीक 1,000 रुपये मिल रहे हैं। यानी 31 लाख से ज्यादा पेंशनभोगी (करीब 35.9%) 1,000 रुपये या उससे कम पर जीवनयापन कर रहे हैं। औसत मासिक पेंशन पूरे EPS पेंशनभोगियों की 9,308 रुपये और मीडियन 7,900 रुपये है। 60% से ज्यादा को 1,500 रुपये से कम और 96.58% को 4,000 रुपये से कम मिलता है।

क्या 1,000 रुपये में परिवार का गुजारा संभव है?

आज के भारत में एक वृद्ध व्यक्ति के लिए मासिक खर्च कितना है? दाल-रोटी, सब्जी, दूध, दवा, बिजली बिल, किराया और इलाज- सिर्फ ये बुनियादी चीजें भी 4,000-5,000 रुपये से कम में नहीं चल सकतीं। कई पेंशनभोगी ग्रामीण इलाकों में रहते हैं जहां भी महंगाई ने सब कुछ महंगा कर दिया है। हृदय रोग, डायबिटीज, आर्थराइटिस जैसी बीमारियां आम हैं। एक महीने की दवा ही 800-1,200 रुपये निकाल लेती है। बच्चे या पोते-पोतियों की पढ़ाई, शादी या बीमारी का खर्च तो दूर की बात। डॉ. जॉन ब्रिटास ने संसद में बार-बार यही सवाल उठाया कि “जो लोग दशकों तक EPF में योगदान देकर इस सिस्टम को चलाया, वे आज क्यों 1,000 रुपये पर जीने को मजबूर हैं, जबकि EPFO के कर्मचारी 37,000 रुपये पेंशन ले रहे हैं?”

सरकार का तर्क है कि EPS-1995 एक Defined Contribution-Defined Benefit योजना है। इसमें नियोक्ता का 8.33% और केंद्र सरकार का 1.16% (15,000 रुपये तक वेतन पर) योगदान जाता है। फंड का वार्षिक एक्ट्यूरियल मूल्यांकन होता है और 31 मार्च 2019 तक घाटा दिखाया गया। इसलिए न्यूनतम पेंशन 1,000 रुपये रखी गई है, जिसके लिए अतिरिक्त बजटीय सहायता दी जाती है। 1 अगस्त 2014 से विकलांग, विधवा, विधुर, नामांकित व्यक्ति और माता-पिता के लिए भी न्यूनतम 1,000 रुपये सुनिश्चित किया गया। लेकिन कुछ मामलों में पुरानी क्लेम या अर्ली पेंशन के कारण यह राशि भी घट जाती है। बच्चों के लिए 250 रुपये और यतीम के लिए 750 रुपये न्यूनतम है।

फंड तो खूब कमाता है, लेकिन पेंशन पर खर्च कम

EPS फंड का कॉर्पस 31 मार्च 2025 तक 9.93 लाख करोड़ रुपये पहुंच चुका है। 2023-24 में सिर्फ ब्याज आय 58,668.73 करोड़ रुपये रही। अन्य आय मिलाकर कुल 59,532.35 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय हुई। लेकिन पूरे साल पेंशनभोगियों को कुल पेंशन भुगतान सिर्फ 14,990.45 करोड़ रुपये हुआ – यानी फंड की आय का केवल एक चौथाई। बाकी पैसा कहां जाता है?

EPFO का अपना प्रशासनिक और स्थापना खर्च 2023-24 में 5,942.51 करोड़ रुपये रहा, जो कुल पेंशन भुगतान का करीब 40% है। यानी हर 2.5 रुपये पेंशन पर 1 रुपये प्रशासन पर खर्च। पिछले पांच सालों में EPFO कर्मचारियों का वेतन व्यय भी तेजी से बढ़ा:

2020-21: 1,933.41 करोड़

2021-22: 2,220.17 करोड़

2022-23: 2,381.61 करोड़

2023-24: 2,544.17 करोड़

2024-25: 2,752.54 करोड़ रुपये

प्रशासनिक खर्च और स्थापना खर्च अलग से करोड़ों में है। डॉ. जॉन ब्रिटास का कहना है कि “EPFO के अपने कर्मचारी 37,000 रुपये पेंशन पाते हैं, जबकि जिन श्रमिकों ने इस फंड को बनाया, वे 1,000-1,500 रुपये पर संघर्ष कर रहे हैं। यह सामाजिक सुरक्षा नहीं, बल्कि दोहरी व्यवस्था है – प्रशासक सुविधाभोगी, श्रमिक उपेक्षित।”

PFO का खर्च vs पेंशनभोगियों की मजबूरी

EPFO का कुल प्रशासनिक, स्थापना और संचालन खर्च पिछले सालों में लगातार बढ़ा है। 2020-21 में स्थापना खर्च 3,421 करोड़ से 2024-25 में 6,022 करोड़ तक पहुंच गया। वहीं EPS पेंशनभोगी महंगाई से जूझ रहे हैं। 1,000 रुपये में आज का राशन, सब्जी, दाल-चावल, चिकित्सा और परिवहन का खर्च कैसे पूरा होगा? कई पेंशनभोगी परिवार में अकेले रहते हैं। कोई सहारा नहीं। सरकार कहती है कि फंड में घाटा है, लेकिन ब्याज आय अकेले पेंशन से चार गुना ज्यादा है। फिर न्यूनतम पेंशन क्यों नहीं बढ़ाई जाती? महंगाई राहत (DA) जैसी सुविधा क्यों नहीं दी जाती?

EPS पेंशनभोगी मुख्य रूप से निजी क्षेत्र के वे कर्मचारी हैं जिन्होंने कम वेतन पर काम किया, PF में योगदान दिया और अब बूढ़ापे में सम्मानजनक जीवन की उम्मीद रखते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि EPFO का खर्च खुद पर ज्यादा, पेंशनभोगियों पर कम है। डॉ. जॉन ब्रिटास ने संसद में इस असमानता को बार-बार उजागर किया। उनका कहना है कि “सरकार EPS फंड की मजबूत स्थिति को नजरअंदाज कर रही है। 9.93 लाख करोड़ का कॉर्पस और 59,000 करोड़ से ज्यादा सालाना आय होने के बावजूद पेंशन सिर्फ 15,000 करोड़ पर अटकी हुई है।”

पेंशनभोगी संगठन लंबे समय से न्यूनतम पेंशन 5,000-7,000 रुपये करने, महंगाई से जुड़ी राहत देने और फंड के बेहतर उपयोग की मांग कर रहे हैं। सरकार का कहना है कि वह फंड की स्थिरता और भविष्य की देनदारियों को ध्यान में रखकर, EPF, EPS और EDLI योजनाओं के माध्यम से मजबूत सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।