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फैमिली कोर्ट ने कहा- Inter Caste Marriage के बाद पत्नी हो जाती है पति की जाति में समाहित; पटना हाईकोर्ट की फटकार- "यह कानून की सबसे विकृत व्याख्या!"

पटना- बेगूसराय के एक इंटर-कास्ट लव मैरिज मामले में पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला दिया। यादव समुदाय के मनोज कुमार उर्फ मुन्ना और दलित समुदाय से पत्नी नीता भारती के बीच 2007 में स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत हुई शादी को फैमिली कोर्ट ने 'वॉयड एब इनीशियो' (शुरू से ही अमान्य) करार दिया था, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे पलट दिया और 'फ्रस्ट्रेशन ऑफ मैरिज' (विवाह की निराशा) के सिद्धांत को लागू करते हुए शादी को भंग कर दिया।

कोर्ट ने नीता भारती के आरोपों पर गौर किया कि शादी के बाद पति और उनके परिवार वालों ने उन्हें सार्वजनिक रूप से उनकी जाति का नाम लेकर गाली-गलौज दी और अपमानित किया। नीता ने दावा किया कि वे अनुसूचित जाति की सदस्य हैं, जबकि मनोज यादव समुदाय से हैं। शादी के महज 4-5 दिनों बाद ही उन्हें मारपीट कर घर से निकाल दिया गया। साथ ही दहेज की मांग (5 लाख रुपये नकद और बेगूसराय में जमीन) भी की गई। नीता ने बताया कि उन्होंने एमबीबीएस की प्रवेश परीक्षा पास कर ली थी और 2013 में वर्धा के महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई कर रही थीं। इस दौरान उनके पति मनोज कुमार कई बार उनसे मिलने आए और उन्हें प्रताड़ित भी किया।

20 फरवरी 2013 को एक गंभीर घटना घटी। नीता के अनुसार, जब उन्होंने 25,000 रुपये देने से इनकार कर दिया, तो पति ने उनका गला घोंटकर हत्या करने का प्रयास किया। पुलिस को इसकी सूचना दी गई, लेकिन पति-पत्नी के झगड़े का मामला होने के कारण पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।

25 फरवरी 2013 को नीता अपने पैतृक घर बघी, बेगूसराय लौट आईं। परिवार ने 18 मार्च 2013 को पंचायत बुलाई, जिसमें पति और उसके माता-पिता भी शामिल हुए। पंचायत में भी दहेज की मांग दोहराई गई और जाति के आधार पर अपमान किया गया। इसके बाद पुलिस में मामला दर्ज कराया गया।

फैमिली कोर्ट, बेगूसराय ने 28 फरवरी 2018 को तलाक की याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 12 का पूर्ण अनुपालन नहीं हुआ, इसलिए शादी कानूनी रूप से पूरी नहीं हुई और तलाक का सवाल ही नहीं उठता। फैमिली कोर्ट ने कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां भी कीं, जिसमें कहा गया कि शादी के बाद पत्नी पति की जाति में समा जाती है, इसलिए नीता पासवान दलित से यादव बन गईं और उन्होंने एससी कोटे से एमबीबीएस डिग्री हासिल की, जो फ्रॉड है। कोर्ट ने डिग्री रद्द करने और स्टाइपेंड लौटाने की भी बात कही।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट के जस्टिस चंद्र शेखर झा और जस्टिस बिबेक चौधरी की डिवीजन बेंच ने फैमिली कोर्ट के फैसले को पूरी तरह गलत और पेरवर्स करार दिया। जस्टिस चंद्रशेखर झा ने फैसले में कहा, "हमने कभी ऐसी गलत कानूनी व्याख्या नहीं देखी जैसी हम इस मामले में देख रहे हैं।"

बेंच ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 13(2) के तहत मैरिज सर्टिफिकेट ही शादी के वैध होने का कनक्लूसिव एविडेंस है। दोनों पक्षों ने शादी को स्वीकार किया था और सर्टिफिकेट जारी हुआ था, जिसमें तीन गवाहों (विनोद कुमार, संजीत कुमार और राजेश कुमार) के हस्ताक्षर थे। कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने कानून की गलत व्याख्या की।

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की उन टिप्पणियों को, जो जाति और आरक्षण से जुड़ी थीं, "पूरी तरह से अवांछित और निराधार" बताते हुए रिकॉर्ड से हटाने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसी टिप्पणियां न्यायाधीश के व्यक्तिगत अनुभव और राय पर आधारित लगती हैं, जिसका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं था।

हाईकोर्ट ने जाति संबंधी अपमान और क्रूरता के आरोपों को भी दर्ज किया, लेकिन मुख्य रूप से लंबे समय तक अलगाव, पत्नी का 2021 में दूसरी शादी और एक साल के बच्चे के जन्म को देखते हुए शादी भंग करने का फैसला लिया। बेंच ने 'डॉक्ट्रिन ऑफ फ्रस्ट्रेशन' लागू किया, जिसमें कहा गया कि स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी एक सिविल कॉन्ट्रैक्ट की तरह है और जब वैवाहिक संबंध पूरी तरह असंभव हो जाए तो उसे भंग किया जा सकता है। जस्टिस झा ने लिखा कि दोनों पक्ष अब अलग-अलग जीवन जी रहे हैं, पत्नी की नई शादी और बच्चा हो चुका है, इसलिए पुरानी शादी को कायम रखना अन्याय होगा।

जस्टिस बिबेक चौधरी ने अलग से लिखा कि लंबे समय (2007 से 2026 तक) तक अलग रहना, कोई संतान न होना (पहली शादी से) और आपसी विश्वास का पूरी तरह खत्म होना क्रूरता का रूप है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के समर घोष बनाम जया घोष मामले का हवाला देते हुए कहा कि मानसिक क्रूरता का कॉन्सेप्ट समय के साथ बदलता है और लंबा अलगाव भी क्रूरता माना जा सकता है। बेंच ने लिखा, "यह विवाह भले ही कानूनी रूप से संपन्न हुआ था, लेकिन बाद की घटनाओं ने इसे जारी रखना असंभव बना दिया है। कानूनी बंधन अब सिर्फ एक खोल मात्र रह गया है, जिसमें कोई सार, उद्देश्य या व्यावहारिकता नहीं बची है। लोगों को ऐसे रिश्ते में बांधे रखना न्याय के खिलाफ होगा।"

यह फैसला कई मायनों में अहम है। पहला, इसने यह स्पष्ट कर दिया कि फैमिली कोर्ट जाति और आरक्षण जैसे संवेदनशील मामलों में बिना किसी ठोस आधार के टिप्पणी नहीं कर सकता। दूसरा, इसने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत होने वाले विवाहों की वैधता को मजबूती प्रदान की है। तीसरा, इसने उन मामलों में 'हताशा' के सिद्धांत का मार्ग प्रशस्त किया है, जहां वैवाहिक संबंधों की कोई संभावना नहीं बचती।

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस दृष्टिकोण को भी खारिज कर दिया, जिसमें उसने विवाह को 'शून्य' घोषित करते हुए तलाक की याचिका पर विचार करने से ही इनकार कर दिया था।

हाईकोर्ट ने मनोज कुमार और नीता भारती के बीच विवाह को समाप्त करने का आदेश दिया। साथ ही, दोनों पक्षों को अपना-अपना खर्च वहन करने का निर्देश दिया गया। फैमिली कोर्ट की विवादित टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाने का आदेश भी दिया गया है।

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