नई दिल्ली- कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के बाद केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वह देश के युवाओं के साथ विश्वासघात करने की कोशिश कर रही है। दास ने कहा कि अदालत ने बार-बार छात्रों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर की सूची मांगी ताकि आर्टिकल 142 के तहत उन्हें एक साथ रद्द किया जा सके, लेकिन सरकार के वकील ने न तो सूची देने का वादा किया और न ही सहयोग का रुख अपनाया।
सौरव दास ने बयान में कहा, “भारत सरकार इस देश के युवाओं के साथ विश्वासघात करने की कोशिश कर रही है। आज की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने अपना इरादा बहुत साफ कर दिया। अदालत ने केंद्र सरकार से पूरे देश में छात्रों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर की सूची मांगी ताकि आर्टिकल 142 की शक्तियों का इस्तेमाल कर सभी को एक साथ रद्द कर सके। अदालत ने यह जानकारी एक बार नहीं, दो बार नहीं, तीन बार मांगी। फिर भी केंद्र सरकार के वकील ने ऐसी सूची देने का कोई वादा नहीं किया और बल्कि सक्रिय रूप से इसका विरोध किया। क्यों?”
दास ने याद दिलाया कि 25 जुलाई को सीजेपी ने अच्छी नीयत से अपना राष्ट्रव्यापी आंदोलन वापस लिया था, जब केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय प्रेस कॉन्फ्रेंस में दो केंद्रीय मंत्रियों के साथ एफआईआर वापस लेने, प्रदर्शनकारियों को सजा से बचाने और प्रभावित परिवारों को मुआवजा देने के गंभीर आश्वासन दिए थे। दास ने कहा कि आज सुप्रीम कोर्ट ने खुद उन आश्वासनों को लागू करने का स्पष्ट रास्ता दिखाया। एफआईआर की समेकित सूची देने से केंद्र और भाजपा/एनडीए शासित राज्यों के लिए 25 जुलाई के आश्वासनों को पूरा करना आसान हो जाता। लेकिन सरकार विरोध कर रही है।
#URGENTSTATEMENT
— Saurav Das (@SauravDassss) August 18, 2026
The Government of India is trying to betray the youth of this nation.
During today’s hearing, the Supreme Court made its intention very clear: it sought a list of FIRs registered against students and protesters across the country from the Union Government so… pic.twitter.com/o5Pr7Tp9Dr
उन्होंने आगे कहा कि अदालत ने सरकार को विकल्प भी दिया कि अगर किसी कठोर अपराधी या जघन्य अपराधों के इतिहास वाले लोगों के खिलाफ एफआईआर हैं जिन्हें प्रदर्शनों के दौरान हिंसा का आरोप है, तो सरकार उन्हें अलग से चिन्हित कर सकती है ताकि उन मामलों को उनके गुण-दोष के आधार पर देखा जा सके। दास ने सवाल उठाया कि क्या सरकार ने कभी अपना वचन निभाने का इरादा रखा था या 25 जुलाई के आश्वासन सिर्फ शांतिपूर्ण आंदोलन को खत्म करने के लिए दिए गए थे।
दास ने चेतावनी दी, “हम सरकार को भारत के छात्रों, जेन-जेड और युवा नागरिकों के विश्वास के साथ खेलने की अनुमति नहीं देंगे। सीजेपी ने धैर्य रखा है। हमने अच्छी नीयत से बातचीत की। हमने अच्छी नीयत से आंदोलन वापस लिया। और हमने सरकार को अच्छी नीयत से अपने वादे पूरे करने का पर्याप्त मौका दिया। अब वह धैर्य खत्म हो रहा है। इसलिए अब हम सरकार को चेतावनी देते हैं। अगर सरकार तुरंत 25 जुलाई के आश्वासनों को सम्मान देने की ठोस कदम नहीं दिखाती, तो कॉकरोच जनता पार्टी अगले दो दिनों के अंदर अपनी नेशनल वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाकर राष्ट्रव्यापी कार्रवाई का अगला रास्ता तय करेगी। हम उम्मीद करते हैं कि सरकार इस क्षण की गंभीरता समझे। संयम को समर्पण न समझें। अच्छी नीयत को कमजोरी न समझें। और पूरी पीढ़ी के विश्वास के साथ न खेलें। सीजेपी आगे क्या करेगी, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत सरकार अब क्या चुनती है।”
सुप्रीम कोर्ट गठित करेगी हाई-पावर्ड कमेटी
सुप्रीम कोर्ट की पीठ जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जयमल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे, ने मंगलवार को सीजेपी के जुलाई 20 संसद मार्च और अन्य प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित ज्यादतियों की जांच के लिए एक हाई-पावर्ड कमेटी गठित करने की बात कही। पीठ ने कहा कि कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज, हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस, पूर्व सीबीआई डायरेक्टर और डीजीपी स्तर के रिटायर्ड अधिकारी शामिल होंगे। अदालत ने सभी पक्षों से शाम तक सुझाव मांगे और कहा कि बुधवार को कमेटी गठन का औपचारिक आदेश जारी किया जाएगा।
अदालत ने निर्देश दिया कि 20 जुलाई के प्रदर्शन के वीडियो फुटेज और सीसीटीवी रिकॉर्डिंग्स कमेटी को सौंपे जाएंगे। कमेटी महिला प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाए जाने के आरोपों की भी जांच करेगी। सुप्रीम कोर्ट कमेटी को जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर सुविधाएं मुहैया कराएगा। कमेटी हर पीड़ित की बात सुनेगी और उन्हें अपनी बात रखने का मौका देगी। समय-समय पर सिफारिशें आने पर अदालत जरूरी कानूनी कार्रवाई करेगी।
एफआईआर के मुद्दे पर पीठ ने संकेत दिया कि वह आर्टिकल 142 का इस्तेमाल कर सिर्फ छात्रों वाले मामलों को रद्द करने पर विचार कर सकती है, जबकि जघन्य अपराधों (हत्या, बलात्कार, अपहरण, पॉक्सो आदि) वाले मामलों को अलग रखा जाएगा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि करीब 2,873 लोगों की पहचान हुई है जिनके पुराने आपराधिक रिकॉर्ड हैं। इनमें से कई इतिहास-शीटर हैं। छात्रों वाले मामलों को रद्द करने पर कोई आपत्ति नहीं, लेकिन गंभीर अपराधियों के मामलों की जांच होनी चाहिए।
दिल्ली पुलिस बोली - अधिकतम संयम रखा
दिल्ली पुलिस ने अपने हलफनामे में कहा कि उसके जवानों ने “अधिकतम संयम लेकिन न्यूनतम आवश्यक बल” का इस्तेमाल किया। न्यू दिल्ली डिस्ट्रिक्ट के डीसीपी सचिन शर्मा के हलफनामे में दावा किया गया कि भीड़ हिंसक हो गई और संसद की ओर बढ़ने के लिए कई परतों वाली बैरिकेडिंग तोड़ दी। पुलिस के अनुसार करीब 30,000 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ लगभग 5,000 जवान तैनात थे। 240 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए जबकि करीब 200 प्रदर्शनकारियों/जनता के सदस्यों का मेडिको-लीगल परीक्षण हुआ।
पुलिस ने नाखून वाले लाठी के आरोप को खारिज करते हुए कहा कि वह सिर्फ एक वीडियो है और वस्तु असल में झंडे वाला डंडा था जो संभवतः किसी प्रदर्शनकारी का था। फेशियल रिकग्निशन सिस्टम के बारे में कहा गया कि यह शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की प्रोफाइल नहीं बनाता, सिर्फ पुराने आपराधिक रिकॉर्ड वालों को फ्लैग करता है। 20 से 26 जुलाई के बीच 2,873 ऐसे लोगों की पहचान हुई। पुलिस ने यह भी बताया कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए छह दिनों में 4,600 से ज्यादा महिला पुलिसकर्मी तैनात किए गए।
सीजेपी ने सरकार से तुरंत ठोस कदम उठाने की मांग की है। अब देखना यह है कि सरकार 25 जुलाई के आश्वासनों को लेकर क्या रुख अपनाती है।
क्या है पूरा मामला
यह मामला NEET-UG और CBSE परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ़ 6 जून को जंतर-मंतर पर शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ा है। प्रदर्शनकारियों ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग की थी। 20 जुलाई को, CJP द्वारा आयोजित संसद मार्च में हज़ारों छात्रों ने हिस्सा लिया। जब भीड़ के कुछ हिस्सों ने बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की, तो झड़पें हुईं। लाठीचार्ज, आंसू गैस और अन्य तरीकों के ज़रिए ज़रूरत से ज़्यादा बल प्रयोग करने, साथ ही प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों के घायल होने के आरोप में कई याचिकाएं दायर की गईं। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 28 जुलाई को बिना आपराधिक रिकॉर्ड वाले हिरासत में लिए गए नाबालिगों को रिहा करने, प्रदर्शनकारी छात्रों (जिनका आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है) के खिलाफ़ ज़बरदस्ती कार्रवाई न करने, CCTV और संबंधित सामग्री को सुरक्षित रखने का आदेश दिया था और एक स्वतंत्र जांच की संभावना का संकेत भी दिया था।
पक्षों से सुझाव मिलने के बाद, हाई-पावर्ड कमेटी की औपचारिक घोषणा के लिए इस मामले पर बुधवार को आगे सुनवाई होगी।