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मॉब लिंचिंग पर खामोश सिस्टम की पोल खोलती किताब 'अख़लाक़', जानिए क्यों यह लेखक की ख़ास पड़ताल?

देश में बढ़ती मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर मुख्यधारा का मीडिया अक्सर चुप्पी साधे रहता है। इसी खामोशी को तोड़ते हुए पूर्व टीवी चैनल पत्रकार और लेखक दयाशंकर मिश्र ने 'अख़लाक़' नाम से एक बेहद साहसिक किताब लिखी है। महाराष्ट्र, ओडिशा, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों की ज़मीनी पड़ताल पर आधारित यह किताब महज़ आंकड़ों का संकलन नहीं है। यह उन तमाम समुदायों की यातना, पीड़ा और उनके आंसुओं का जीवंत दस्तावेज़ है, जिन्हें नफरत की भेंट चढ़ा दिया गया।

द मूकनायक के साथ एक विशेष बातचीत में दयाशंकर मिश्र ने इसे किताब की शक्ल में आने और इसके पीछे के कड़े संघर्षों को साझा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि मॉब लिंचिंग असल में हमारे संविधान की सबसे बड़ी अवहेलना है। यह केवल किसी अचानक उग्र हुई भीड़ का कृत्य नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी साजिश और संगठित अपराध है। यह नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर देश में तानाशाही थोपने की एक खतरनाक चेष्टा है, जिसमें सिस्टम महज़ एक मूकदर्शक नहीं, बल्कि मददगार बना हुआ है।

वह बताते हैं कि इस किताब को पाठकों तक पहुँचाने का सफर कतई आसान नहीं रहा। जब मिश्र ने अपनी इस ग्राउंड रिपोर्ट को देश के नामी प्रकाशकों के सामने रखा, तो उन्हें केवल निराशा और टालमटोल का ही सामना करना पड़ा। प्रकाशकों की इस अरुचि और डर को देखते हुए, अंततः उन्होंने इसे स्वयं प्रकाशित करने का जोखिम उठाया।

इससे पूर्व की उनकी पहली किताब के प्रकाशन के अनुभव को याद करते हुए वह कहते हैं, "यह समझना मुश्किल नहीं है कि मौजूदा दौर में सच लिखना और उसे छपवाना कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है। जब बड़े संस्थान 'बिगाड़ के डर से ईमान की बात' करना बंद कर दें, तब स्वतंत्र पत्रकारों और लेखकों का दायित्व कई गुना बढ़ जाता है।"

किताब का शीर्षक 'अख़लाक़' रखे जाने के पीछे एक बेहद मजबूत और विचलित करने वाला कारण उन्होंने बताया। वह बताते हैं कि, वर्ष 2015 में दादरी में हुई मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या के बाद से देश में लिंचिंग का एक ऐसा खौफनाक दौर शुरू हुआ जिसे समाज ने धीरे-धीरे सामान्य मान लिया।

वह समझाते हैं कि, अक्सर यह माना जाता है कि मॉब लिंचिंग का शिकार केवल अल्पसंख्यक समुदाय हो रहा है, लेकिन यह किताब इस भ्रांति को भी तोड़ती है। इसमें मुसलमानों और ईसाइयों के साथ-साथ दलितों और आदिवासियों पर हो रहे हमलों की विस्तृत रिपोर्टिंग शामिल है। गुजरात के ऊना कांड से लेकर अमरेली में महेश और नीलेश राठौर की हत्या तक, यह किताब दलितों के उत्पीड़न को पूरी बेबाकी से बेनकाब करती है।

हिंसा की यह आग कभी किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहती। इसके बारे में वह मशहूर शायर राहत इंदौरी का शेर याद करते हुए कहते हैं कि, "लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द में..." इस संदर्भ में बिल्कुल सटीक बैठता है।

किताब में बुलंदशहर में लिंचिंग का शिकार हुए अपर कास्ट के इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह और हरियाणा में मारे गए आर्यन मिश्रा का भी प्रमुखता से जिक्र है। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि नफरत की यह आग जब फैलती है, तो बहुसंख्यक और कथित उच्च जातियां भी इससे अछूती नहीं रह पातीं।

उन्होंने बताया कि, मुख्यधारा की मीडिया की आपराधिक चुप्पी और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विफलता इस किताब के प्रमुख विषय हैं। किताब के अंतिम हिस्से यानी उपसंहार में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका का गहराई से विश्लेषण किया गया है। वर्ष 2018 में लिंचिंग रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए ऐतिहासिक कदमों का हवाला देते हुए किताब बताती है कि कैसे ज़मीनी स्तर पर संस्थाएं अपना दायित्व निभाने में पूरी तरह विफल रही हैं।

Dayashankar Mishra Book Akhlak
दयाशंकर मिश्र की किताब "अख़लाक़" अब अमेजन पर उपलब्ध है.

दयाशंकर मिश्र अपनी इस किताब पर मुंशी प्रेमचंद की उस अमर पंक्ति को याद करते हैं कि 'क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न करोगे?' उन्होंने बताया कि, तमाम पाबंदियों और चुनौतियों के बीच अब यह किताब अमेज़न पर पाठकों के लिए उपलब्ध हो चुकी है। यह केवल एक किताब नहीं है, बल्कि देश के हर उस नागरिक के लिए एक सख्त चेतावनी है, जो इस संगठित घृणा को चुपचाप अपनी आंखों के सामने घटित होते देख रहा है।

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