वर्धा विश्वविद्यालय में संवाद की जगह पुलिसिया दमन: 45 दिन से जारी सत्याग्रह के बीच 6 छात्रों पर आधी रात को FIR

12:36 PM Aug 22, 2026 | The Mooknayak

नई दिल्ली: वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में पिछले 45 दिनों से चल रहा छात्र आंदोलन अब एक नए और गंभीर मोड़ पर पहुँच गया है। अपनी जायज शैक्षणिक मांगों को लेकर शांतिपूर्ण सत्याग्रह कर रहे प्रगतिशील छात्रों के खिलाफ विश्वविद्यालय प्रशासन ने पुलिसिया कार्रवाई का सहारा लिया है। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF) ने आरोप लगाया है कि प्रशासन संवाद के बजाय निलंबन, निष्कासन और एफआईआर (FIR) के जरिये छात्रों की लोकतांत्रिक आवाज को कुचलने का प्रयास कर रहा है।

विवाद तब और गहरा गया जब 20 अगस्त को छात्र अपनी मांगों पर खुले संवाद के लिए कुलपति के पास प्रशासनिक भवन पहुंचे। इसी दौरान छात्र राकेश अहिरवार कुलपति की कार की चपेट में आकर घायल हो गए, जिसके बाद AISF ने इस घटना की निष्पक्ष जांच की मांग की है। इसके ठीक बाद, 21 अगस्त की रात लगभग 1 बजे रामनगर थाने में छह छात्रों के खिलाफ नामजद FIR दर्ज करा दी गई। इन छात्रों में AISF के संयुक्त सचिव राहुल कुमार (ठाकुर), राजेश सारथी, निरंजन ओबेरॉय, राकेश अहिरवार, शिवपूजन पासी और रामचंद्र शामिल हैं।

बुनियादी शैक्षणिक सुधारों की है मांग

छात्रों का यह संघर्ष किसी व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि पूरी तरह से विश्वविद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था और विद्यार्थियों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए है। आंदोलनकारी मुख्य रूप से 2026-27 सत्र से स्त्री अध्ययन और सिनेमा अध्ययन विभाग को वर्धा के मुख्य परिसर में फिर से शुरू करने, 2022 की लंबित पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया को तत्काल पूरा करने और नई पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया शुरू करने की मांग कर रहे हैं।

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इसके साथ ही, बंद हो चुके डिप्लोमा कार्यक्रमों की बहाली, मेस में गुणवत्तापूर्ण भोजन, शिक्षकों की भारी कमी दूर करने, लाइब्रेरी में पर्याप्त शोध-पत्रिकाएं व पुस्तकें उपलब्ध कराने और रिसर्च लैब के बंद पड़े कंप्यूटरों को चालू करने जैसी बुनियादी जरूरतें भी उनकी मांगों में प्रमुखता से शामिल हैं।

बंद दरवाजों के बाद शुरू हुआ सत्याग्रह

AISF के अनुसार, आंदोलन पर बैठने से पहले हर संभव लोकतांत्रिक रास्ता अपनाया गया था। 3 जुलाई 2026 को लगभग 250 विद्यार्थियों और शोधार्थियों के हस्ताक्षर वाला सामूहिक आवेदन कुलपति को सौंपा गया था। जब संवाद के सभी प्रशासनिक रास्ते बंद कर दिए गए और 8 जुलाई को प्रशासनिक भवन के दरवाजे छात्रों के लिए बंद कर दिए गए, तब छात्रों ने गांधीवादी परंपरा में शांतिपूर्ण सत्याग्रह का मार्ग चुना।

2022 की पीएचडी प्रक्रिया और प्रशासनिक अस्थिरता पर उठे सवाल

विश्वविद्यालय में 2022 में पीएचडी प्रवेश के लिए लिखित परीक्षा और कई विभागों में साक्षात्कार हो चुके थे, लेकिन 'अपरिहार्य कारणों' का हवाला देकर इसे रोक दिया गया। आज तक हजारों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ी इस प्रक्रिया पर प्रशासन ने चुप्पी साधी हुई है। AISF ने सवाल उठाया है कि मार्च 2025 से अब तक हुई कार्यकारी और शैक्षणिक परिषद की बैठकों में इस पर कोई निर्णय क्यों नहीं लिया गया।

इसके अतिरिक्त, AISF ने पिछले कुछ वर्षों में विश्वविद्यालय में आई प्रशासनिक अस्थिरता और राजनीतिक हस्तक्षेप पर भी कड़ा प्रहार किया है। संगठन का कहना है कि 2023 से लगातार कार्यवाहक कुलपतियों (रजनीश कुमार शुक्ल के बाद भीमराय मैत्री) और 2025 में नियुक्त हुईं नई स्थायी कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा के कार्यकाल तक, अकादमिक स्वायत्तता बुरी तरह प्रभावित हुई है। नियुक्तियों और प्रशासनिक ढांचे में RSS के वैचारिक व राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी संगठन ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं तथा नियुक्तियों में पूर्ण पारदर्शिता की मांग की है।

दमन के खिलाफ आंदोलन तेज करने की चेतावनी

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में छात्रों के खिलाफ दमनकारी कार्रवाई कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी नारे लगाने के आरोप में 10 छात्रों पर निष्कासन और निलंबन की गाज गिर चुकी है। AISF ने दोटूक शब्दों में पूछा है कि क्या गांधी के नाम पर बने इस विश्वविद्यालय में अपने शैक्षणिक भविष्य के लिए सवाल पूछना और सत्याग्रह करना अपराध है?

संगठन ने साफ कर दिया है कि जब तक छहों छात्रों पर दर्ज FIR तत्काल वापस नहीं ली जाती और उनकी सभी शैक्षणिक मांगें पूरी कर संवाद का रास्ता नहीं खोला जाता, तब तक प्रशासन के हर दमन के खिलाफ यह सत्याग्रह और भी मजबूती के साथ जारी रहेगा।