नई दिल्ली: 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव परिणामों ने राज्य की राजनीति में एक बड़ी हलचल पैदा कर दी है। द्रमुक (DMK) की हार और टीवीके (TVK) के तेजी से उभार ने कई चर्चाओं को जन्म दिया है। हालांकि इस हार के पीछे सत्ता विरोधी लहर और राजनीतिक रणनीतियों को जिम्मेदार माना जा रहा है, लेकिन दलितों के खिलाफ जारी हिंसा और उस पर सरकार के ढुलमुल रवैये ने भी एक गंभीर संकट की ओर इशारा किया है।
द्रमुक लंबे समय से तमिलनाडु को सामाजिक न्याय के शासन का मॉडल बताती रही है। लेकिन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स (NCDHR) के आंकड़े एक अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। इन रिपोर्टों का गहराई से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि राज्य में दलितों और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों में 67 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई है। गौर करने वाली बात यह है कि इस अवधि के दौरान अन्नाद्रमुक और द्रमुक, दोनों ही सत्ता में रहे हैं।
एनसीडीएचआर की रिपोर्ट 'फाइव इयर्स ऑफ कास्ट-बेस्ड एट्रोसिटी' के अनुसार, 2019 से 2023 के बीच तमिलनाडु में दलितों के खिलाफ अपराधों में 67.9 प्रतिशत का इजाफा हुआ, जो पूरे देश में सबसे अधिक है। इसके बाद मध्य प्रदेश 55.3 प्रतिशत और ओडिशा 42.9 प्रतिशत के साथ दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि राज्य में सामाजिक न्याय की भाषा और दलितों के वास्तविक जीवन के बीच एक बड़ी खाई है।
एनसीआरबी 2023 के आंकड़े और भी डरावनी तस्वीर पेश करते हैं। दलितों की हत्या के मामलों में 40.4 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है, जो 2019 में 52 थे और 2023 में बढ़कर 73 हो गए। गंभीर चोट पहुंचाने के मामले 240 प्रतिशत बढ़ गए हैं, जबकि आपराधिक धमकी के मामलों में 584.8 प्रतिशत का चौंकाने वाला उछाल आया है। यह आंकड़े साबित करते हैं कि जब भी दलित अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं, तो जातिगत व्यवस्था हिंसा के जरिए उन्हें दबाने की कोशिश करती है।
दलित महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ होने वाले अपराधों में भी चिंताजनक बढ़ोतरी हुई है। बलात्कार के कुल मामले 2019 में 97 थे, जो 2023 में बढ़कर 132 हो गए, यानी 36.1 प्रतिशत की वृद्धि। विशेष रूप से दलित बच्चियों के साथ होने वाली दरिंदगी में 73.2 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। यह केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं हैं, बल्कि अक्सर बलात्कार को जातिगत दमन के एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से किए गए हमलों में भी 289.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
न्याय प्रणाली की विफलता भी इस स्थिति को और गंभीर बना रही है। 2023 में दलित अत्याचार के मामलों में सजा की दर महज 12.2 प्रतिशत थी, जबकि बरी होने की दर 87.8 प्रतिशत के ऊंचे स्तर पर रही। लंबित मामलों की दर भी 87.7 प्रतिशत है, जिसका मुख्य कारण विशेष अदालतों की कमी है। तमिलनाडु में त्वरित सुनवाई के लिए केवल 20 विशेष अदालतें मौजूद हैं, जो मामलों के बोझ के हिसाब से बेहद कम हैं।
कानून के अनुसार, राज्य स्तरीय सतर्कता और निगरानी समिति की बैठक साल में दो बार होनी चाहिए, जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री करते हैं। लेकिन तमिलनाडु में 2021 से इन बैठकों की अनदेखी की जा रही है। 2021, 2022 और 2023 में केवल एक-एक बैठक हुई, जबकि 2024 में एक भी बैठक आयोजित नहीं की गई। यह प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि हाशिए पर खड़े समाज के प्रति सरकार की प्राथमिकताओं और रवैये को दर्शाता है।
पुलिस हिरासत में होने वाली हिंसा के मामले में भी दलितों को निशाना बनाया जा रहा है। 2021 के जेल सांख्यिकी आंकड़ों के अनुसार, राज्य में हिरासत में लिए गए लोगों में 37 प्रतिशत दलित थे। तमिलनाडु अकेले भारत के कुल अनुसूचित जाति के बंदियों का 84.5 प्रतिशत हिस्सा रखता है। 2023 तक यह संख्या बढ़कर 42.2 प्रतिशत हो गई, जबकि राज्य की कुल आबादी में दलितों की हिस्सेदारी केवल 20 प्रतिशत के करीब है।
द्रमुक की चुनावी हार कहीं न कहीं सामाजिक न्याय के खोखले नारों और दलितों की असुरक्षा के बीच बढ़ते असंतोष का परिणाम है। दूसरी ओर, टीवीके का उदय सिनेमाई प्रभाव और युवाओं के बीच एक विकल्प की तलाश का नतीजा है। हालांकि, केवल सेलिब्रिटी कल्चर या सत्ता विरोधी लहर से हाशिए के समुदायों को न्याय नहीं मिल सकता।
हाल ही में दलित टेक पेशेवर कविन सेल्वागणेश की 'ऑनर किलिंग' जैसे मुद्दों पर टीवीके की चुप्पी ने भी सवाल खड़े किए हैं। भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या नई राजनीतिक शक्तियां केवल प्रतीकात्मक राजनीति करेंगी या फिर एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम को कड़ाई से लागू कर पीड़ितों को वास्तविक सुरक्षा और न्याय दिलाने का काम करेंगी।