नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच यानी नफरत भरे भाषणों से जुड़े कई याचिकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि देश में पहले से मौजूद कानून इस समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त हैं और नए आपराधिक कानून बनाना अदालत का नहीं, बल्कि संसद का काम है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की दो सदस्यीय पीठ ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि संविधान में शक्तियों के बंटवारे का जो सिद्धांत है, उसके तहत न्यायपालिका को यह अधिकार नहीं है कि वह नए अपराध परिभाषित करे या किसी अपराध की सजा तय करे। यह काम पूरी तरह से विधायिका यानी संसद और राज्य विधानसभाओं के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने यह भी कहा कि वह संसद को कोई विशेष कानून बनाने का आदेश नहीं दे सकती, लेकिन जरूरत पड़ने पर सुधार की दिशा में ध्यान जरूर दिला सकती है।
इस फैसले का एक सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य मामले (SLP Criminal No. 5107/2023) में दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि सांसदों या मंत्रियों के खिलाफ FIR दर्ज करने से पहले सरकार से ‘पूर्व अनुमति’ (Prior Sanction) लेना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि अपराध दर्ज करना और जांच करना ‘संज्ञान’ (Cognizance) लेने की प्रक्रिया में नहीं आता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 196 और 197 (सरकारी कर्मचारियों को संरक्षण) के तहत ‘संज्ञान’ से पूर्व अनुमति जरूरी है, लेकिन FIR दर्ज करने (Section 154) और जांच कराने (Section 156(3)) के लिए नहीं। हालांकि, उक्त विशेष मामले में (पूर्व केंद्रीय मंत्री और एक सांसद के खिलाफ) कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि दिए गए भाषण किसी विशिष्ट समुदाय के खिलाफ नहीं थे और न ही उनमें हिंसा भड़काने की बात थी, इसलिए FIR दर्ज करने की आवश्यकता नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट ने ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के अपने पुराने फैसले को दोहराते हुए कहा कि जब भी किसी संज्ञेय अपराध की जानकारी पुलिस को मिले, तो FIR दर्ज करना उसकी अनिवार्य जिम्मेदारी है, इसमें पुलिस को कोई विवेकाधिकार नहीं है। अगर पुलिस FIR दर्ज नहीं करती, तो शिकायतकर्ता के पास कानून में कई उपाय मौजूद हैं। पहले वह पुलिस अधीक्षक से संपर्क कर सकता है, फिर मजिस्ट्रेट के पास धारा 156(3) CrPC के तहत जा सकता है और इसके बाद धारा 200 CrPC के अंतर्गत निजी शिकायत भी दर्ज कर सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि जब तक ये सभी वैधानिक उपाय उपलब्ध हों, तब तक सीधे संवैधानिक अदालतों में आना उचित नहीं है।
कोर्ट ने ‘कंटीन्यूइंग मैंडमस’ (Continuing Mandamus) जारी करने से इनकार कर दिया, यानी वह लगातार निगरानी नहीं करेगा कि हर जगह केस दर्ज हो रहे हैं या नहीं, क्योंकि इसे ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ कहते हुए कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया।
प्रस्तावना में ‘बंधुत्व’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की अवधारणा पर गहन चर्चा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘हेट स्पीच’ सिर्फ कानूनी अपराध नहीं है, बल्कि यह हमारे संविधान के मूल तत्व ‘बंधुत्व’ पर हमला है। कोर्ट ने डॉ. भीमराव अंबेडकर के 25 नवंबर 1949 के संविधान सभा के संबोधन में उस चेतावनी को भी याद किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि "चाहे संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर उसे चलाने वाले लोग बुरे होंगे तो वह बुरा निकलेगा।" अंबेडकर का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि बंधुता का अर्थ है सभी भारतीयों में एक समान भाईचारे की भावना, जो किसी धर्म, जाति या समुदाय तक सीमित नहीं है। अदालत ने यजुर्वेद में निहित 'वसुधैव कुटुम्बकम्' यानी पूरा विश्व एक परिवार है, इस प्राचीन भावना को संविधान के बंधुता के सिद्धांत के साथ जोड़ा। अदालत ने कहा कि हेट स्पीच इस संवैधानिक मूल्य के बिल्कुल विपरीत है और यह गणराज्य की नैतिक नींव को कमजोर करती है। साथ ही अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 51A का हवाला देते हुए कहा कि हर नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य है कि वह धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय विभिन्नताओं से ऊपर उठकर सौहार्द और भाईचारे को बढ़ावा दे।
पीठ ने कहा कि यदि नागरिक ‘हम बनाम उन’ (Us vs Them) की मानसिकता से बाहर नहीं निकले तो संविधान का सपना अधूरा रह जाएगा।
अवमानना (कंटेम्प्ट) याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड, दिल्ली और महाराष्ट्र पुलिस को क्लीन चिट दी, जहां एफआईआर दर्ज की जा चुकी थीं। हालांकि, चार मामलों में कोर्ट ने राज्य सरकारों और पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी रखते हुए जवाब मांगा है, क्योंकि इनमें शिकायत के बावजूद FIR दर्ज नहीं की गई। कोर्ट ने सभी संबंधित याचिकाओं और नागरिक अपील को खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि हेट स्पीच और अफवाह फैलाने की समस्या सीधे तौर पर बंधुता, सम्मान और संवैधानिक व्यवस्था को प्रभावित करती है। इसलिए केंद्र सरकार और विधायी अधिकारी अपनी विवेकशीलता से यह तय कर सकते हैं कि क्या विधि आयोग की 23 मार्च 2017 की 267वीं रिपोर्ट में दी गई सिफारिशों के आधार पर कोई नया कानून या नीतिगत उपाय जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि इस फैसले की प्रति सभी उच्च न्यायालयों को भेजी जाए ताकि वे इस फैसले में घोषित कानून को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए जरूरी दिशा-निर्देश जारी कर सकें।