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तेलंगाना के सातवाहन विश्वविद्यालय में विवाद: दलित महिला प्रोफेसर और छात्र को 'अर्बन नक्सल' बताने पर भड़के शिक्षाविद्

नई दिल्ली: तेलंगाना के सातवाहन विश्वविद्यालय में एक गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। यहाँ की एक दलित महिला प्रोफेसर और एक दलित छात्र को कथित तौर पर 'अर्बन नक्सल' करार दिया गया है। इसके साथ ही उन्हें लगातार प्रताड़ना का भी सामना करना पड़ रहा है, जिसके बाद शिक्षाविदों और मानवाधिकार समूहों ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए तेलंगाना सेव एजुकेशन कमेटी ने तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। समिति ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह से निराधार बताया है। उनका स्पष्ट रूप से कहना है कि इस तरह की दुर्भावनापूर्ण घटनाओं से विश्वविद्यालय का शैक्षणिक माहौल बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

समिति ने अपने आधिकारिक बयान में बताया कि यह पूरी घटना एक सुनियोजित अभियान का हिस्सा प्रतीत होती है। इस अभियान के निशाने पर समाजशास्त्र विभाग की प्रमुख और आर्ट्स कॉलेज की प्रिंसिपल सुरेपल्ली सुजाता हैं। उनके साथ-साथ अर्थशास्त्र के एक छात्र कारिके महेश को भी जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कुछ छात्रों के एक समूह ने स्थानीय प्रशासन के समक्ष इसकी शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने सीधे जिला कलेक्टर और एक सांसद को अपना शिकायत पत्र सौंपा है। इसके अतिरिक्त, प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर भी यह दावा फैलाया जा रहा है कि इन दोनों का माओवादी समूहों से सीधा संबंध है।

समिति के वरिष्ठ सदस्यों ने इस पूरे घटनाक्रम की बेहद कड़े शब्दों में निंदा की है। के. चक्रधर राव, जी. हरगोपाल और के. लक्ष्मीनारायण ने इसे बदले की भावना से की गई एक निंदनीय कार्रवाई करार दिया है।

इन वरिष्ठ शिक्षाविदों का कहना है कि सभी आवश्यक शैक्षणिक योग्यताएं और अनुभव होने के बावजूद, अतिरिक्त प्रभार संभाल रही एक दलित महिला प्रोफेसर को हटाना पूरी तरह से दुर्भावनापूर्ण कदम है। उन्होंने चेतावनी दी है कि ऐसी कार्रवाइयां केवल किसी व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं रहती हैं। यह शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले हाशिए के समुदायों के बीच एक बहुत ही डराने वाला और परेशान करने वाला संदेश भेजती हैं।

समिति ने यह भी चिंता व्यक्त की है कि इस विवाद से विश्वविद्यालय का शांतिपूर्ण अकादमिक ढांचा खतरे में पड़ सकता है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह संस्थान मुख्य रूप से ग्रामीण, दलित और आदिवासी पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को उच्च शिक्षा प्रदान करता है।

इस पूरे प्रकरण पर कुलपति की लगातार चुप्पी को लेकर भी समिति ने तीखी आलोचना की है। शिक्षाविदों का कहना है कि कुलपति की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वे विश्वविद्यालय की स्वायत्तता की हर हाल में रक्षा करें। उन्हें परिसर के भीतर अकादमिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी को सुनिश्चित करना चाहिए।

शिक्षा प्रणाली की वर्तमान दिशा पर भी समिति ने अपनी व्यापक चिंताएं जाहिर की हैं। बयान में शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण, केंद्रीकरण और सांप्रदायीकरण जैसे गंभीर मुद्दों की ओर प्रशासन और सरकार का ध्यान आकर्षित किया गया है।

समिति ने कुलपति से इस मामले में तुरंत कड़े कदम उठाने की अपील की है। उनका मांग है कि इन निराधार आरोपों, मानसिक उत्पीड़न और प्रतिशोधपूर्ण कार्रवाइयों पर अविलंब रोक लगनी चाहिए, ताकि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और एक स्वस्थ शैक्षणिक माहौल को सुरक्षित रखा जा सके।

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