MP: जबलपुर में दलितों को अंतिम संस्कार से रोका, पुलिस की मौजूदगी में जलानी पड़ी चिता

05:00 PM Mar 31, 2025 | Ankit Pachauri

भोपाल। मध्य प्रदेश में जातिवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि मरने के बाद भी भेदभाव पीछा नहीं छोड़ता। जबलपुर से करीब 37 किलोमीटर दूर, पाटन तहसील के ग्राम पंचायत पौड़ी के चपोद टोले में एक बुजुर्ग के निधन के बाद अहिरवार समाज के लोग जब अंतिम संस्कार के लिए पहुंचे, तो गांव के कुछ मनबढ़ों ने उन्हें रोक दिया, कहा- “यह जमीन तुम्हारी नहीं है, यहां दाह संस्कार नहीं होगा!”—इन शब्दों ने जातिगत भेदभाव की भयावह सच्चाई को फिर उजागर कर दिया। विवश होकर पीड़ित परिवार को पुलिस की मदद लेनी पड़ी।

क्या है पूरा मामला?

चपोद गांव में मुक्तिधाम न होने के कारण वर्षों से ग्रामीण गांव के बाहर स्थित शासकीय भूमि पर अंतिम संस्कार करते आ रहे थे। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही थी, लेकिन बीते कुछ वर्षों में गांव के ही पटेल परिवार ने इस शासकीय भूमि पर कब्जा कर खेती करना शुरू कर दिया। शुरुआत में किसी ने इसका विरोध नहीं किया, लेकिन जब भी किसी का निधन होता और अंतिम संस्कार के लिए शव उस स्थान पर लाया जाता, तो पटेल परिवार के लोग आपत्ति जताने लगे।

25 मार्च को जब गांव के 70 वर्षीय बुजुर्ग शिवप्रसाद अहिरवार का निधन हुआ, तो उनके परिजन उसी स्थान पर अंतिम संस्कार करने पहुंचे। लेकिन, पटेल परिवार के लोगों ने यह कहते हुए दाह संस्कार करने से मना कर दिया कि वहां उनकी फसल खड़ी है, जिसे आग लगने का खतरा है।

अहिरवार समाज के लोगों ने इस घटना की जानकारी पाटन तहसीलदार और थाना प्रभारी को दी। थोड़ी देर बाद पुलिस मौके पर पहुंची और दोनों पक्षों के बीच तनाव को शांत करने का प्रयास किया। अंततः प्रशासन ने हस्तक्षेप करते हुए बुजुर्ग का अंतिम संस्कार उस स्थान से दूर करवा दिया।

घटना की गंभीरता को देखते हुए जब मामले की जानकारी कलेक्टर दीपक कुमार सक्सेना को दी गई, तो उन्होंने तुरंत एसडीएम और तहसीलदार को पटेल परिवार द्वारा कब्जाई गई शासकीय भूमि को मुक्त करवाने और वहां पर एक स्थायी मुक्तिधाम बनवाने के निर्देश दिए।

गांव के बुजुर्ग दौलत अहिरवार ने बताया कि वह पिछले 30 वर्षों से देख रहे हैं कि गांव के बाहर इस भूमि पर अंतिम संस्कार होता आ रहा है। लेकिन, बीते कुछ वर्षों में शिवकुमार पटेल, पप्पू पटेल और सुदेश पटेल के परिवारों ने धीरे-धीरे करीब पौन एकड़ जमीन पर कब्जा कर लिया और खेती करने लगे।

उन्होंने कहा, "कुछ माह पहले गांव के दो आदिवासी लड़कों की मौत हो गई थी। जब उनके परिजन शव लेकर आए, तो पटेल परिवार ने विवाद खड़ा कर दिया। आखिरकार, उन शवों का अंतिम संस्कार तालाब किनारे करना पड़ा। यह बहुत दुखद है कि आज भी हमारे गांव में एक मुक्तिधाम नहीं है।"

शासन की सख्ती, कब्जा हटाने के निर्देश

घटना की जानकारी मिलने के बाद कलेक्टर ने तहसीलदार और पटवारी को मौके पर जाकर भूमि का नाप करवाने और मुक्तिधाम निर्माण के लिए इस्टीमेट तैयार करवाने के निर्देश दिए।

तहसीलदार दिलीप हलवत ने बताया, "ग्राम चपोद में जिस स्थान पर अंतिम संस्कार को लेकर विवाद हुआ था, वह खसरा नंबर 100 पर स्थित शासकीय भूमि है। ग्रामीणों की मांग पर जल्द ही वहां पर एक स्थायी मुक्तिधाम का निर्माण किया जाएगा।"

घटना के विरोध में अनुसूचित जाति संगठनों के प्रतिनिधियों ने कलेक्टर से मुलाकात की और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। संगठनों ने प्रशासन से आग्रह किया कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए कठोर कदम उठाए जाएं।

कलेक्टर दीपक कुमार सक्सेना ने कहा, "ग्राम चपोद में जहां लोग वर्षों से अंतिम संस्कार करते आ रहे थे, वह भूमि शासकीय है। लेकिन कुछ वर्षों पहले उस पर कब्जा कर खेती शुरू कर दी गई थी। अब इस मामले को संज्ञान में लिया गया है। 25 मार्च को अंतिम संस्कार करवा दिया गया था, और अब तहसीलदार को भेजकर उस भूमि को कब्जामुक्त करवा दिया गया है। जल्द ही वहां पर मुक्तिधाम का निर्माण कराया जाएगा।"

क्या यह सिर्फ एक जमीन विवाद था?

इस पूरे प्रकरण को केवल एक भूमि विवाद कहकर टाला नहीं जा सकता। यह घटना उस सामाजिक अन्याय को भी उजागर करती है, जिससे निचली जातियों को अक्सर जूझना पड़ता है। जिस अधिकार को संविधान द्वारा सुनिश्चित किया गया है, उसे दबंगई के बल पर छीना जा रहा है।

द मूकनायक से बातचीत में मध्य प्रदेश राज्य अनुसूचित जाति आयोग के पूर्व सदस्य एवं एससी कांग्रेस के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने इस घटना को दलितों के संवैधानिक अधिकारों का खुला उल्लंघन बताया। उन्होंने कहा, "यह सिर्फ एक गांव की घटना नहीं है, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश में जातिवाद की जड़ों को दर्शाती है। संविधान ने हर नागरिक को बराबरी का हक दिया है, लेकिन आज भी दलितों को श्मशान तक इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाती। यह घटना दर्शाती है कि प्रशासनिक तंत्र और कानून का डर खत्म हो गया है, जिससे ऐसे जातिगत अपराध बढ़ रहे हैं।" उन्होंने सरकार से मांग की कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो और पीड़ित परिवार को न्याय मिले।