सिडनी/मेलबर्न – दलित इतिहास माह के दौरान ऑस्ट्रेलिया में जाति-दमन झेल रहे समुदायों के लिए एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की गई है। अम्बेडकराइट ग्लोबल फेडरेशन (एजीएफ) ने 'कास्ट डिस्क्रिमिनेशन रजिस्टर ऑस्ट्रेलिया' नामक एक सुरक्षित और समुदाय-केन्द्रित प्लेटफॉर्म लॉन्च किया है। यह रजिस्टर ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले जाति-दबाए गए समुदायों के वास्तविक अनुभवों को दर्ज करने का माध्यम बनेगा, जिससे जाति भेदभाव की व्यवस्थागत समस्या को उजागर किया जा सकेगा।
ऑस्ट्रेलिया में दक्षिण एशियाई आबादी बढ़ रही है और 2035 तक इसके 1.5 मिलियन से ज़्यादा होने का अनुमान है, बढती जनसंख्या के साथ ही जातिगत समीकरणों पर विचार करने की ज़रूरत और भी बढ़ गई है।
एजीएफ द्वारा जारी एक पेज के सहमति फॉर्म में स्पष्ट किया गया है कि यह जानकारी स्वेच्छा से एकत्र की जा रही है। इसमें व्यक्तिगत या जनसांख्यिकीय विवरण, भेदभाव के अनुभव, घटना का स्थान और सहायक दस्तावेज शामिल हो सकते हैं। प्रतिभागी पूरी तरह गुमनाम रह सकते हैं और किसी भी प्रश्न को छोड़ सकते हैं।
जानकारी मुख्य रूप से डी-आइडेंटिफाइड और एग्रीगेटेड रूप में रिसर्च, वकालत, शिक्षा और नीति सुधार के लिए उपयोग की जाएगी। एजीएफ ने आश्वासन दिया है कि पहचान योग्य जानकारी बिना स्पष्ट सहमति के साझा नहीं की जाएगी और डेटा को प्राइवेसी एक्ट 1988 (Privacy Act 1988 (Cth) तथा ऑस्ट्रेलियन प्राइवेसी प्रिंसिपल्स के अनुसार सुरक्षित रखा जाएगा।
इस रजिस्टर का उद्देश्य सिर्फ अनुभवों को एकत्र करना नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया में जाति भेदभाव को एक संरक्षित विशेषता के रूप में मान्यता दिलाना है। एजीएफ का मानना है कि वास्तविक कहानियों के आधार पर सबूत तैयार करने से रिसर्च, वकालत, सार्वजनिक शिक्षा और नीति परिवर्तन को मजबूती मिलेगी। दलित इतिहास माह के इस मौके पर यह पहल विशेष रूप से प्रासंगिक है, क्योंकि अप्रैल पूरे महीने दलित समुदाय अपनी ऐतिहासिक संघर्ष, प्रतिरोध और सांस्कृतिक विरासत को याद करते हुए सामाजिक न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाता है।
ऑस्ट्रेलिया में लंबे समय से पसरा जातिवाद
ऑस्ट्रेलिया में जाति भेदभाव एक प्रासंगिक और बढ़ती हुई समस्या है, जिसे लंबे समय से नजरअंदाज किया जाता रहा है। 'पेरियार अंबेडकर थॉट्स सर्किल ऑफ ऑस्ट्रेलिया' (PATCA) ने न्यू साउथ वेल्स की संसद में एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करके बताया कि कैसे दलित, बहुजन, आदिवासी, मुस्लिम, ईसाई, सिख और तमिल समुदाय के लोग इस भेदभाव का सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं।
यह रिपोर्ट 22 जनवरी को संसद की कानून और सुरक्षा समिति को सौंपी गई। 14 पन्नों के इस दस्तावेज़ में PATCA ने दावा किया है कि जातिगत भेदभाव सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया की धरती पर भी भारतीय मूल के लोग इसे झेल रहे हैं। PATCA ने अपनी रिपोर्ट में साफ तौर पर उन समुदायों के नाम गिनाए हैं जो इस भेदभाव से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
अक्टूबर 2024 में ऑस्ट्रेलिया में तमिल और अंबेडकरवादी समूहों ने दीपावली उत्सवों के दौरान रावण दहन की परंपरा को समाप्त करने के लिए एकजुट होकर विरोध भी किया। तमिल और जाति-पीड़ित हिंदू समुदायों के लिए रावण उनके पूर्वजों का प्रतीक होकर श्रद्धेय है, और इस प्रतीकात्मक कृत्य को न केवल गहरे अपमानजनक के रूप में देखा जाता है बल्कि इसे धार्मिक अपमान का भी मामला माना जाताहै। दलित अधिकार कार्यकर्ता मानते हैं कि यह कृत्य ऑस्ट्रेलिया के बहुसांस्कृतिक समाज को विभाजित करने का खतरा पैदा कर सकता है।
डॉ. अंबेडकर की तस्वीर से भी असहजता ?
3 नवंबर 2025 को 'डायस्पोरा में जातिगत भेदभाव को समझना: संवाद और सहयोग का निर्माण' विषय पर एक संगोष्ठी आयोजित की गई थी । इसका आयोजन नॉटिंघम विश्वविद्यालय द्वारा किया गया था, जिसमें एशियन मीडिया एंड कल्चर्स नेटवर्क और डीकिन विश्वविद्यालय ने सह-भागीदारी की। इस संगोष्ठी में शिक्षाविद्, सामुदायिक नेता, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता एक साथ आए और उन्होंने प्रवासी समुदायों (डायस्पोरा) में व्याप्त जातिगत भेदभाव के मुद्दे पर चर्चा की। गोष्ठी में सांची मेश्राम ने बताया था कि किस तरह डॉ. अंबेडकर की तस्वीर लगाना या अंबेडकरवादी कार्यक्रमों में शामिल होना, कुछ लोगों के मन में असहजता पैदा कर सकता है।
सुशांत वंजारी ने जाति, वर्ग, लिंग और प्रवासन की स्थिति के आपसी जुड़ाव पर बात की, और ऐसे भेदभाव को "अत्यंत गंभीर स्वरूप" बताया, जिसका हर हाल में विरोध किया जाना चाहिए।
पराग भगत ने कहा कि ऑस्ट्रेलियाई मानवाधिकार आयोग द्वारा 'राष्ट्रीय नस्लवाद-विरोधी ढाँचे' (National Anti-Racism Framework) में जाति को शामिल किया जाना एक ज़रूरी कदम है; लेकिन कार्यस्थलों, विश्वविद्यालयों और सामुदायिक संगठनों के भीतर जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए अभी और अधिक काम किए जाने की आवश्यकता है।