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Dalit History Month: 100 साल पहले केरल के इस मंदिर की सड़क पर दलित-पिछड़ों को चलने का भी नहीं था अधिकार, आज से सभी को 'वडक्कुपुरथु पट्टू' अनुष्ठान में शामिल होने का हक!

कोट्टयम /केरल-  एक सदी पहले जिस मंदिर की सड़कों पर दलितों और पिछड़ों का चलना वर्जित था, आज वही वैक्कम महादेव मंदिर जातिवाद की बेड़ियों को तोड़ते हुए नया इतिहास रच रहा है। त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड (टीडीपी) ने घोषणा की है कि अब मंदिर के अनूठे और सबसे पवित्र अनुष्ठान 'वडक्कुपुरथु पट्टू' में सभी जातियों के भक्त बिना किसी भेदभाव के शामिल हो सकेंगे। यह ऐतिहासिक फैसला वैक्कम सत्याग्रह के 100 वर्ष पूरे होने के साल में आया है, जिसने केरल में सामाजिक न्याय की नींव रखी थी।

केरल सरकार ने "सबको समान अधिकार" नीति को मजबूत करते हुए मंदिर प्रशासन को निर्देश दिए। देवस्वम मंत्री वी.एन. वासवन ने कहा – "अब कोई भी भक्त, जो व्रत-उपवास करके आएगा, उसे भेदभाव नहीं झेलना पड़ेगा।"

वडक्कुपुराथु पट्टू के तहत 12 दिवसीय कालमेझुथु प‌ट्टू अनुष्ठान, देवी भद्रकाली को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। मलयालम महीने मीनम के कार्तिक के दिन आयोजित होने वाला यह आयोजन, वैकोम महादेव मंदिर के उत्तरी प्रांगण में विशेष अनुष्ठानों और गुरुथी प्रसाद के साथ होता है। इस साल, यह 2-13 अप्रैल तक मनाया जाएगा।

क्या है 'वडक्कुपुरथु पट्टू' जहाँ अब सभी जातियाँ की होगी भागीदारी

यह एक 12-दिवसीय पवित्र अनुष्ठान है, जो हर 12 साल में एक बार आयोजित होता है। देवी भद्रकाली को प्रसन्न करने के लिए कलामेझुथु (रंगोली कला) और भक्ति गीत गाए जाते हैं।

  • किंवदंती के अनुसार, वडक्कुमकूर राज्य में फैली महामारी के दौरान राजा को देवी ने स्वप्न में इसकी शुरुआत का आदेश दिया था।

  • अनुष्ठान में एक तलवार की पूजा की जाती है, जो देवी का प्रतीक मानी जाती है।

  • पहले केवल उच्च जाति के लोग ही इस अनुष्ठान में सक्रिय भूमिका निभा सकते थे।

  • अब त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि कोई भी भक्त, चाहे वह किसी भी जाति का हो, इसमें शामिल हो सकता है।

वैक्कम सत्याग्रह: वह संघर्ष जिसने बदली केरल की तस्वीर

1924-25 में केरल के त्रावणकोर राज्य में वैक्कम सत्याग्रह एक क्रांतिकारी आंदोलन बना, जिसने भारत में जाति उन्मूलन की लड़ाई को नई दिशा दी।

क्यों शुरू हुआ था यह आंदोलन?

  • वैक्कम महादेव मंदिर के चारों ओर की सड़कों पर "निचली जाति के हिंदुओं का प्रवेश वर्जित" था।

  • अगड़ी जातियों का मानना था कि दलितों के पैरों के छू जाने से मंदिर की पवित्रता भंग होगी।

कैसे लड़ी गई यह लड़ाई?

  • 30 मार्च, 1924 को के. केलप्पन, टी.के. माधवन और के.पी. केशव मेनन जैसे नेताओं ने अहिंसक सत्याग्रह शुरू किया।

  • सत्याग्रहियों ने प्रतिबंधित सड़कों पर चलकर गिरफ्तारी दी, जबकि महात्मा गांधी, पेरियार और श्री नारायण गुरु ने इसका समर्थन किया।

  • 23 नवंबर, 1925 को आंदोलन का अंत हुआ, जब त्रावणकोर सरकार ने मंदिर के तीनों दिशाओं की सड़कें सभी के लिए खोल दीं।

इतिहास में इसका महत्व

  • यह भारत का पहला व्यवस्थित मंदिर प्रवेश आंदोलन था, जिसने 1936 के त्रावणकोर मंदिर प्रवेश घोषणा का मार्ग प्रशस्त किया।

  • इसने दक्षिण भारत के सामाजिक न्याय आंदोलनों को प्रेरणा दी।

वैक्कम मंदिर को लेकर यह फैसला साबित करता है कि अगर समाज चाहे परंपराएँ बदल सकती हैं । यह दलितों-पिछड़ों के संघर्ष की एक नई जीत है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देगी। केरल में बीते कुछ समय से सदियों पुरानी मान्यताओं में बदलाव की पहल की जा रही है ताकि सामाजिक समरसता कायम हो और भेदभाव समाप्त किया जाए। इसी कड़ी में शिवगिरि मठ अब गुरुवायुर मंदिर में सभी धर्मों के लोगों के प्रवेश की मांग कर रहा है। वतर्मान में इस मंदिर में गैर हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित है। इसी तरह कई मंदिरों ने पुरुषों के लिए "शर्ट उतारने की अनिवार्यता" जैसी पुरानी प्रथाओं को खत्म किया है।

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