भोपाल। राजधानी भोपाल के एक हालिया मेकअप सेमिनार में जब बबली अहिरवार मेश्राम ने मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और महाराष्ट्र से आई करीब 400 महिलाओं को मेकअप के गुर सिखाए, तो यह सिर्फ सुंदरता की परिभाषा बदलने का क्षण नहीं था। यह एक महिला के साहस, आत्मनिर्भरता और उस संघर्ष की कहानी थी, जिसने जातिगत भेदभाव और सामाजिक बाधाओं को पार कर सफलता की नई इबारत लिखी।
भोपाल की 34 वर्षीय बबली अहिरवार की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। उनका जन्म एक दलित परिवार में हुआ, जहां आर्थिक तंगी और सामाजिक भेदभाव रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थे। उनके पिता लक्ष्मण अहिरवार सब्जी बेचकर परिवार का गुजारा करते थे। छह बहनों में दूसरे नंबर पर होने के कारण उन्होंने बचपन से ही समाज की कठोर सच्चाइयों का सामना किया। जातिगत भेदभाव, आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी के बावजूद उनके अंदर एक अदम्य जिजीविषा थी।
बचपन से ही बबली को पढ़ाई का बहुत शौक था। लेकिन समाज और परिस्थितियों ने उनके सपनों को सीमित करने की कोशिश की। उन्हें बचपन मे कई बार जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
2011 में उनकी शादी प्रवीण मेश्राम से हुई, जो तब कॉलेज में पढ़ रहे थे। यह शादी सिर्फ एक रिश्ता नहीं, बल्कि एक नए सपने की शुरुआत थी। उनके पति ने उन्हें हर कदम पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया, लेकिन इस सफर में उनकी सास, हेमलता मेश्राम, का योगदान अविस्मरणीय था। उन्होंने न सिर्फ बबली के हुनर को पहचाना, बल्कि उन्हें अंग्रेज़ी सीखने और अपने सपनों को साकार करने के लिए भी प्रेरित किया। शिक्षा के प्रति उनके इसी जुनून ने उन्हें एमबीए तक की पढ़ाई पूरी करने के लिए प्रेरित किया।
घर से पार्लर तक का सफर
जब बबली गर्भवती थीं, तब डॉक्टर ने उन्हें बेड रेस्ट की सलाह दी। लेकिन उनका मन नहीं माना। उनके भीतर कुछ कर गुजरने की जिद थी। उनकी सास ने उनकी इस बेचैनी को समझा और 1500 रुपये के मेकअप सामग्री खरीदकर दिए। यही वह बीज था, जिससे बबली के सपनों की फसल लहलहाने लगी। उन्होंने अपने घर के एक छोटे से कमरे में पार्लर शुरू किया।

यह सफर आसान नहीं था। शुरुआती दिनों में उनके पास सीमित ग्राहक थे, लेकिन उन्होंने मेहनत और लगन से अपने काम को निखारा। 2016 में, उन्होंने प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाने का काम शुरू किया और साथ ही पार्लर भी चलाने लगीं। उनकी पहली कमाई सिर्फ 500 रुपये थी, लेकिन यह रकम उनके लिए किसी बड़ी जीत से कम नहीं थी। यह एक संकेत था कि उनकी मेहनत रंग लाने लगी थी।
धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई, और आज वे एक सफल मेकअप आर्टिस्ट हैं। उनकी सेवाओं की मांग न केवल भोपाल बल्कि अन्य शहरों में भी होने लगी। उन्होंने कई सेमिनार में ट्रेनिंग देकर हजारों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी। वह अब अपने पार्लर में भी महिलाओं को मेकअप सिखा रही हैं, उनका मानना है महिलाएं जन्म से आत्मविश्वासी होती हैं, उन्हें आत्मनिर्भर बनने की जरूरत है।
बबली अहिरवार आज दो बेटियों की माँ हैं—एक 10 साल की और दूसरी 4 साल की। वे मानती हैं कि संघर्ष और शिक्षा ही वह औजार हैं, जिनसे सामाजिक बेड़ियों को तोड़ा जा सकता है। बचपन में मिले जातिगत भेदभाव ने उनके मन में यह स्पष्ट कर दिया था कि शिक्षा ही एकमात्र रास्ता है, जिससे बदलाव लाया जा सकता है।

डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों से प्रेरित होकर वे लगातार शिक्षा के महत्व को बढ़ावा देती हैं। वे द मूकनायक प्रतिनिधि से बातचीत करते हुए कहती हैं, "महिलाओं को पढ़ना चाहिए, आगे बढ़ना चाहिए और अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए। अगर हम खुद को सक्षम बनाएंगे, तो समाज भी हमें स्वीकार करेगा।"
बबली अहिरवार की सफलता में मोनिका शर्मा का विशेष योगदान रहा है। मोनिका, जो ग्रैंड ब्यूटी अवार्ड (GBA) की डायरेक्टर हैं, महिलाओं को मेकअप की ट्रेनिंग देने के लिए सेमिनार आयोजित करती हैं। उन्होंने बबली को न केवल आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया, बल्कि उनकी प्रतिभा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान भी दिलाई। बबली ने बताया कि मोनिका शर्मा ने उन्हें सेलेब्रिटीज़ के मेकअप करने के मौके भी दिलवाए।
द मूकनायक से बातचीत में मोनिका शर्मा ने कहा, "हम समाज के हाशिए पर खड़े लोगों की स्थिति को लेकर चिंतित हैं। महिलाओं को समान अवसर मिलने चाहिए। डॉ. अंबेडकर ने समानता की बात की थी, और उनके कारण ही हमें अधिकार मिले हैं। हमें समाज मे ऐसी महिलाओं की जरूरत है, जो दूसरों को प्रेरित करें और आत्मनिर्भर बनने में मदद करें।"
बबली के पति प्रवीण मेश्राम कहते हैं कि वे हमेशा अपनी पत्नी बबली का साथ देते हैं। उन्होंने कहा, "मेरा पूरा परिवार बबली के साथ है। मैं मानता हूं कि महिला और पुरुष समान होते हैं। मुझे पहले से ही विश्वास था कि बबली एक दिन कुछ बड़ा करेगी, और आज हमारे परिवार का नाम उसके संघर्ष के कारण रोशन हुआ है।"
द मूकनायक से बबली अहिरवार ने कहा, " जब मैंने आगे बढ़ने की ठानी, तो रास्ते आसान नहीं थे। लेकिन मैं जानती थी कि अगर पढ़ाई करूंगी, आत्मनिर्भर बनूंगी, तो कोई मुझे कमजोर नहीं समझेगा। जब पहली बार अपने हाथों से किसी दुल्हन का मेकअप किया और बदले में 500 रुपये मिले, तो वो सिर्फ पैसे नहीं थे, वो मेरी मेहनत की पहली कमाई थी—मेरे आत्मसम्मान की जीत थी।"
"मुझे हमेशा यह अहसास दिलाया गया कि एक दलित महिला होने के नाते मेरी सीमाएं हैं, लेकिन मैंने खुद को उन सीमाओं से मुक्त कर लिया। मेरी सास ने, मेरे पति ने मेरा साथ दिया, लेकिन समाज के ताने अब भी पीछा नहीं छोड़ते। फिर भी, जब मैं महिलाओं को मेकअप सिखाती हूं, जब वे आत्मनिर्भर बनने का सपना देखती हैं, तो मुझे लगता है कि मेरा संघर्ष सार्थक था। अगर एक महिला भी मेरे संघर्ष से प्रेरणा लेकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाए, तो यही मेरी सबसे बड़ी जीत होगी", बबली ने कहा।

प्रेरणा की मिसाल
आज बबली अहिरवार हजारों महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। उनके संघर्ष और सफलता की कहानी यह साबित करती है कि अगर हिम्मत हो, तो कोई भी मुश्किल रास्ता नहीं होता। जीवन में संघर्ष जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है खुद पर विश्वास और आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति।
भोपाल में आयोजित मेकअप सेमिनार में उन्होंने जो सिखाया, वह केवल मेकअप की कला नहीं थी, बल्कि यह एक संदेश था—हर महिला में आत्मनिर्भर बनने की शक्ति है, बस जरूरत है आत्मविश्वास और मेहनत की।