मशहूर फिल्ममेकर आनंद पटवर्धन ने अपनी प्रस्तावना में 'अख़लाक़' किताब को क्यों बताया लहूलुहान लोकतंत्र और मॉब लिंचिंग का दस्तावेज़?

12:55 PM Aug 24, 2026 | Rajan Chaudhary

जाने-माने डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर आनंद पटवर्धन की नज़र से गुज़रते हुए, दयाशंकर मिश्र की किताब ‘अख़लाक़, भारत में मॉब लिंचिंग की विस्तृत ज़मीनी पड़ताल’ महज़ एक किताब नहीं रह जाती। यह एक ऐसे समाज का आइना बन जाती है जहाँ नफ़रत को एक हथियार के रूप में गढ़ा गया है। यह किताब उन घावों को कुरेदती है जिन्हें एक सच्चा और संवेदनशील नागरिक कभी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।

मई 2014 में देश में सत्ता परिवर्तन के महज़ एक हफ़्ते बाद ही इस नफ़रत ने अपना पहला शिकार चुना। 2 जून 2014 को पुणे में युवा कंप्यूटर इंजीनियर मोहसिन शेख़ को सिर्फ इसलिए हॉकी स्टिक और पत्थरों से कुचल दिया गया क्योंकि उसका पहनावा एक मुसलमान का था। एक बेबुनियाद भड़काऊ भाषण ने उन्मादी भीड़ को हत्यारों में तब्दील कर दिया था।

मोहसिन के पिता मोहम्मद सादिक़ शेख़ की लड़ाई इस त्रासदी का सबसे मार्मिक पहलू है। उन्होंने न्याय के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन कभी प्रतिशोध की वकालत नहीं की। उनका दृढ़ विश्वास था कि हिंसा का जवाब हिंसा नहीं हो सकता, क्योंकि इससे केवल निर्दोषों की जान जाती है। चार साल के लंबे और निराशाजनक संघर्ष के बाद, न्याय की आस में पूरी तरह टूट चुके सादिक़ भाई ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

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मोहसिन की मौत महज़ एक शुरुआत थी। इसके सवा साल बाद सितंबर 2015 में राजधानी से सटे दादरी में मोहम्मद अख़लाक़ को गोहत्या की झूठी अफ़वाह पर पीट-पीटकर मार डाला गया। यह अफ़वाह रात के अंधेरे में एक मंदिर के पुजारी द्वारा फैलाई गई थी। इस हमले में अख़लाक़ के बेटे दानिश को इतनी बेरहमी से पीटा गया कि वह कोमा में चला गया।

इस क्रूर घटना की सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि अख़लाक़ का बड़ा बेटा सरताज भारतीय वायुसेना में देश की सेवा कर रहा था। हमले के बाद जब आनंद पटवर्धन ने वायुसेना कॉलोनी में शरण लिए इस परिवार से मुलाक़ात की, तो सरताज ने बिना किसी द्वेष के कहा कि उसे आज भी भारतीय होने पर गर्व है। यह उस परिवार की राष्ट्रीय आस्था का एक ऐसा प्रमाण था, जिसे उनके ही पड़ोसियों ने एक अफ़वाह के नाम पर उजाड़ दिया था।

इन विचलित करने वाली घटनाओं की गूँज आनंद पटवर्धन की बहुचर्चित डॉक्यूमेंट्री 'विवेक | Reason' में भी गहराई से सुनाई देती है। यह फिल्म तर्कवादी डॉ. नरेंद्र दाभोलकर और कॉमरेड गोविंद पानसरे की हत्याओं की पड़ताल से शुरू होकर बहुसंख्यकवादी नफ़रत के व्यापक स्वरूप तक पहुँचती है। लेकिन मॉब लिंचिंग का विषय इतना विशाल था कि इसे कैमरे के सीमित दायरे में समेटना मुमकिन नहीं था।

यहीं पर दयाशंकर मिश्र की यह नायाब किताब अपनी ऐतिहासिक प्रासंगिकता सिद्ध करती है। 248 पन्नों का यह दस्तावेज़ महज़ कुछ घटनाओं का संकलन नहीं है। यह अल्पसंख्यकों—मुस्लिमों, दलितों और ईसाइयों—पर बहुसंख्यकवादी भीड़ के सुनियोजित हमलों के पैटर्न को परत-दर-परत उजागर करता है। यह भारत में होने वाली लिंचिंग को अमेरिका में अश्वेतों के ख़िलाफ़ हुई क्रूरता के इतिहास से जोड़कर एक विस्तृत वैश्विक परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है।

अंततः, यह किताब समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। मॉब लिंचिंग महज़ एक जघन्य अपराध नहीं है, बल्कि यह विविधता और सहिष्णुता पर टिके लोकतंत्र की जड़ों पर सीधा प्रहार है। आनंद पटवर्धन की यह प्रभावशाली प्रस्तावना इस बात को पूरी तरह स्पष्ट करती है कि यह किताब हर उस व्यक्ति को पढ़नी चाहिए जो देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को सहेजना चाहता है।

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