भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा का शीतकालीन सत्र 1 से 5 दिसंबर तक आयोजित किया जा रहा है। कुल चार कार्य दिवस वाले इस सत्र में सरकार कई महत्वपूर्ण विधेयक पेश करने जा रही है। हालांकि विपक्ष ने सत्र की अवधि को बेहद कम बताते हुए इसे बढ़ाने की मांग उठाई है। इसके बावजूद सरकार दो बड़े बदलावों वाले विधेयक सदन में रखने को तैयार है, जिन्हें कैबिनेट पहले ही मंजूरी दे चुकी है। विधानसभा से स्वीकृति मिलने के बाद ये दोनों कानून पूरे प्रदेश में लागू होंगे और स्थानीय निकायों व व्यापार व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन लेकर आएंगे।
निकाय अध्यक्ष अब सीधे जनता चुनेगी
विधानसभा में रखा जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव नगरपालिका अधिनियम में संशोधन है। इसके तहत अब तक जहां नगर पालिका और नगर परिषद के अध्यक्ष पार्षदों द्वारा चुने जाते थे, वहीं अब जनता सीधे इनका चुनाव करेगी। यह व्यवस्था मेयर चुनाव प्रणाली जैसी होगी, जिसमें जनता की सीधी भागीदारी से स्थानीय निकायों में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
सबसे अहम बात यह है कि सरकार ने प्रस्ताव में राइट टू रिकॉल की व्यवस्था भी शामिल की है। यानी यदि जनता अपने चुने हुए अध्यक्ष से असंतुष्ट होती है, कामकाज में लापरवाही पाती है या भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, तो जनता दोबारा मतदान कर अध्यक्ष को हटा भी सकेगी। इस प्रावधान को स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा और साहसिक कदम माना जा रहा है।
कामगारों को साप्ताहिक अवकाश अनिवार्य
सत्र में सरकार दूसरा बड़ा बदलाव दुकान एवं संस्थान (शॉप एंड एस्टाब्लिशमेंट) संशोधन विधेयक 2025 के रूप में करने जा रही है। इसमें छोटे-बड़े व्यापारियों, दुकानों, प्रतिष्ठानों और कामगारों से जुड़े कई प्रावधान बदले जाएंगे।
सबसे बड़ा परिवर्तन गुमास्ता लाइसेंस फीस में किया गया है। वर्तमान में यह शुल्क 100 से 500 रुपये तक है, जिसे बढ़ाकर 5,000 रुपये किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि बड़ी दुकानों, प्रतिष्ठानों और खासतौर पर वे होटल जो इनकम टैक्स दायरे में आते हैं, उनसे अधिक शुल्क लिया जाएगा। इसका उद्देश्य व्यापारिक प्रतिष्ठानों को सुव्यवस्थित करना और सरकारी निगरानी को मजबूत करना बताया जा रहा है।
इसके अलावा सभी दुकानदारों और प्रतिष्ठान संचालकों को अपने कर्मचारियों को सप्ताह में एक दिन का अनिवार्य अवकाश देना होगा। यह प्रावधान कामगारों के हित में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, ताकि उन्हें नियमित आराम का अधिकार सुनिश्चित हो सके।
1497 सवालों के मिलेंगे जवाब
शीतकालीन सत्र भले ही चार दिनों का हो, लेकिन विधायकों द्वारा पूछे गए सवालों की संख्या इसका महत्व और बढ़ाती है। कुल 1497 प्रश्न विधानसभा सचिवालय को प्राप्त हुए हैं। इनमें से 907 सवाल ऑनलाइन और 590 सवाल ऑफलाइन तरीके से भेजे गए हैं। सभी विभागों ने अपने-अपने उत्तर विधानसभा को सौंप दिए हैं। इससे संकेत मिलता है कि सत्र में विभिन्न विभागों के कार्यों और योजनाओं की समीक्षा पर भी खासा समय खर्च होगा।
इन मुद्दों पर छिड़ेगी सबसे ज्यादा बहस
सत्र के दौरान कई ऐसे संवेदनशील और जनसरोकार से जुड़े मुद्दे हैं, जो केंद्र में रहने वाले हैं।
छिंदवाड़ा में कफ सिरप पीने से बच्चों की मौत: स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी निगरानी व्यवस्था को लेकर विपक्ष सरकार को घेर सकता है।
किसानों को खाद वितरण की समस्या: राज्य के कई हिस्सों में किसानों को खाद की कमी से जूझना पड़ रहा है। विपक्ष इसे किसान विरोधी नीतियों का परिणाम बता सकता है।
ये दोनों मुद्दे सीधे जनता की परेशानियों से जुड़े हैं, इसलिए सदन में तीखी बहस की संभावना है।
चार दिन का सत्र बेहद कम
सत्र शुरू होने से पहले ही विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, सत्र की अवधि पर सवाल उठा चुकी है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा, “यह सत्र केवल 4 दिन का रखा गया है। इतने कम समय में जनता के सभी मुद्दे उठाना संभव नहीं है। सरकार महत्वपूर्ण कानून पास कराना चाहती है, इसलिए जल्दबाजी में सत्र आयोजित कर रही है।”
कांग्रेस का आरोप है कि सरकार कम दिन का सत्र रखकर बहस से बचना चाहती है, जबकि राज्य में किसानों से लेकर बेरोजगारी, महंगाई और कानून व्यवस्था जैसे कई मुद्दे गंभीर रूप लिए हुए हैं।
आदिवासी मुद्दों पर गर्म रहेगा सदन!
मध्यप्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र में इस बार आदिवासी समुदाय से जुड़े मुद्दों के गूंजने की पूरी संभावना है। राज्य के विभिन्न जिलों से लगातार ऐसी घटनाएँ सामने आ रही हैं, जो आदिवासी अधिकारों, वनाधिकार, जमीन संरक्षण, स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासनिक उपेक्षा से जुड़ी हैं। बीते महीनों में आदिवासी युवाओं पर फर्जी मामलों, पुलिस कार्रवाई, जमीन विवाद, विस्थापन, पोषण संकट और रोजगार योजनाओं में अनियमितताओं जैसी घटनाओं ने राजनीतिक माहौल को गर्म रखा है।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार की नीतियाँ आदिवासी बहुल क्षेत्रों में जमीन पर लागू नहीं हो रहीं और समुदाय के वास्तविक मुद्दों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। यही वजह है कि इस सत्र में कांग्रेस और आदिवासी संगठनों के विधायकों की ओर से इन विषयों पर गंभीर बहस की उम्मीद है। सरकार की ओर से भी केंद्रीय और राज्य स्तरीय योजनाओं की प्रगति रिपोर्ट पेश की जा सकती है, लेकिन विपक्ष इसे जमीनी हकीकत से जोड़कर सवाल उठाने की तैयारी में है।
द मूकनायक से बातचीत में कांग्रेस विधायक डॉ. हीरालाल अलावा ने कहा, कि इस बार सदन में आदिवासी समाज की आवाज़ पहले से कहीं अधिक तेज़ सुनाई देगी। उन्होंने कहा कि "हम लगातार आदिवासियों पर हो रही घटनाएँ और शासन द्वारा समुदाय की उपेक्षा के मामले सदन में उठाएँगे।" डॉ. अलावा ने बताया कि पिछले महीनों में आदिवासी क्षेत्रों में हिंसा, दमन, वनाधिकार पट्टों में देरी, स्कूलों की बदहाली, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, और स्थानीय प्रशासन द्वारा अन्यायपूर्ण कार्रवाई जैसे कई मुद्दों को लेकर समुदाय में गहरी चिंता है। उनका कहना है कि सरकार केवल योजनाओं की घोषणा कर रही है, लेकिन जमीनी ढांचा कमजोर है और इसका सबसे बड़ा खामियाज़ा आदिवासी परिवारों को भुगतना पड़ रहा है। इसलिए कांग्रेस इस सत्र में इन सभी मामलों की विस्तृत चर्चा और ठोस जवाबदेही की मांग करेगी।