ट्रांसजेंडर अधिकार बिल 2026: अनसुनी आपत्तियों के बीच संसद से पास, एनसीटीपी सदस्यों का इस्तीफा

10:39 AM Mar 28, 2026 | Rajan Chaudhary

नई दिल्ली: 20 मार्च को रात 10:30 बजे के कुछ देर बाद, ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता और नेशनल काउंसिल फॉर ट्रांसजेंडर पर्सन्स (एनसीटीपी) की दक्षिण भारत प्रतिनिधि कल्कि सुब्रमण्यम को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय से एक फोन आया। यह कॉल केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र कुमार द्वारा लोकसभा में ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट बिल, 2026 पेश किए जाने के ठीक सात दिन बाद की गई थी।

कल्कि सुब्रमण्यम ने बताया कि इस महत्वपूर्ण विधेयक को पेश करने से पहले एनसीटीपी से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया था। परिषद में पूर्वोत्तर क्षेत्र की प्रतिनिधि और कार्यकर्ता ऋतुपर्णा नियोग ने भी स्पष्ट किया कि बिल पेश होने के बाद कई सदस्यों ने मंत्रालय को पत्र लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया था, जिसके बाद ही उन्हें मंत्री के साथ बैठक के लिए बुलाया गया।

केंद्र सरकार ने अगस्त 2020 में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए नीतियों, कार्यक्रमों और कानूनों के निर्माण पर सलाह देने के उद्देश्य से एनसीटीपी का गठन किया था। इसके बावजूद, ट्रांसजेंडर अधिकारों को प्रभावित करने वाले इस सबसे महत्वपूर्ण कानून पर सदस्यों का कहना है कि उन्हें पूरी तरह से अंधेरे में रखा गया।

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इसी अनदेखी और असहमति के कारण सुब्रमण्यम और नियोग ने 25 मार्च को परिषद में अपने पदों से इस्तीफा दे दिया।

विपक्ष के भारी विरोध के बीच 24 मार्च को लोकसभा और अगले दिन यानी 25 मार्च को राज्यसभा में यह बिल पारित कर दिया गया। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस दौरान दावा किया कि स्थायी समिति की कार्यवाही के हिस्से के रूप में एक साल तक इस विषय पर व्यापक चर्चा हो चुकी है।

इससे पहले, 21 मार्च को नई दिल्ली के डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में तय की गई बैठक में सुब्रमण्यम सहित केवल चार ट्रांसजेंडर सदस्य ही पहुँच सके। सुब्रमण्यम के अनुसार, यह बैठक इतने कम समय के नोटिस पर बुलाई गई थी कि बाकी सदस्य मंत्री से मिलने के लिए उड़ानें ही बुक नहीं कर पाए।

जो चार सदस्य दिल्ली पहुँचने में सफल रहे, उनमें कल्कि सुब्रमण्यम, रवीना बरीहा, विद्या राजपूत और अभिना अहर शामिल थीं। करीब दो घंटे के इंतजार के बाद उन्हें बताया गया कि मंत्री की तबीयत खराब है और वे बैठक में शामिल नहीं हो सकेंगे।

इसके बाद एक वरिष्ठ आर्थिक सलाहकार ने इन चार सदस्यों की आपत्तियां सुनीं। सुब्रमण्यम का आरोप है कि सलाहकार ने परिषद के सदस्यों द्वारा दिए गए लगभग सभी सुझावों को सिरे से खारिज कर दिया।

ऋतुपर्णा नियोग ने बताया कि उनकी प्रमुख मांग जेंडर की पहचान तय करने के मामले में 'स्व-पहचान' (सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन) के अधिकार को बनाए रखने की थी। वे किसी भी व्यक्ति के ट्रांस होने या न होने का निर्धारण करने के लिए मेडिकल बोर्ड के गठन और शारीरिक परीक्षण पर जोर दिए जाने के सख्त खिलाफ थे।

सुब्रमण्यम के मुताबिक, उस बैठक का लब्बोलुआब यही था कि उन्हें स्पष्ट रूप से बता दिया गया था कि उनके सुझावों के बिना भी यह बिल आसानी से पास हो जाएगा।

इस बेनतीजा बैठक के बाद, इन ट्रांस महिलाओं ने मंत्री से उनके आवास पर व्यक्तिगत रूप से केवल पांच मिनट मिलने की कोशिश की। सुब्रमण्यम का दावा है कि वे आवास के गेट तक पहुँच गई थीं, लेकिन उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया और कहा गया कि मंत्री अस्वस्थ हैं और आराम कर रहे हैं। इस पूरे मामले पर मंत्रालय की तरफ से कोई जवाब नहीं दिया गया है।

सोमवार, 23 मार्च को सुब्रमण्यम ने मंत्री के निजी सहायक (पीए) से संपर्क किया और बिल पर अपनी आपत्तियों का विस्तृत विवरण भेजा। पीए ने उन्हें आश्वासन दिया कि ये आपत्तियां मंत्री तक पहुँचा दी जाएंगी।

इसके अगले दिन, 24 मार्च को लोकसभा में बिल पर हुई बहस का जवाब देते हुए वीरेंद्र कुमार ने कहा कि यह कानून उन लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लाया गया है, जिन्हें अपनी शारीरिक स्थिति के कारण बिना किसी गलती के गंभीर सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कानूनी अधिकारों के साथ-साथ यह कानून सम्मान और गरिमा भी प्रदान करेगा।

गौरतलब है कि एनसीटीपी के पदेन अध्यक्ष केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री होते हैं, जबकि पदेन उपाध्यक्ष उसी मंत्रालय के राज्य मंत्री होते हैं। इस परिषद के मुख्य कार्यों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की समानता और पूर्ण भागीदारी के लिए बनाई गई नीतियों के प्रभाव की निगरानी करना शामिल है। साथ ही, ट्रांस समुदाय के मुद्दों से जुड़े सभी सरकारी विभागों और गैर-सरकारी संगठनों की गतिविधियों की समीक्षा और समन्वय करना भी इसका प्रमुख दायित्व है।