'ट्रांसजेंडर्स की गिरफ्तारी और तलाशी के लिए तुरंत बने SOP': दिल्ली हाईकोर्ट का केंद्र और पुलिस को सख्त निर्देश

11:24 AM Sep 03, 2026 | Rajan Chaudhary

नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक बेहद अहम कदम उठाया है। अदालत ने बुधवार को केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया है कि वे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़ी एक उचित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने के लिए जरूरी कदम उठाएं।

मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने इस मामले पर गंभीरता से संज्ञान लिया है। एक कानून के छात्र द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए अदालत ने केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया। इसके साथ ही, बेंच ने संबंधित अधिकारियों से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की एडवाइजरी पर विचार करने को कहा है।

यह याचिका तारण चंदना नामक छात्र ने दायर की है। याचिका में तर्क दिया गया है कि दिल्ली पुलिस के पास महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों की गिरफ्तारी के लिए तो स्पष्ट स्थायी आदेश मौजूद हैं, लेकिन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के मामले में नियम पूरी तरह से मौन हैं।

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याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि इसी साल मई 2026 में NHRC ने 'ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए एडवाइजरी 2.0' जारी की थी। इस एडवाइजरी का मुख्य उद्देश्य ट्रांसजेंडर्स की गिरफ्तारी, हिरासत, तलाशी, पूछताछ और जेल में रखने को लेकर एक व्यापक SOP बनाना था। हालांकि, दिल्ली में अब तक ऐसे कोई भी दिशा-निर्देश नहीं बनाए गए हैं।

अदालत ने भारत संघ, दिल्ली पुलिस और राज्य सरकार से इस पूरे मामले पर जवाब दाखिल करने को कहा है। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि इस बीच मई 2026 में जारी एडवाइजरी पर विचार किया जाए और कानून के दायरे में उचित कदम उठाए जाएं।

हाईकोर्ट ने अधिकारियों को एक हलफनामा दायर करने का भी निर्देश दिया है, जिसमें उन्हें बताना होगा कि एडवाइजरी के अनुपालन में उन्होंने अब तक क्या कदम उठाए हैं। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 18 नवंबर की तारीख तय की है।

जनहित याचिका में इस बात पर खास जोर दिया गया है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की गिरफ्तारी और व्यक्तिगत तलाशी के लिए एक स्पष्ट नियम होना बेहद जरूरी है। यह भारत के संविधान द्वारा दी गई शारीरिक अखंडता, गरिमा, समानता और भेदभाव न करने के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक है।

नियमों के इस अभाव के कारण होने वाले भारी नुकसान का एक स्पष्ट उदाहरण मई 2025 में देखने को मिला था। याचिका के अनुसार, उस समय एक एफआईआर के तहत तीन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया था। यह आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने उनकी लैंगिक पहचान के बारे में कोई पूछताछ नहीं की और न ही स्व-घोषणा या सहमति मांगी।

बेहद चौंकाने वाली बात यह रही कि उनमें से एक के पास महिला जननांग रचना थी और दूसरे के पास एक वैध पहचान प्रमाण पत्र (सर्टिफिकेट ऑफ आइडेंटिटी) भी मौजूद था। इसके बावजूद, बिना किसी संवेदनशीलता के एक पुरुष पुलिस अधिकारी द्वारा ही उन तीनों की व्यक्तिगत तलाशी ली गई थी।