सुप्रीम कोर्ट का अहम निर्देश: जेलों को दिव्यांग कैदियों के अनुकूल बनाने के लिए बनेगी व्यापक योजना

04:08 PM Apr 22, 2026 | Rajan Chaudhary

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति को अहम निर्देश दिए हैं। देश भर की खुली जेलों के सुधार के लिए बनाई गई इस समिति को अब अपना दायरा बढ़ाने को कहा गया है। अदालत का स्पष्ट कहना है कि सुरक्षा संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए जेलों को दिव्यांगों के अनुकूल बनाने के लिए एक व्यापक योजना तैयार की जाए। इस महत्वपूर्ण पैनल की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, जस्टिस एस. रवींद्र भट कर रहे हैं।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने अपने आदेश में कैदियों के मौलिक अधिकारों पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि दिव्यांग कैदियों के अधिकारों को मानवीय और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण के साथ मान्यता मिलनी चाहिए। पीठ ने स्पष्ट किया कि जेल में रहने का मतलब यह कतई नहीं है कि संविधान के अनुच्छेद 14 (समान व्यवहार का अधिकार) और 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) के तहत मिलने वाले मौलिक संरक्षणों को किसी भी तरह से कमतर आंका जाए।

शीर्ष अदालत का यह ताजा आदेश सत्यन नरवूर द्वारा दायर एक याचिका पर आया है। अधिवक्ताओं कलीस्वरम राज और तुलसी के. राज के माध्यम से दायर इस याचिका में मुख्य रूप से मानवाधिकार कार्यकर्ताओं जी. साईबाबा और स्टेन स्वामी द्वारा झेली गई अमानवीय जेल स्थितियों को उजागर किया गया था। यह आदेश जेल सुधारों की दिशा में अदालत द्वारा उठाए गए कई महत्वपूर्ण कदमों की एक अहम कड़ी है।

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याचिका में बताया गया कि दिव्यांग विद्वान और मानवाधिकार कार्यकर्ता जी. साईबाबा के निधन का सीधा संबंध उनके बिगड़ते स्वास्थ्य से था। लंबे समय तक जेल में रहने और वहां की अमानवीय स्थितियों ने उनकी हालत को और अधिक खराब कर दिया था। इसी तरह, पार्किंसंस रोग से पीड़ित स्टेन स्वामी को जेल में एक सिपर कप तक देने से इनकार कर दिया गया था, जो व्यवस्था की गंभीर खामियों को दर्शाता है।

इससे पहले फरवरी में दिए गए एक आदेश में भी अदालत ने इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया था। तब यह स्पष्ट किया गया था कि दिव्यांग कैदियों के साथ दुर्व्यवहार करने वाले जेल अधिकारियों को दिव्यांग जन अधिकार अधिनियम (RPwD Act) के तहत दंडित किया जाएगा। साथ ही, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपने जेल नियमों में बदलाव करने के निर्देश दिए गए थे।

इसका मकसद यह सुनिश्चित करना था कि विशेष जरूरतों वाले कैदियों को गतिशीलता के लिए सहायक उपकरण, विशेष चिकित्सा देखभाल और परिवार का लगातार समर्थन पाने के लिए मुलाक़ात के अधिकारों को बढ़ाया जाए।

मंगलवार, 21 अप्रैल, की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि जेल सुधारों की सिफारिश करने के लिए पहले से ही एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति मौजूद है, हालांकि इसके कार्य अभी शुरुआती चरण में हैं। इस मौजूदा समिति में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिव और जेल महानिदेशक शामिल हैं।

इसके अलावा, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) और गृह, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता, कानून एवं न्याय तथा महिला एवं बाल विकास मंत्रालयों के सचिव भी इसका हिस्सा हैं।

इस समिति को और अधिक प्रभावी और समावेशी बनाने के लिए अदालत ने 21 अप्रैल, 2026 के अपने आदेश में कुछ नए सदस्यों को शामिल किया है। अब भारत सरकार के दिव्यांगजन अधिकारिता विभाग के सचिव और सभी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के सचिव भी इस पैनल का हिस्सा होंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने समिति को एक समग्र और लागू करने योग्य कार्य योजना तैयार करने का निर्देश दिया है। इस योजना के तहत यह सुनिश्चित किया जाएगा कि दिव्यांग कैदियों को उनकी विशिष्ट जरूरतों और शारीरिक आवश्यकताओं के अनुसार उचित सहायक उपकरण, गतिशीलता सहायता और अन्य जरूरी सामान मुहैया कराया जाए।

अदालत ने जोर देकर कहा कि इस नई कार्य योजना में एक समान मानक तय होने चाहिए। दिव्यांग कैदियों के लिए सहायक उपकरणों की खरीद की प्रक्रिया, उनके रखरखाव के नियम और सुरक्षा संबंधी उपायों को भी इस योजना में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया जाना चाहिए।

शीर्ष अदालत का मानना है कि इस मामले को उच्चाधिकार प्राप्त समिति को सौंपने से एक व्यवस्थित और विशेषज्ञता से भरा मूल्यांकन संभव हो सकेगा। इससे सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दिव्यांग कैदियों को दी जाने वाली सुविधाओं और मौजूदा कानूनी ढांचे की निरंतर निगरानी हो सकेगी।

अदालत के अनुसार, यह कदम अलग-अलग कार्यवाहियों के बिखराव को रोकेगा और एक एकजुट कार्यान्वयन सुनिश्चित करेगा। समिति को अगले चार महीने के भीतर सुप्रीम कोर्ट में अपनी समेकित स्थिति रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया गया है।