इलाहबाद हाईकोर्ट ने माना अंतरधार्मिक लिव-इन संबंध UP एंटी-कन्वर्जन कानून के दायरे में नहीं, जानिये क्यों महत्वपूर्ण ये फैसला

11:10 AM Feb 24, 2026 | Geetha Sunil Pillai

प्रयागराज- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और विस्तृत फैसले में स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश निषेधक धर्मांतरण अधिनियम, 2021 (UP Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2021) अंतरधार्मिक लिव-इन रिलेशनशिप (लाइव-इन संबंध) को प्रतिबंधित नहीं करता, बशर्ते इसमें कोई जबरदस्ती, धोखा या प्रलोभन से धर्म परिवर्तन का प्रयास न हो। जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने 23 फरवरी को 12 याचिकाओं के एक बैच में यह फैसला सुनाया, जिसमें कुल 12 जोड़े शामिल थे जिसमे 7 मुस्लिम लड़कियां हिंदू लड़कों के साथ और 5 हिंदू लड़कियां मुस्लिम लड़कों के साथ लिव-इन में रह रही थीं।

कोर्ट ने इन सभी याचिकाओं को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को पुलिस संरक्षण देने का आदेश दिया और राज्य तथा निजी पक्षकारों को उनके जीवन, स्वतंत्रता और निजता में हस्तक्षेप न करने का निर्देश दिया।

याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि वे बालिग हैं, अपनी स्वतंत्र इच्छा से एक-दूसरे के साथ रह रहे हैं, लेकिन परिवार के सदस्यों और निजी पक्षकारों से उन्हें जान का खतरा है। उन्होंने स्थानीय पुलिस से संपर्क किया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई, इसलिए वे हाईकोर्ट पहुंचे। कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता श्वेताश्व अग्रवाल को न्याय मित्र (अमिकस क्यूरी) के रूप में सहायता के लिए नियुक्त किया था।

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राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ताओं ने अधिनियम की धारा 8 और 9 के तहत धर्म परिवर्तन के लिए आवेदन नहीं किया, इसलिए उनके संबंध अवैध हैं और धारा 3 एवं 5 के तहत दंडनीय हैं। राज्य ने किरण रावत मामले का हवाला दिया, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत लिव-इन को मान्यता न देने की बात कही गई थी।

कोर्ट की ये टिप्पणियाँ अहम

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिनियम सहमति से साथ रहने पर नहीं बल्कि केवल जबरन या धोखे से धर्म परिवर्तन पर लागू होता है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को हिंदू-मुस्लिम के रूप में नहीं, बल्कि दो बालिग व्यक्तियों के रूप में देखा जो अपनी इच्छा से शांति से साथ रह रहे हैं। अदालत ने माना कि यहां किसी ने भी धर्म परिवर्तन का प्रयास नहीं किया, इसलिए अधिनियम लागू नहीं होता। अंतरधार्मिक विवाह अपने आप में कानून द्वारा प्रतिबंधित नहीं है। विवाह या लिव-इन के लिए किसी को जबरन धर्म बदलने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। किसी व्यक्ति का अपनी पसंद के साथ रहने का अधिकार, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है।व्यक्तिगत संबंध में हस्तक्षेप दो व्यक्तियों की पसंद की स्वतंत्रता में गंभीर अतिक्रमण है।

कोर्ट ने लता सिंह (2006), शफीन जहां (2018), शक्ति वहिनी (2018), केएस पुट्टास्वामी (2017), सुप्रियो @ सुप्रिया चक्रवर्ती (2023) जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का विस्तार से हवाला दिया। साथ ही इस कोर्ट के ही कई पुराने फैसलों जैसे रजिया (2023), कमिनी देवी (2020), अकांक्षा (2025), बेबी आलिया (2025) और मयरा (2021) का जिक्र किया।

क्या है कन्वर्शन का अर्थ

कोर्ट ने धारा 2(c) की परिभाषा पर जोर दिया कि "Conversion" का मतलब है अपनी धर्म को त्यागकर दूसरा अपनाना। यहां कोई धर्म परिवर्तन नहीं हुआ। धारा 3 की व्याख्या में कहा कि यह केवल जबरन, धोखे या प्रलोभन से धर्म परिवर्तन पर लागू होती है। लिव-इन संबंध में यदि कोई धर्म परिवर्तन नहीं, तो अपराध नहीं बनता।

कोर्ट ने किरण रावत मामले की आलोचना करते हुए कहा कि मुस्लिम लॉ में जिना (फॉर्निकेशन) को दंडनीय मानना भारतीय कानून में लागू नहीं होता, क्योंकि IPC या अन्य कानून में ऐसी सजा (कोड़े या पत्थरबाजी) नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता यदि खतरा महसूस करें तो पुलिस से संपर्क करें। पुलिस उम्र की जांच करेगी और यदि जरूरी लगा तो तत्काल संरक्षण प्रदान करेगी।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि 31 अगस्त 2019 के सरकारी आदेश (GO No. 1/2019/591) का सख्ती से पालन हो, जिसमें अंतरजातीय/अंतरधार्मिक जोड़ों की सुरक्षा के लिए गाइडलाइंस हैं।

कोई भी पक्षकार उनके जीवन में हस्तक्षेप न करे। यदि कोई जबरन धर्म परिवर्तन का प्रयास करे तो शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। यह आदेश किसी जांच या मुकदमे में बाधा नहीं बनेगा।

इलाहबाद हाईकोर्ट ने अनुच्छेद 14 और 15 का हवाला देते हुए कहा कि कानून सभी के लिए समान है, यदि समान धर्म के लोग लिव-इन में रह सकते हैं, तो अलग धर्म के लोग भी रह सकते हैं। यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा, पसंद की आजादी और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।