"शादीशुदा महिला के साथ सहमति से रिश्ता अपराध नहीं": छत्तीसगढ़ वकील पर रेप केस में सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय यहां पढ़ें

10:22 AM Feb 06, 2026 | Geetha Sunil Pillai

नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में छत्तीसगढ़ के एक वकील प्रमोद कुमार नवरत्न के खिलाफ दर्ज रेप के केस को पूरी तरह खारिज कर दिया है। यह मामला शादी के झूठे वादे पर बार-बार बलात्कार (धारा 376(2)(n) आईपीसी) का था, लेकिन कोर्ट ने माना कि पीड़िता खुद शादीशुदा थीं और उनकी शादी कानूनी रूप से वैध थी, इसलिए शादी का वादा कानूनी रूप से लागू नहीं हो सकता था। फैसला 5 फरवरी को जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की बेंच ने दिया।

पीड़िता एक वकील हैं, जिसकी शादी 2 जून 2011 को हुई थी। उनके एक बेटा है, जो 12 अप्रैल 2012 को पैदा हुआ। वैवाहिक विवाद के कारण पति ने 10 दिसंबर 2018 को फैमिली कोर्ट, रायगढ़ में तलाक की याचिका दायर की। फैमिली कोर्ट ने 27 नवंबर 2024 को याचिका खारिज कर दी। पति ने 10 जनवरी 2025 को हाईकोर्ट में अपील दायर की जो अभी लंबित है। यानी फैसले के समय पीड़िता की शादी कानूनी रूप से बरकरार थी और उनका तलाक नहीं हुआ था।

18 सितंबर 2022 को एक सोशल इवेंट में पीड़िता की मुलाकात आरोपी प्रमोद कुमार नवरत्न से हुई जो भी वकील हैं। दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई और आरोपी नियमित रूप से उन्हें घर से ऑफिस छोड़ने-लाने लगे। पीड़िता ने आरोपी को बताया कि उसका और उसके पति के बीच तलाक का केस चल रहा है।

Trending :

6 फरवरी 2025 को पीड़िता ने सरकंडा पुलिस स्टेशन, बिलासपुर में FIR नंबर 213/2025 दर्ज कराई। आरोप थे कि 18 सितंबर 2022 को आरोपी ने उन्हें दोस्त के घर ले जाकर बलात्कार किया, विरोध पर शादी का वादा किया और सिर पर सिंदूर लगाया। उसके बाद कई बार शारीरिक संबंध बने, शादी का वादा करते रहे। पीड़िता गर्भवती हुईं, तो आरोपी ने गर्भपात की गोलियां जबरन खिलाईं। 27 जनवरी 2025 को आरोपी के घर जाकर विरोध करने पर परिवार ने मारपीट की और धमकाया।

आरोपी ने उसी दिन SP को शिकायत दी कि पीड़िता उन्हें ब्लैकमेल कर रही हैं, शादी की मांग कर रही हैं और आत्महत्या की धमकी दे रही हैं। उन्होंने कहा कि वे कभी शादी नहीं सोच रहे थे, सिर्फ दोस्ती और सहकर्मी के रूप में देखते थे।

आरोपी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत मांगी जो 3 मार्च 2025 को मिल गई। हाईकोर्ट ने पीड़िता के बयान पर कहा कि वह शादीशुदा हैं, बेटा है और संबंध सहमति से थे। उसी दिन हाईकोर्ट ने आरोपी की क्वाश याचिका खारिज कर दी और कहा कि जांच के शुरुआती दौर में फैसला नहीं हो सकता।

जांच के बाद 2 अप्रैल 2025 को चार्जशीट दाखिल हुई और केस जिला सेशन जज, बिलासपुर में शुरू हुआ।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार की और हाईकोर्ट के 3 मार्च 2025 के आदेश को पलट दिया। FIR, चार्जशीट और सेशन केस पूरी तरह रद्द कर दिए। कोर्ट ने कहा, "यह मानना कठिन है कि शादीशुदा महिला को शादी के झूठे वादे पर शारीरिक संबंध के लिए प्रेरित किया गया हो।"

कोर्ट ने कहा, "शादी का ऐसा वादा कानूनी रूप से लागू नहीं हो सकता क्योंकि हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 5(i) के तहत जीवित पति/पत्नी होने पर दूसरी शादी निषिद्ध है।" कोर्ट ने स्पष्ट किया, "दोनों पक्षों को पीड़िता की वैवाहिक स्थिति की जानकारी होने के कारण यह किसी भी तरह से नहीं कहा जा सकता कि आरोपी द्वारा धोखे या गलत बयानी से सहमति प्राप्त की गई।"

पीड़िता के वकील होने का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा, "पीड़िता खुद एक वकील हैं, 33 साल की हैं और कानून की जानकारी रखती हैं। उन्हें सतर्क रहना चाहिए था और राज्य की मशीनरी को व्यक्तिगत रिश्ते में नहीं घसीटना चाहिए था।"

कोर्ट ने कई पुराने फैसलों (Naim Ahamed vs State, Mahesh Damu Khare, Prashant vs State, Samadhan vs State) का हवाला दिया और कहा, "सहमति से बने रिश्ते में ब्रेकअप होने पर आपराधिक कार्यवाही शुरू करना गंभीर अपराध को तुच्छ बनाता है और आरोपी पर स्थायी कलंक लगाता है।" Bhajan Lal मामले के आधार पर कोर्ट ने कहा कि आरोप भी अपराध नहीं बनाते। कोर्ट ने माना कि यह झूठे वादे पर बार-बार रेप का मसला नहीं बल्कि सहमति से बने रिश्ते का टूटना है।