कोच्चि- केरल हाईकोर्ट ने मंगलवार को पालक्काड के निलंबित कांग्रेस नगर पार्षद प्रशोभ एम को एक दलित महिला के साथ कथित दुष्कर्म मामले में अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। जस्टिस ए बदरुद्दीन ने प्रशोभ की अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
प्रशोभ पर आरोप है कि उसने एक दलित महिला को नौकरी दिलाने का झांसा देकर उसका यौन शोषण किया। पालक्काड टाउन साउथ पुलिस स्टेशन में उसके खिलाफ रेप, धमकाने आदि आरोपों पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत मामला दर्ज किया गया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार प्रशोभ विवाहित होने के बावजूद पीड़िता के साथ डेढ़ साल से अधिक समय तक संबंध बनाए रखा। उसने महिला को नौकरी और आजीवन सहयोग का आश्वासन देकर बार-बार शारीरिक संबंध बनाए। जब यह रिश्ता सार्वजनिक हुआ तो आरोपी ने महिला को धमकाया और जातिगत गालियां दीं। गर्भवती होने पर भी उसे डराया गया।
पीड़िता ने अदालत को बताया कि उसकी मुलाकात प्रशोभ से तब हुई जब प्रशोभ के पिता, जो एक चाय की दुकान चलाते थे, ने पीडिता के साथ दुर्व्यवहार किया। प्रशोभ ने उसे शिकायत न करने के लिए मनाया और फिर लगातार उसके संपर्क में रहा। उसने अच्छी नौकरी का वादा कर महिला को यौन संबंध के लिए प्रलोभन दिया।
पुलिस में शिकायत दर्ज होने के बाद विशेष एससी/एसटी अदालत ने अप्रैल में ही प्रशोभ को अग्रिम जमानत देने से मना कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि प्रथम दृष्टया निलंबित पार्षद के खिलाफ मामला बनता है। इसके बाद प्रशोभ ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट में प्रशोभ की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शशिमंगलम एस अजीत कुमार और अन्य वकीलों ने पैरवी की। उनका तर्क था कि आरोपों को अगर सही मान भी लिया जाए तो यह सिर्फ एक सहमति से बना संबंध था। साथ ही उन्होंने कहा कि एससी/एसटी अधिनियम के तहत अपराध के तत्व पूरे नहीं होते और इस कानून के तहत अग्रिम जमानत पर लगी रोक भी लागू नहीं होती। हालांकि, जस्टिस बदरुद्दीन ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला सही है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्राथमिक तौर पर एससी/एसटी अधिनियम के तहत मामला बनता है। ऐसे में निलंबित पार्षद को राहत देने से इनकार किया जाता है।