ईरान और अमेरिका के बीच एक स्तर का युद्ध विराम जारी है, एक राउंड वार्ता भी हो चुकी है पर कोई घोषित नतीजा अभी भी नहीं निकल पाया है, बार-बार अपने जीत का दावा करने वाले अमेरिका व इसरायल अपने घोषित लक्ष्यों में से कुछ हासिल नहीं कर पाए हैं, पर इस दौरान बहुत कुछ बदल गया है, जिसे ठीक-ठीक समझना अब और जरूरी हो गया है.
एक बात साफ़ है कि ईरान ने बाज़ी पलट दी है अपनी शर्तों को स्वीकार करने के लिए मजबूर करता जा रहा है ईरान द्वारा इसराइल को चरम अलगाव में डालने डाल देने में सफलता मिलती जा रही है. पश्चिम एशिया में स्थित अमेरिकी सैनिक अड्डे अप्रासंगिक होते जा रहे हैं, जिन देशों में ये अड्डे हैं वहां के लिए बोझ बनते जा रहे हैं, इन देशों में पहले से ही जनता के अंदर एंटी अमेरिकन मूड मौजूद था, अब तो और भी इस दिशा में भारी इजाफा हुआ है, राष्ट्रवाद अपने उफान पर है, पश्चिम एशिया के सरकारों को भी लगने लगा है कि ये अड्डे हमारे लिए ख़तरा बनते जा रहे हैं और पश्चिम एशिया के लगभग सभी देश अपने स्वतंत्र विकास के बारे में गंभीरता से सोचने लगे हैं.
पश्चिम एशिया में विचार के स्तर पर बहुत कुछ परिवर्तन होता जा रहा है, ईरान ने इस इलाके में सोचने के तरीके में भारी बदलाव ला दिया है. खाड़ी के मुल्कों में यह स्पष्ट समझ बनती जा रही है कि खुद की सुरक्षा की जिम्मेदारी अमेरिका या पश्चिमी देशों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती है, ईरान ने अपनी रणनीति और सैन्य कुशलता के बल पर यह साबित कर दिया है कि न केवल अपनी सुरक्षा की जा सकती है बल्कि एक तथाकथित ताकतवर मुल्क को भारी संकट में डाला जा सकता है.
होर्मुज भी पहले जैसा फ्री नहीं रह जाएगा, ईरान और ओमान का नियंत्रण इस पर युद्ध के बाद भी जारी रहेगा, और बाद में यह संभव है कि पूरा पश्चिम एशिया होर्मुज मसले पर किसी लांग टर्म समझौते की तरफ बढ़ जाए, और हो सकता है कि प्रकारांतर में होर्मुज खाड़ी मुल्कों के लिए एक स्थायी रक्षा कवच में तब्दील हो जाए.
ईरान ने भी युद्ध के पहले शायद होर्मुज के रणनीतिक महत्व को इतना नहीं आंका था, युद्ध के दौरान ही यह रणनीति विकसित हुई, बाद में तो ईरान ने होर्मुज को ही युद्ध का सेंटर प्वाइंट बना दिया, अमेरिका और पूरा यूरोप भौंचक रह गया, अमेरिकी तंत्र और मोसाद भी ईरान के इस मास्टर स्ट्रोक को,बिल्कुल ही नहीं समझ पाए .
पूरा खाड़ी क्षेत्र भी अब समझने लगा है कि युद्ध,सैनिक ताकत, सुंदर कूटनीति और बेहतर रणनीति के बल पर जीता जा सकता है. कमज़ोरी को भी ताकत में बदला जा सकता है.
ऐसा लग रहा है कि 40 वर्षों से प्रतिबंध झेल रहे ईरान ने बड़ी शिद्दत व धैर्य के साथ हर मोर्चे पर समग्रता के साथ तैयारी जारी रखी थी. आमतौर पर माना जाता है कि प्रतिबंध लगा देने के बाद कोई देश एक सीमा के बाद टूट जाता है. अमेरिका और पश्चिमी देशों की यह बहुप्रचारित रणनीति अक्सर काम भी करती रही है, पर प्रतिबंध कई बार उल्टे परिणाम भी लाते हैं, और बहिष्कार झेल रहे देश दी हुई परिस्थितियों में रास्ते निकालने की अधिकतम कोशिशों में लग जाते हैं, अपने स्वतंत्र विकास का विचार इन मुल्कों के केंद्र में आ जाता है, स्वदेशी माडल विकसित करने की जद्दोजहद अपने चरमोत्कर्ष पर होती है और अनिवार्य तौर पर राष्ट्रवादी भावना व शहादत देने का विचार बनिस्पत अन्य देशों के मुकाबले ज्यादा विस्तार लेने लगती है.
ईरान के कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ है, उसने अपना एक स्वदेशी माडल विकसित किया, अर्थव्यवस्था को भी ईरान ने अपने मौजूदा संसाधनों के ईर्द-गिर्द विकसित करता रहा, अपने तरह के सहयोगियों को भी तलाशता रहा, डालर पर निर्भरता को कम करता गया ईरान पहाड़ी इलाकों से समृद्ध देश है, ईरान ने इन पहाड़ों को सामरिक ताकत में बदल दिया, इस्लाम को ईरानी सिस्टम ने आधुनिक जरूरतो के अनुरूप विकसित किया, और उसे राष्ट्रवादी मुहिम में बदल दिया.
पिछले दिनों इसराइल के साथ 12 दिवसीय युद्ध के दौरान भी ईरान ने बहुत कुछ सीखा. उसने अपने सैन्य ताकत को सचेत ढंग से विकेंद्रीकृत कर दिया और निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी उसी अनुरूप ढाल दिया गया. और बेहद कम लागत वाले मारक हथियारों के निर्माण पर जोर दिया गया.
और तो और अमेरिका-इसरायल की ग़लती ने, यानि खोमेनई की शहादत ने ईरानी जनता में चट्टानी एकता स्थापित कर दिया, जनता और सत्ता के भी जो तनाव था ख़त्म हो गया.
ईरान के बरअक्स अगर हम देखें तो अमेरिका ने बहुत कुछ खो दिया, ईरानी कूटनीति के चलते अमेरिका युद्ध अपराधी की तरह देखा जाने लगा. अमेरिका अपने घोषित लक्ष्यों में से एक भी हासिल नहीं कर पाया, न रिजीम चेंज हुआ न ईरानी नौसेना को ख़त्म कर पाए न मिसाइलों को ही नष्ट कर पाए और न ही परमाणु प्रतिस्पर्धा पर ही रोक लगा पाए.
असल में इस युद्ध के बाद अमेरिका ने अपनी वैश्विक साख लगभग खो दिया है, ईरान ने पश्चिम एशिया में स्थापित अमेरिकी सैनिक अड्डों को भी अप्रासंगिक बना दिया है.
इस युद्ध के बाद पश्चिम एशिया अमेरिकी-इसराइल गठजोड़ के दबाव से मुक्त होने की तरफ बढ़ रहा है.
ऐसा दिख रहा कि खाड़ी इलाका, ईरान चीन और रसिया के नेतृत्व में पुनर्गठन के रास्ते पर है,साथ ही चूंकि होर्मुज, पश्चिम एशिया के लिए स्थायी रक्षा कवच में तब्दील होता जा रहा है, शायद इसीलिए पूरा यूरोप भी, जो अब अमेरिका पर भरोसा नहीं करता, और एशिया के अधिकांश देश भी, बदलते हुए पश्चिम एशिया के जरिए रिडिजाइन हो रहे ढीले-ढाले गठजोड़ का हिस्सा बनने की तरफ बढ़ रहे हैं.
अमेरिका और अमेरिकी सैनिक अड्डों की साख खत्म होने और ईरान के ताकतवर प्रतिवाद के बाद अब इसराइल भी भारी अलगाव में चला गया है. उसके शक्तिशाली होने का भ्रम टूट गया है, पश्चिम एशिया में हो रहे पुनर्गठन के चलते अब इसराइल को अपने लिए जगह तलाश पाना मुश्किल होता जाएगा. और खुद नेतन्याहू को भी अपने ही देश में नए के संकट का सामना करना पड़ेगा.
यह भी जानना ज़रूरी है कि भारत का पूरा का पूरा संंकट क्या केवल पश्चिमी एशिया में तनाव के चलते है या हमारी नयी विदेश नीति इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार है.
यह सच है कि युद्ध के पहले ही हमारी विदेश नीति बदल दी गई, एक गुटनिरपेक्ष स्वायत्त देश को अमेरिकी खूंटे से बांध दिया गया, अमेरिकी दबाव में ही 2018 से ईरान से तेल लेना बिल्कुल ही बंद कर दिया गया. और फिर ट्रंप के दबाव में रूस से तेल लेना भी नगण्य कर दिया गया. और तो और मोदी सरकार ने अमेरिका के साथ एक बेहद असमान व्यापार डील करके आगे आने वाले समय के लिए भी संकट जारी रहने की गारंटी कर दी गई है.
युद्ध के चलते भी ज़रूर भारत को संकट का सामना करना पड़ रहा है, पर मूल संकट भारत की नई विदेश नीति है, जिसे नहीं बदला गया तो भारत लंबे व स्थायी संकट की ओर बढ़ सकता है..
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