अब जबकि बंगाल में चुनाव अपने पहले चरण में प्रवेश कर चुका है, उसी समय यह सवाल हवा में तैर रहा है कि क्या बंगाल के खिलाफ लगभग युद्ध जैसा कुछ छेड़ दिया गया है, लग तो ऐसा ही रहा है जैसे दिल्ली ने बंगाल पर हमला बोल दिया है. करीब दो लाख केंद्रीय बल चुनाव से पहले ही उतार दिए गए हैं. हर 150 लोगों पर एक सुरक्षा बल तैनात कर दिया गया है, जबकि सामान्यतया पूरे देश में प्रति 600 नागरिकों पर फकत एक पुलिस कर्मी ही तैनात होता है.
लंबे समय से भारी अशांति के बावजूद मणिपुर में अधिकतम 30 हज़ार सुरक्षा बल ही उतारे गए थे, जबकि मणिपुर अभी भी जल रहा है.
कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य में भी जहां 10 साल बाद चुनाव हो रहे थे, वहां भी केंद्रीय बलों की 900 कम्पनियों को ही तैनात किया गया था, जबकि ठीक इसके विपरित बंगाल में ऐसी 2400 कम्पनियों को तैनात कर दिया गया है.
अगर 2021 के बंगाल चुनाव से तुलना किया जाए तब भी आश्चर्यजनक वृद्धि कर दी गई है, उस समय भी सीएपीएफ की 845 कम्पनियों की ही तैनाती की गई थी, मतलब 2021 के मुकाबले इस बार कम्पनियों की संख्या तीन गुनी कर दी गई यानि 2400.
ऐसी क्या आपात स्थिति पैदा हो गई है, जिसके चलते केंद्रीय बलों को इतनी बड़ी तादाद में बंगाल में उतारना पड़ा है, इसका कोई जबाब ज्ञानेश कुमार बिल्कुल ही देने की स्थिति में नही हैं.
अगर बंगाल का एक और उदाहरण ले लें तब भी इतने बड़े पैमाने तैनाती का कोई तर्क विकसित नही किया जा सकता है.
2024 के बंगाल लोकसभा चुनाव का भी अगर उदाहरण लिया जाए तब भी पूरे बंगाल में 920 कम्पनियों की ही तैनाती की गई थी.
विपक्ष बेहद गंभीर आरोप ये भी लगा रहा है कि गृह मंत्रालय मणिपुर, कश्मीर और अन्य संवेदनशील इलाकों से केंद्रीय बलो की तैनाती को समेट रहा है और उन्हें बंगाल की ओर शिफ्ट कर रहा है, अगर ऐसा है तो यह बेहद ख़तरनाक मूव है, इसे गंभीरता से संज्ञान में लेना चाहिए, और इसकी जांच होनी चाहिए.
एक और आश्चर्यजनक दृश्य पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है, जो किसी चुनावी राज्य में आम तौर पर नही होता है.
मसलन केंद्रीय सशस्त्र बलों यानि सीएपीएफ के सभी इकाइयों की एक साथ बैठक, जो कि कोलकाता में सरे-आम आयोजित की गई.
बीएसएफ, सीआईएसएफ आईटीबीपी, एसएसबी, और सीआरपीएफ के जवानों की संयुक्त बैठक आयोजित की गई.
जबकि ऐसा कभी नही हुआ, केंद्रीय बलो की इस तरह की कोई संयुक्त बैठक विधानसभा चुनावों के इतिहास में कभी नही हुआ है.
अब अगर ऐसे में कोई ये आरोप लगाए कि ऐसा लग रहा है कि सेनाएं युद्ध के मोर्चे पर जाने की तैयारी कर रही हैं, तो इसमें आश्चर्य क्या है. इस तरह की सैन्य तैनाती या तैयारी संभवतः तभी की जाती होगी, जब कोई राज्य संघ से बग़ावत की मुद्रा में आ गया हो, जबकि बंगाल में ऐसा कुछ भी नही हो रहा है.
और इस तैयारी को अगर राजशाही कालीन दौर से जोड़ कर देंखे तो ऐसा लगेगा जैसे कोई राजा अपने ही बगावती इलाके से निपटने की तैयारी कर रहा है.
इसी संदर्भ से विपक्ष भी आरोप लगा रहा है कि यह बंगाल में सैनिक तख्ता पलट की तैयारी है,
इस तरह की सैन्य तैनाती या तैयारी तभी की जा सकती है जब कोई राज्य संघ से बग़ावत की मुद्रा में आ गया हो, जबकि बंगाल में ऐसा कुछ भी नही हो रहा है.
इससे पहले SIR को भी बंगाल की जनता में अपने उपर हमले की तरह ही देखा गया, 90 लाख बंगाली नागरिक वोटर ही नही रह गए, एक तरह से उनके ऊपर बाहरी होने का ठप्पा लग गया, इनमें से 34 लाख लोगों ने साहस करके ट्रिब्यूनल में शिकायत तो कर दी पर वहां सचेत रूप से सुनवाई करने से ही इंकार कर दिया गया, यह पहला राज्य है जहां SIR की प्रक्रिया अभी पूरी नही हुई, उससे पहले ही चुनाव घोषित कर दिया गया, इस मायने में भी बंगाल पहला राज्य है जहां SIR की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रही है, बावजूद इसके 34 लाख नागरिकों को न्याय अभी तक मिला है.
एक और हमला जिस पर हमें ध्यान देना चाहिए कि वोटर लिस्ट से बाहर होने वाले 90 फीसदी मुस्लिम समाज से है, यह एक तरह से खास समुदाय की पोलिटिकल लिंचिंग है, जिसे चुनाव आयोग के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट भी नजरंदाज कर रहा है.
चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और देश को यह ठीक से पता है कि बंगाल में मुस्लिम आबादी 30 फीसदी के आसपास है, और यह भी सर्वविदित है कि इस समुदाय का अधिकतम हिस्सा टीएमसी के साथ जाता रहा है. इससे यह अनुमान या आरोप लगाना बंगाल में ज्यादा आसान हो जाता है कि वास्तव में चुनाव सुधार से संबंधित सारी योजनाएं लोकतंत्र को कमजोर करती है और नागरिकों के अधिकार पर हमला करती हैं और यह भी कि इस तरह का हर नकारात्मक पहल चुनाव को लेवल प्लेयिंग फिल्ड नही रहने देता और वर्तमान दिल्ली की सत्ता की ओर झुका देता हैं.
इसका मतलब साफ़ है कि बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी को कई मोर्चे पर लड़ना पड़ रहा है. एक मोर्चा चुनाव आयोग है, जो लगातार टीएमसी पर हमलावर है, ममता बनर्जी के लाखों वोटरों, लोकल नेताओं (1000 की लिस्ट है जिन्हें चुनाव के दिन नज़रबंद किया जा सकता है) को टारगेट कर रहा है.
इसी तरह केंद्रीय गृह मंत्रालय है जिसने एक दूसरा मोर्चा खोल दिया है, और केंद्रीय बलो की अभूतपूर्व संख्या को बंगाल में उतार दिया है, ईडी सीबीआई के छापों की रफ़्तार बढ़ा दी गई है.
ऐसे ही एक तीसरा मोर्चा राजनीतिक नैरेटिव का है जिसे भाजपा ने भी खोल रखा है जहां वह बंगाली अस्मिता के अंदर प्रवेश करने की कोशिश कर रहा है, साथ कई आदिवासी, पिछड़ी, अति पिछड़ी व दलित जातियों का समुच्चय बनाने की जद्दोजहद में सघनता से लगा हुआ, और उसे बंगाली भद्र लोक के बरक्स खड़ा करने की भरपूर कोशिश भी कर रहा है, साथ ही घुसपैठियों का सवाल भी निर्मित करने की कोशिश ज़ारी है.
हालांकि हर मोर्चे पर ममता जम कर लड़ रही हैं, मुकम्मल ज़बाब दे रही है और राजनीतिक व नरेटिव के मोर्चे पर मामता का मुकाबला करना भाजपा के लिए ज्यादा मुश्किल ही होता जा रहा है.
अब ऐसे में देखना ये है कि ममता बनर्जी जो कमजोरी को भी ताक़त में बदल देने के लिए जानी जाती रही हैं, इस बार किस रणनीति से अपने लिए रास्ते निकालती है और एक साथ आयी इतनी समस्याओं को कितनी संभावनाओं में बदल पाती हैं.
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