"बेहतर वेतन की मांग करना कोई अपराध नहीं": कोर्ट ने मानेसर यूनियन नेता की 'अवैध हिरासत' को लेकर पुलिस को कड़ी फटकार लगाई

11:09 AM May 19, 2026 | Rajan Chaudhary

नई दिल्ली: 9 अप्रैल को मानेसर में विरोध प्रदर्शन करने वाले फैक्ट्री मजदूरों को भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किए गए एक यूनियन नेता को बड़ी राहत मिली है। गुड़गांव की एक अदालत ने सोमवार (18 मई) को उन्हें जमानत दे दी है। अदालत ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि आरोपी को बिना किसी ठोस सबूत के पूरे एक महीने तक "अवैध हिरासत" में रखा गया।

गौरतलब है कि मजदूर अपने वेतन में बढ़ोतरी की मांग कर रहे थे। इस घटना के कुछ दिनों बाद ही नोएडा में भी ऐसी ही मांगों को लेकर फैक्ट्री मजदूरों का प्रदर्शन उग्र हो गया था। वहां हिंसा और तोड़फोड़ के बाद यूपी पुलिस ने भारी संख्या में गिरफ्तारियां की थीं। दोनों राज्यों की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर कड़ी कार्रवाई की थी।

गुड़गांव की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डॉ. गगन गीत कौर ने मानेसर स्थित ऑटो पार्ट्स कंपनी 'बेलसोनिका' के कर्मचारी संघ के महासचिव अजीत सिंह की जमानत याचिका पर यह अहम आदेश पारित किया।

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न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि एक श्रमिक संघ के सदस्य के रूप में आरोपी ने लोकतांत्रिक तरीके से कम वेतन का मुद्दा उठाया था। अदालत ने कहा कि कर्मचारियों या मजदूरों द्वारा सरकार या प्रबंधन से अपना वेतन बढ़ाने की मांग करना किसी भी तरह से अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। इसके साथ ही कोर्ट ने पाया कि अजीत सिंह के खिलाफ कोई भी आपत्तिजनक सबूत पेश नहीं किया गया।

अभियोजन पक्ष ने इंडस्ट्रियल मॉडल टाउनशिप (IMT) मानेसर में 'ऋचा ग्लोबल एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड' में विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई कथित हिंसा की गंभीरता को अपना आधार बनाया था। इसमें हत्या का प्रयास, दंगा और सरकारी कामकाज में बाधा डालने जैसे संगीन आरोप शामिल थे।

कंपनी प्रबंधन का आरोप था कि 200 से 250 प्रदर्शनकारी मजदूरों की एक हिंसक भीड़ ने उनके प्रबंधकीय स्टाफ और पुलिस पर पथराव किया। इसके अलावा उन्होंने कंपनी और कई सरकारी वाहनों को भी आग के हवाले कर दिया था।

सरकारी वकील ने अदालत में यह स्वीकार किया कि हिंसा वाले दिन अजीत सिंह मौके पर मौजूद नहीं थे। हालांकि, पुलिस ने यह दावा किया था कि उन्होंने व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज और एक सार्वजनिक भाषण के जरिए इस पूरी घटना की साजिश रची और मजदूरों को भड़काया।

लेकिन पुलिस द्वारा पेश किए गए इलेक्ट्रॉनिक सुबूत अदालत में टिक नहीं सके। जब जांच अधिकारी ने कोर्ट में अजीत सिंह के भाषण का वीडियो चलाया, तो न्यायाधीश ने पाया कि उसमें बढ़ती महंगाई के मुकाबले कम वेतन की समस्या को लेकर मजदूरों की तरफ से सिर्फ एक अपील की गई थी। इसमें भड़काने वाली कोई भी सामग्री मौजूद नहीं थी।

अभियोजन पक्ष ने जब यह मान लिया कि 4 अप्रैल के एक अन्य भाषण के ट्रांसक्रिप्ट में भी कुछ भी आपत्तिजनक नहीं था, तब जज ने अपना कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने फैसला सुनाया कि 13 अप्रैल से अजीत सिंह को बिना किसी प्रथम दृष्टया सबूत के जेल में रखना पूरी तरह से अवैध हिरासत के दायरे में आता है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि 13.04.2026 से आरोपी हिरासत में है और उसे गिरफ्तार करने का कोई भी वैध आधार नहीं दिखाया गया है। यह बिना किसी सबूत के अवैध रूप से बंधक बनाने जैसा है। अदालत के मुताबिक, अब तक उनके खिलाफ कोई भी ठोस या आपत्तिजनक सबूत सामने नहीं आया है।

बचाव पक्ष की वकील वृंदा ग्रोवर ने दलील दी कि अजीत सिंह को 12-13 अप्रैल की दरम्यानी रात को उनके गुड़गांव स्थित घर से जबरन उठाया गया था। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तारी का कारण तक नहीं बताया। उन्होंने यह भी बताया कि इस घटनाक्रम के बाद से उनके नियोक्ता ने उन्हें नौकरी से भी निकाल दिया है।

सीपीआई (एम) से जुड़े श्रमिक संगठन 'सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस' (सीटू) ने अदालत के इस जमानत आदेश का पुरजोर स्वागत किया है। सीटू हरियाणा ने एक प्रेस बयान जारी कर इसे "न्याय की ऐतिहासिक जीत" बताया और मानेसर पुलिस पर पूंजीपतियों के हितों की रक्षा के लिए "साजिश रचने" का आरोप लगाया।

यूनियन के बयान के अनुसार, सोमवार को सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने मौखिक रूप से यह टिप्पणी भी की थी कि अगर 'इंकलाब जिंदाबाद' कहना अपराध माना जाता है, तो इस व्यवस्था को खुद पर शर्म आनी चाहिए। हालांकि यह बात अदालत के लिखित आदेश में शामिल नहीं है, लेकिन वकील वृंदा ग्रोवर ने इसकी पुष्टि जरूर की है।

सीटू हरियाणा के महासचिव जय भगवान ने मांग की है कि मानेसर प्रदर्शन से जुड़ी दो एफआईआर के आधार पर गिरफ्तार किए गए सभी मजदूरों को तुरंत और बिना किसी शर्त के रिहा किया जाए। इसके साथ ही उन्होंने कथित तौर पर "झूठे मामले" दर्ज करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की मांग उठाई है।