बीएचयू देश का प्रमुख शिक्षण संस्थान है। इसके तहत 1960 में आईएमएस (इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस) की स्थापना हुई थी। इसे 2018 में एम्स के स्तर तक उन्नत कर दिया गया। इसके बावजूद यह विषाक्त माहौल के कारण बदनाम है। इसी वर्ष 13 मार्च को आईएमएस में सर्जरी विभाग की जूनियर डॉक्टर सत्या ने आत्महत्या का प्रयास किया। इंसुलिन की भारी मात्रा से किडनी को गंभीर नुकसान हुआ। वह समस्तीपुर की रहने वाली है।
दो माह से मेडिसीन विभाग के वेंटिलेटर पर जिंदगी के लिए लड़ रही है। बीएचयू ने इस मामले में बेशर्म चुप्पी साधते हुए मामले की लीपापोती कर दी है। आंतरिक जांच टीम बनाकर दोषियों को बचाने का प्रयास हो रहा है। जबकि आत्महत्या के प्रयास का मामला आपराधिक श्रेणी में आने के कारण पुलिस जांच का विषय है। यूडीएफ के चेयरपर्सन डॉ लक्ष्य मित्तल ने यूपी सरकार को पत्र लिखकर वाराणसी पुलिस कमिश्नर के नेतृत्व में निष्पक्ष जांच की मांग की थी। लेकिन डबल इंजन की सरकार में न्याय की उम्मीद ही किसे है?
फिलहाल आईएमएस-बीएचयू में भय और आतंक का माहौल बना हुआ है। आत्महत्या के प्रयास के बाद जूनियर रेजिडेंट्स ने कुछ दिन आंशिक हड़ताल और आंदोलन के जरिए अपनी समस्याएं सामने लाईं। इसमें उनकी अवैध लंबी ड़यूटी का मामला प्रमुख था। लेकिन सभी स्टूडेंट्स को धमका दिया गया। आइएमएस के निदेशक प्रोफेसर एसएन संखवार ने पीजी स्टूडेंट्स के ड्यूटी रोस्टर संबंधी मुद्दों को हल करने की घोषणा करके आंदोलन खत्म करा दिया गया। डरे-सहमे स्टूडेंट्स भी चुप रहने को मजबूर हुए।
उस दुखद घटना के दो महीने हो गए, लेकिन कोई सच बताने को तैयार नहीं। डॉ सत्या के इलाज की स्थिति क्या है? उसके स्वास्थ्य में कितना सुधार आया है? वह किन मेडिकल चुनौतियों से जूझ रही हैं? उसका इलाज संतोषजनक है, अथवा नहीं? बेहतर इलाज के लिए किसी उच्च संस्थान में भेजने अथवा किसी नई, महंगी दवा अथवा तकनीक की जरूरत है क्या? यह सब बताने वाला कोई नहीं? इसी तरह, इस मामले की जांच के लिए बनी आंतरिक टीम ने अपनी रिपोर्ट दी, अथवा नहीं? जिन सिनियर्स पर प्रताड़ना के आरोप थे, उन पर क्या कार्रवाई हुई? इन सभी मामलों में आईएमएस-बीएचयू की बेशर्म और रहस्यमय चुप्पी है।
सरकारी अस्पतालों की पूरी निर्भरता मेडिकल स्टूडेंट्स पर होती है। इन अस्पतालों में हजारों की तादाद में मरीज आते हैं। आवश्यक डॉक्टरों तथा नर्सिंग स्टाफ की भारी कमी होती है। सारी कमी मेडिकल स्टूडेंट से पूरी कराई जाती है। अन्य स्टाफ पर मैनेजमेंट का जोर नहीं चलता। मेडिकल स्टूडेंट्स को फेल करने का डर दिखाकर लगातार 36-36 घंटे लंबी ड्यूटी कराई जाती है। उनके सोने, भोजन और आराम जैसी बुनियादी मावनीय जरूरतों का ख्याल नहीं रखा जाता। थके-मांदे जूनियर डॉक्टरों से किस गुणवत्ता की उम्मीद करेंगे आप? (पीजी स्टूडेंट्स को रेजिडेंट डॉक्टर या जूनियर डॉक्टर कहा जाता है।)
पीजी स्टूडेंट्स की इस भयानक थकान के कारण इलाज में बड़ी गल्तियां होती हैं। लेकिन भुक्तभोगियों को इसका पता नहीं चल पाता। पिछले दिनों इसी अस्पताल में गलत ऑपरेशन के कारण राधिका देवी नामक एक महिला की मौत हो गई। उसी नाम की एक अन्य महिला के बदले इनका गलत ऑपरेशन कर दिया गया। इस मामले की सही तरीके से जांच हो, तो पीजी स्टूडेंट्स की लंबी ड्यूटी से इसके संबंध का पता चल सकता है।
डॉ सत्या द्वारा आत्महत्या के प्रयास के पीछे लंबी ड्यूटी की भूमिका का भी पता लगाना जरूरी है। इसके लिए आईएमएस के सर्जरी डिपार्टमेंट के मेडिकल स्टूडेंट्स के पिछले 6 महीने की ड्यूटी चार्ट का अध्ययन किया जाए। जांच हो कि डॉक्टरों की कमी तथा स्टूडेंट्स की लंबी ड्यूटी के कारण मरीजों के इलाज पर क्या असर पड़ रहा है।
क्या है ड्यूटी का नियम?
भारत सरकार के 1992 के नियम के अनुसार मेडिकल कॉलेजों में पीजी स्टूडेंट्स को सप्ताह में अधिकतम 48 घंटे और एक बार में अधिकतम 12 घंटे काम करना है। आईएमएस बीएचयू में भी यही नियम लागू है। इसे एम्स के अनुरूप विकसित किया जा रहा है। एम्स का 21 अगस्त 2025 का आदेश भी भारत सरकार के 1992 के नियम को शब्दश: दोहराता है। लेकिन आईएमएस बीएचयू सहित अधिकांश मेडिकल कॉलेजों में लगातार 36 घंटे लगातार लंबी अवैध और अमानवीय ड्यूटी लगती है। इसका मरीजों के इलाज पर बुरा प्रभाव पड़ता है। फर्जी ड्यूटी रोस्टर बनाकर यह खुला खेल फरूर्खाबादी चल रहा है। इसके कारण मेडिकल स्टूडेंट्स का मानसिक अवसाद, सीट छोड़ने और आत्महत्या तक के लिए विवश होना पड़ता है। मेडिकल स्टूडेंट्स के अभिभावक खून के आंसू रोने को विवश हैं।
नेशनल मेडिकल कमीशन ने 2024 में मेडिकल स्टूडेंट्स के मेंटल हेल्थ पर एक नेशनल टास्क फोर्स बनाया था। इसकी रिपोर्ट के अनुसार 37 फीसदी स्टूडेंट्स में आत्महत्या के विचार पाए गए।हर साल 25 से ज्यादा मेडिकल स्टूडेंट्स की आत्महत्या के मामले सामने आते हैं। हर साल 250 से ज्यादा मेडिकल स्टूडेंट्स मुश्किल से मिली सीट छोड़ देते हैं। जूनियर डॉक्टरों की लंबी ड्यूटी के कारण इलाज की गुणवत्ता प्रभावित होती है। जब तक पीजी मेडिकल स्टूडेंट्स की ड्यूटी के 1992 के नियम का पालन नहीं होगा, तब तक किसी भी सरकारी अस्पताल में अच्छे इलाज की कल्पना करना बचकानी है।
मोदी जी का चुनाव क्षेत्र है, पीएमओ पहुंचा मामला
यूडीएफ के चेयरपर्सन डॉ लक्ष्य मित्तल ने डॉ सत्या के शीघ्र स्वास्थ्य की कामना करते हुए न्याय की मांग की है। वाराणसी मोदी जी का लोकसभा क्षेत्र है। डॉ सत्या का मामला प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंच गया है। युनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट (यूडीएफ) के सदस्य ऋषभ ने बनारस के पुलिस कमिश्नर से जांच की मांग करते हुए पूरी घटना की जानकारी दी है। यह मामला अवर सचिव मुकुल दीक्षित के पास होने की सूचना मिली है। ऋषभ द्वारा पीएमओ में दायर शिकायत के अनुसार अत्यधिक घंटों तक काम के लिए मजबूर करना बीएनएस की धारा 146, 337, 340 और 344 के तहत दंडनीय है। इससे मरीजों की देखभाल पर भी खतरा पैदा होता है। शिकायत में स्वास्थ्य मंत्रालय की 1992 रेजीडेंसी स्कीम के तहत 'वर्क टू रूल' के ऑडिट की मांग की गई है। हफ्ते में 48 घंटे, एक बार में अधिकतम 12 घंटे ड्यूटी और अनिवार्य साप्ताहिक अवकाश का नियम है। पत्र में डॉ. सत्या की वर्तमान स्थिति की हेल्थ रिपोर्ट जारी करने और उन्हें बेहतरीन इलाज सुनिश्चित करने की मांग की गई है। शिकायत में कहा गया है कि आत्महत्या का प्रयास आपराधिक कृत्य है। इसलिए इसे बीएचयू की आंतरिक समिति तक सीमित न रखकर उच्चस्तरीय पुलिस जांच हो। साथ ही, सभी JR-1 के अभिभावकों के साथ बैठक करके उनकी समस्याएं सुनी जाएं।
समाज और पत्रकारों के लिए चुनौती
इस गंभीर विषय पर समाज और खासकर पत्रकारों को पहल करनी चाहिए। उन्हें बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी और आईएमएस बीएचयू के निदेशक प्रो. एसएन संखवार से कुछ सवाल करने चाहिए -
1. आईएमएस-बीएचयू में पीजी मेडिकल स्टूडेंट्स की ड्यूटी के नियम क्या हैं? क्या भारत सरकार के 1992 के नियम और एम्स के आदेश दिनांक 21 अगस्त 2025 का अनुपालन होता है?
2. अगर हां, तो क्या स्टूडेंट्स और अभिभावकों की उपस्थिति में एक प्रेस कॉफ्रेस करके इसकी घोषणा करेंगे?
3. अगर उक्त नियम का अनुपालन नहीं होता हो, तो किस अधिकार के तहत अवैध और अमानवीय लंबी ड्यूटी कराई जाती है?
4. अगर लंबी, अवैध ड्यूटी कराई जाती हो, तो क्या इसे वास्तविक तौर पर रिकॉर्ड किया जाता है? क्या सभी विभागों में विगत तीन माह का प्रति स्टूडेंट ड्यूटी का डेटा सार्वजनिक किया जाएगा?
5. क्या बनारस के कुछ स्वतंत्र नागरिकों और पत्रकारों की एक टीम को इस बात की जांच की अनुमति दी जाएगी, कि लंबी अवैध ड्यूटी का मरीजों के इलाज पर बुरा असर नहीं पड़ रहा?
6. डॉ सत्या के इलाज की स्थिति क्या है और क्या बेहतर इलाज के लिए किसी विशेष प्रयास की जरूरत है?
7. आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट कहां है? आत्महत्या के प्रयास का मामला होने के बावजूद पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं दर्ज कराई गई? क्या आंतरिक जांच टीम बीएनएस की धाराओं के मामलों की जांच करने में सक्षम है?
8. डॉ सत्या ने जब से कोर्स जॉइन किया, तब से आत्महत्या के प्रयास तक उसने किस किस दिन कितने घन्टे काम किया, इसे सार्वजनिक करें।
अगर आईएमएस बीएचयू इन सवालों का जवाब न दे, तो बनारस के नागरिकों और पत्रकारों की एक टीम इसकी जांच करे। लोकतंत्र है। इतना तो हक बनता है। दायित्व भी।